वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| कर्मान्ताङ्गारशालासु स्तनंधयसुताः स्त्रियः।<br>वाग्विप्रुषो द्विजेन्द्राणां संतप्ताश्चाम्बुबिन्दवः॥ ६७ | कर्मशाला, अन्तर्गृह एवं अग्निशालामें दुधमुँहे बच्चोंको ली हुई स्त्रियाँ, सम्भाषण करते हुए विद्वान् ब्राह्मणोंके मुखके छींटे तथा उष्ण जलके बिन्दु पवित्र होते हैं। |
| भूमिर्विशुध्यते खातदाहमार्जनगोक्रमैः।<br>लेपादुल्लेखनात् सेकाद् वेश्मसंमार्जनार्चनात्॥ ६८ | पृथ्वीकी शुद्धि खोदने, जलाने, झाडू देने, गौओंके चलने, लीपने, खरोंचने तथा सींचनेसे होती है और गृहकी शुद्धि झाडू देने, जलके छिड़कने तथा पूजा आदिसे होती है। |
| केशकीटावपनेऽन्ने गोघ्राते मक्षिकान्विते।<br>मृदम्बुभस्मक्षाराणि प्रक्षेप्तव्यानि शुद्धये॥ ६९ | केश, कीट पड़े हुए और मक्खीके बैठ जानेपर तथा गायके द्वारा सूँघे जानेपर अन्नकी शुद्धिके लिये उसपर जल, भस्म, क्षार या मृत्तिका छिड़कनी चाहिये। |
| औदुम्बराणां चाम्लेन क्षारेण त्रपुसीसयोः।<br>भस्माम्बुभिश्च कांस्यानां शुद्धिः प्लावो द्रव्यस्य च॥ ७० | ताम्रपात्रकी शुद्धि खटाईसे, जस्ते और शीशेकी क्षारके द्वारा, काँसेकी वस्तुएँ भस्म और जलके द्वारा तथा तरल पदार्थ कुछ अंशको बहा देनेसे शुद्ध हो जाते हैं¹॥ ६७–७०॥ |
| अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च।<br>अन्येषामपि द्रव्याणां शुद्धिर्गन्धापहारतः॥ ७१ | अपवित्र वस्तुसे मिले पदार्थ जल और मिट्टीसे धोने तथा दुर्गन्ध दूर कर देनेसे शुद्ध होते हैं। अन्य (गन्धवाले) पदार्थोंकी शुद्धि भी गन्ध दूर करनेसे होती है। |
| मातुः प्रस्रवणे वत्सः शकुनिः फलपातने।<br>गर्दभो भारवाहित्वे श्वा मृगग्रहणे शुचिः॥ ७२ | माताके स्तनको प्रस्रुत कराने (पेन्हाने)-में बछड़ा, वृक्षसे फल गिरानेमें पक्षी, बोझा ढोनेमें गधा और शिकार पकड़नेमें कुत्ता शुद्ध (माना गया) है। |
| रथ्याकर्दमतोयानि नावः पथि तृणानि च।<br>मारुतेनैव शुद्ध्यन्ति पक्केष्टकचितानि च॥ ७३ | मार्गके कीचड़ और जल, नाव तथा रास्तेकी घास, तृण एवं पके हुए ईंटोंके समूह वायुके द्वारा ही शुद्ध हो जाते हैं। |
| शृतं द्रोणाढकस्याननममेध्याभिप्लुतं भवेत्।<br>अग्रमुद्धृत्य संत्याज्यं शेषस्य प्रोक्षणं स्मृतम्॥ ७४ | यदि एक द्रोण (ढाई सेरसे अधिक) पके अन्नके अपवित्र वस्तुसे सम्पर्क हो जाय तो उसके ऊपरका अंश निकाल कर फेंक देना एवं शेषपर जल छिड़क देना चाहिये। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है। |
| उपवासं त्रिरात्रं वा दूषितान्नस्य भोजने।<br>अज्ञाते ज्ञातपूर्वे च नैव शुद्धिर्विधीयते॥ ७५ | अज्ञातरूपसे दूषित अन्न खा लेनेपर तीन रात्रितक उपवास करनेसे शुद्धि हो जानेका विधान है, किंतु जान-बूझकर दूषित अन्न खानेपर शुद्धि नहीं हो सकती॥ ७१–७५॥ |
| उदक्याश्वाननग्नांश्च सूतिकान्त्यावसायिनः।<br>स्पृष्ट्वा स्नायीत शौचार्थं तथैव मृतहारिणः॥ ७६ | रजस्वला स्त्री, कुत्ता, नग्न (दिगम्बर साधु),² प्रसूता स्त्री, चाण्डाल और शववाहकोंका स्पर्श हो जानेपर अपवित्र हुए व्यक्तिको पवित्र होनेके लिये स्नान करना चाहिये। |
| सस्नेहमस्थि संस्पृश्य सवासाः स्नानमाचरेत्।<br>आचम्यैव तु निःस्नेहं गामलभ्यार्कमीक्ष्य च॥ ७७ | मज्जायुक्त हड्डीके छू जानेपर वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये, किंतु सूखी हड्डीका स्पर्श होनेपर आचमन करने, गो-स्पर्श तथा सूर्यदर्शन करनेमात्रसे ही |
१-द्रव्यशुद्धिका यह प्रकरण मनुस्मृति ५। ११०–१४६ तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १। १८२–१९७ आदिमें भी प्रायः इसी भावका है।
२-पद्मपुराण आदिमें नग्न-धर्मविपाक प्रश्नोत्तर द्रष्टव्य है।