वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४१ ] वराह-द्वादशीव्रत ९५
खेलनेके अभिप्रायसे वनमें गया। उसी वनमें संवर्त ऋषिका भी आश्रम था। राजाने मृगोंको मारनेके साथ ही अनजाने मृगका रूप बनाये हुए पचास ब्राह्मणपुत्रोंका भी वध कर दिया। वे सभी परस्पर भाई थे तथा वेदके अध्ययनमें उन ब्राह्मणोंकी बड़ी तत्परता थी। किंतु उस समय वे मृगका स्वाँग बनाये हुए थे।
सत्यतपाने पूछा—ब्रह्मन्! वे ब्राह्मण मृगका रूप धारण करके वनमें क्यों रहते थे? इस विषयमें मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। मैं आपके शरणागत हूँ। मुझपर प्रसन्न होकर इसका कारण बतानेकी कृपा करें।
दुर्वासाजी कहते हैं—महाराज! किसी समयकी बात है—वे सभी ब्राह्मण वनमें गये। वहाँ उन्होंने हिरनके पाँच बच्चोंको देखा। वे बच्चे अभी-अभी पैदा हुए थे। उन बच्चोंकी माता वहाँ नहीं थी। उन ब्राह्मणोंने एक-एक बच्चेको हाथोंमें ले लिया और गुफामें चले गये। वहीं उन बच्चोंकी चेतना समाप्त हो गयी। तब उन सभी ब्राह्मणोंके मनमें महान् दुःख हुआ। अतः वे अपने पिता संवर्तके पास चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने मृगहिंसा-सम्बन्धी यह सच्ची घटना कहना आरम्भ कर दी।
ऋषिकुमार बोले—मुने! तुरंत उत्पन्न हुए पाँच मृग हमारे द्वारा मर गये हैं। हमलोग यह काण्ड नहीं चाहते थे। फिर भी घटना घट गयी, अतः हमें प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा कीजिये।
संवर्त ऋषिने कहा—प्रिय पुत्रो! मेरे पितामें हिंसाकी वृत्ति थी और उनसे बढ़कर मैं हिंसासे प्रेम रखता था। फिर तुमलोग मेरे पुत्र होकर पाप कर्मसे अछूते रह जाओ—यह असम्भव है। किंतु इससे छूटनेका उपाय यह है कि अब तुमलोग संयमशील बनकर मृगोंका चर्म अपने ऊपर डाल लो और पाँच वर्षोंतक वनमें विचरो। ऐसा करनेसे तुम्हारी शुद्धि हो जायगी।
इस प्रकार संवर्त मुनिके कहनेपर उनके पुत्रोंने अपने पूरे शरीरपर मृगचर्म डाल लिया और शान्तभावसे वनमें जाकर परब्रह्म परमात्माके नामका जप करने लगे। उन्हें ऐसा करते हुए पाँच वर्ष व्यतीत हो गये। उसी समय राजा वीरधन्वा वहाँ आया, जहाँ मृगचर्म लपेटे हुए वे ब्राह्मण वृक्षके नीचे सावधानीके साथ बैठे थे। जपमें उनकी वृत्ति एकाग्र थी। उन्हें देखकर राजा वीरधन्वाने समझा कि ये मृग हैं। अतः उन सभी ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंपर बाण चला दिया और वे सब-के-सब एक साथ ही प्राणोंसे हाथ धो बैठे। जब उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले उन मृत ब्राह्मणोंपर राजा वीरधन्वाकी दृष्टि पड़ी, तो वे भयसे काँप उठे। अब वे देवरातनामक मुनिके आश्रममें गये और उनसे पूछा—'मुनिवरजी! मुझे ब्रह्महत्या लग गयी है, इसके निवारणार्थ मुझे क्या करना चाहिये?' उस समय वीरधन्वाने आदिसे अन्ततककी सभी बातें मुनिसे बता दीं और वे फिर अत्यन्त शोकसे व्याकुल होकर जोर-जोरसे रोने लगे। यों उन्हें रोते देखकर ऋषिने कहा—'राजन्! डरो मत, मैं तुम्हारा पाप दूर कर दूँगा। जिस समय पृथ्वी सुतलनामक पातालमें डूब रही थी, तो देवाधिदेव भगवान् विष्णुने स्वयं वराहका रूप धारणकर उसका उद्धार किया था। राजेन्द्र! वैसे ही ब्रह्महत्याके पापमें डूबते हुए तुम्हारा भी वे प्रभु उद्धार कर दें।' इस प्रकार देवरात ऋषिके कहनेपर राजा वीरधन्वा शान्त एवं प्रसन्न हो गये और उन्होंने मुनिसे पूछा—'महानुभाव! किस प्रकार भगवान् श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो सकते हैं, जिससे मेरे सब पातक नष्ट होंगे?'
दुर्वासाजी बोले—मुनिवर! जब इस प्रकार