वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४० ] कूर्म-द्वादशीव्रत ९३
और कुछ विचार करना अनावश्यक है। जिसने दीक्षा नहीं ली है और जो नास्तिक है, उसे यह विधान बताना अवाञ्छनीय है। जो देवता अथवा ब्राह्मणसे द्वेष करता है, उसको इसे कभी नहीं सुनाना चाहिये। पापोंको तुरंत प्रशमन करनेवाला यह व्रत गुरुमें श्रद्धा रखनेवाले व्यक्तिको बताना चाहिये। जो मनुष्य यह व्रत करता है, वह इस जन्ममें धन, धान्य और सौभाग्य प्राप्त करता है। उसे अनेक प्रकारकी श्रेष्ठ स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं। यह उत्तम प्रसङ्ग द्वादशीकल्प कहलाता है। जो इसे भक्तिपूर्वक सुनाता है अथवा स्वयं पढ़ता-सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। [अध्याय ३९]
कूर्म-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! [जिस प्रकार मार्गशीर्षका यह मत्स्य-द्वादशीव्रत है,] प्रायः ऐसा ही पौषमासका कूर्म-द्वादशीव्रत है। इसी मासमें देवताओंने समुद्रका मन्थनकर अमृत प्राप्त किया था। उस समय भक्तोंको अभिलषित पदार्थ देनेमें कुशल स्वयं भगवान् नारायण कच्छप-रूपसे अवतरित हुए थे। उस दिन यही महान् पवित्र तिथि थी। अतः पौषमासके शुक्लपक्षकी यह दशमी—इन कूर्मरूप धारण करनेवाले परम प्रभु परमात्माकी तिथि है। व्रतीको चाहिये कि पूर्वकथनानुसार दशमी तिथिके दिन स्नान आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्नकर एकादशी तिथिमें भक्तिके साथ भगवान् श्रीजनार्दनकी आराधना करे। मुनिवर! पूजाके मन्त्र अलग-अलग हैं। उन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिका पूजन होना आवश्यक है। ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ नारायणाय नमः’, ‘ॐ सङ्कर्षणाय नमः’, ‘ॐ विशोकाय नमः’, ‘ॐ भवाय नमः’, ‘ॐ सुबाहवे नमः’ तथा ‘ॐ विशालाय नमः।’ इन वाक्योंका उच्चारणकर क्रमशः भगवान् श्रीहरिके चरण, कटिभाग, उदर, वक्षःस्थल, कण्ठ, भुजाएँ एवं सिरकी भलीभाँति (पूर्वोक्त प्रकारसे भी) पूजा करनी चाहिये। फिर ‘भगवन्! आपके लिये नमस्कार है’—ऐसा कहना चाहिये। पुनः नाम-मन्त्रका उच्चारणकर सुन्दर चन्दन, पुष्प, धूप, फल और नैवेद्य आदि अद्भुत उपचारोंसे परम प्रभु भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। फिर सामने एक कलश रखकर उसपर अपनी शक्तिके अनुसार भगवान् कूर्मकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। साथमें मन्दराचलकी भी प्रतिमा रखे। कलश माला और स्वच्छ वस्त्रसे सुसज्जित एवं अलंकृत हो। कलशके भीतर रत्न डाले तथा ऊपर घृतसे भरा हुआ ताँबेका एक पात्र रखकर उसीमें प्रतिमाका अभिधारण करे। फिर ब्राह्मणकी पूजाकर उसे दान कर दे। उस समय मनमें संकल्प करे—‘मैं कल अपनी शक्तिके अनुरूप दक्षिणा आदिसे ब्राह्मणोंकी पूजा करूँगा। इससे कूर्म-रूपमें प्रकट होनेवाले देवाधिदेव भगवान् नारायणको मैं प्रसन्न करना चाहता हूँ।’ इसके पश्चात् अपने सेवकवर्गके साथ बैठकर भोजन करे।
विप्र! इस प्रकार कार्यसम्पन्न करनेपर व्रतकत्र्ताके पाप नष्ट हो जाते हैं। इसमें कुछ अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वह पुरुष संसार-चक्रका त्यागकर भगवान् श्रीहरिके सनातन-लोकको चला जाता है। उसके पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं और वह शोभा तथा लक्ष्मीसम्पन्न होकर सत्यधर्मका भाजन बन जाता है। भक्तिके साथ व्रत करनेवाले उस पुरुषके अनेक जन्मोंसे-सञ्चित पाप दूर भाग जाते हैं। पहले जो मत्स्य-द्वादशीका फल बताया गया है, इसके उपासकको भी वही फल प्राप्त होता है, तथा भगवान् श्रीनारायण उसपर शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। [अध्याय ४०]