वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ९४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ४१ |
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वराह-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—व्याध! तुम एक महान् भक्तशील धार्मिक पुरुष हो! जिस प्रकार मार्गशीर्षमें भगवान् नारायणने मत्स्यका रूप तथा पौषमासमें कच्छपका रूप धारण किया था, वैसे ही माघ-मासके शुक्लपक्षमें द्वादशीके दिन पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये वे प्रभु वराहके रूपसे प्रकट हुए हैं। अतः इस तिथिके अवसरपर भी पहले कही हुई विधिके अनुसार संकल्प एवं स्थापन आदि करके विद्वान् पुरुष उनकी पूजा करे। उन अविनाशी प्रभुकी चन्दन, धूप एवं नैवेद्य आदिसे अर्चना होनी चाहिये। पूजनके उपरान्त उनके सामने जलसे भरा एक कलश रखे। फिर ‘ॐ वराहाय नमः’से दोनों पैरोंकी, ‘ॐ माधवाय नमः’से कटिकी, ‘ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः’से उदरकी, ‘ॐ विश्वरूपाय नमः’से हृदयकी, ‘ॐ सर्वज्ञाय नमः’से कण्ठकी, ‘ॐ प्रजानां पतये नमः’से सिरकी, ‘ॐ प्रद्युम्नाय नमः’से दोनों भुजाओंकी, ‘ॐ दिव्यास्त्राय नमः’से चक्रकी तथा ‘ॐ अमृतोद्भवाय नमः’से शङ्खकी अर्चना करनी चाहिये। इस प्रकार पूजाकर विवेकी पुरुष वराह भगवान्की प्रतिमाको कलशपर स्थापित करे। अपने वैभवके अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबेका पात्र निर्माण कराकर उसपर प्रतिमा स्थापित करे। यदि शक्ति हो तो चतुर पुरुष भगवान् वराहकी स्वर्णमयी ऐसी प्रतिमा बनवाये, जिसमें उन प्रभुके दाढ़पर पर्वत, वन और वृक्षोंके सहित पृथ्वी विराज रही हो। फिर इस प्रकार भावना करनी चाहिये—‘जो भगवती लक्ष्मीके प्राणपति हैं, जिन्होंने मधुनामक दैत्यको मारा है, अखिलबीज जिनमें सुरक्षित रहते हैं तथा जो रत्नोंके भाजन हैं, वे ही परम प्रभु साकार होनेके विचारसे वराहरूप धारणकर यहाँ स्थित हैं।’
फिर उन्हें कलशपर विराजमान कर दे।
मुने! वह कलश दो सफेद वस्त्रोंसे आच्छादित होना चाहिये। उसपर ताँबेका एक पात्र रहना आवश्यक है। मूर्ति स्थापितकर चन्दन, फूल और नैवेद्य प्रभृति अनेक पवित्र उपचारोंसे अर्चना करे और फूलोंके द्वारा मण्डल बना ले। रातमें स्वयं जगे और दूसरोंको जगनेकी प्रेरणा करे। पण्डित पुरुषका कर्तव्य है—‘इस शुभ समयमें भगवान् श्रीहरि वराहरूपसे अवतरित हुए हैं’—इस विचारसे दूसरेके द्वारा भी पूजा एवं पद्य-गान कराये। इस प्रकार पूजा समाप्तकर प्रातःकाल सूर्यके उदय हो जानेपर शौचादिसे निवृत्त हो स्नान करे। तत्पश्चात् भगवान्की पुनः पूजा करके वह प्रतिमा ब्राह्मणको अर्पण कर दे। ग्रहीता ब्राह्मण वेद एवं वेदाङ्गका विद्वान्, साधु-स्वभाववाला, बुद्धिमान्, भगवान् विष्णुका भक्त, शान्त चित्तवाला, श्रोत्रिय तथा परिवारवाला होना चाहिये।
इस प्रकार वराहरूपी भगवान्की प्रतिमा कलशके सहित दान करनेका जो फल प्राप्त होता है, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो—इस जन्ममें तो उसे सुन्दर भाग्य, लक्ष्मी, कान्ति और सन्तोषकी प्राप्ति होती है और यदि दरिद्र हो तो वह शीघ्र ही धनवान् हो जाता है। सन्तानहीनको पुत्रकी प्राप्ति हो जाती है। दरिद्रता तुरंत भाग जाती है। बिना बुलाये स्वयं लक्ष्मी घरमें आ जाती हैं। वह पुरुष इस लोकमें सौभाग्यसम्पन्न तो रहता ही है, अब उसके परलोककी बात भी कहता हूँ, सुनो। इस सम्बन्धमें यहाँ एक पुरानी ऐतिहासिक घटनाका उल्लेख मिलता है।
पहले प्रतिष्ठानपुर (पैठण)-में वीरधन्वा नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं। एक समयकी बात है—शत्रुओंको तपानेवाला, वह राजा शिकार