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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९६ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ४२

वीरधन्वाने देवरात ऋषिसे पूछा तो उन्होंने उस राजाको यह व्रत बतला दिया और नरेशने इस व्रतका अनुष्ठान किया। इसके प्रभावसे राजा वीरधन्वा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त होकर अपार भोगोंको भोगनेके पश्चात् सुवर्णके सुन्दर विमानपर चढ़कर स्वर्ग चला गया। वहाँ इन्द्र उठकर उसके स्वागतके लिये अर्घ्य लिये हुए आगे बढ़े। इन्द्रको आते देखकर भगवान् श्रीहरिके पार्षदोंने उनसे कहा—‘देवराज! आप इधर न देखें। कारण, आपकी तपस्या इनसे न्यून है। इसी प्रकार एक-एक करके सभी लोकपाल आये और तपहीन होनेके कारण भगवान् विष्णुके सेवकोंने उनमेंसे किसीको भी स्वागतका अवसर नहीं दिया; क्योंकि राजा वीरधन्वाके तेजप्रतापके सामने वे फीके पड़ रहे थे। महामुने! इस प्रकार वह राजा सत्यलोकतक पहुँच गया। वहाँ पहुँचनेपर जन्म-मरणकी शृङ्खला समाप्त हो जाती है। वह सत्यलोक न तो अग्निसे भस्म होता है और न जलमें लीन ही होता है। आज भी महाराज वीरधन्वा देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हुए वहीं विराजमान हैं। यज्ञस्वरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिके प्रसन्न हो जानेपर कौन-सा ऐसा आश्चर्यकारी कर्म है, जो सम्पन्न न हो सके। उनके प्रसन्न होनेपर इस जन्ममें भी आयु, आरोग्य और सौभाग्य सुलभ हो सकते हैं। इस एक-एक द्वादशीव्रतमें ऐसी शक्ति है कि विधिके साथ उनका आचरण करनेसे मानव उत्तम सौभाग्य पानेका अधिकारी हो जाता है। फिर जो सभी व्रतोंको सम्पन्न करे, उसके लिये तो कहना ही क्या है। उसे तो भगवान् नारायण स्वयं अपना स्थान देनेको तत्पर हो जाते हैं। भगवान् नारायणकी एक-से-एक श्रेष्ठ चार मूर्तियाँ हैं, इसमें कोई संशयकी बात नहीं है। जैसे उनका जलशायी नारायणरूप है, वैसे ही उन प्रभुने मत्स्यका रूप धारण कर वेदोंका उद्धार किया। फिर उसी प्रकार कूर्मरूपसे क्षीरसागरको मन्दराचलके सहारे मथनेकी योजना बनायी। मन्दराचलको पीठपर धारण किया था। यह उनकी दूसरी मूर्ति है। पुनः पृथ्वी रसातलमें चली गयी थी। वैसे ही उसे ऊपर लानेके लिये उन परम प्रभुने वराहका रूप धारण किया था। यह उन भगवान् नारायणकी तीसरी मूर्ति है। (चौथी सम्मूर्ति भगवान् नृसिंहकी है, जो आगे कही जायगी।)’ [अध्याय ४१]


नृसिंह-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—मुनिवर! पहले कहे हुए व्रतकी भाँति फाल्गुनमासके शुक्ल पक्षमें नृसिंह-द्वादशीव्रत होता है। विद्वान् पुरुष उस दिन उपवास करके विधिके साथ भगवान् श्रीहरिकी आराधना करे। ‘ॐ नरसिंहाय नमः’ कहकर भगवान् नृसिंहके चरणोंकी, ‘ॐ गोविन्दाय नमः’ से ऊरुओंकी, ‘ॐ विश्वभुजे नमः’ से कटिप्रदेशकी, ‘ॐ अनिरुद्धाय नमः’ से वक्षःस्थलकी, ‘ॐ शितिकण्ठाय नमः’ से कण्ठकी, ‘ॐ पिङ्गकेशाय नमः’ कहकर शिरोदेशकी, ‘ॐ असुरध्वंसनाय नमः’ से चक्रकी तथा ‘ॐ तोयात्मने नमः’ कहकर शङ्खकी चन्दन, फूल एवं फल आदिके द्वारा सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् भगवान्के सामने दो सफेद वस्त्रोंसे सम्पन्न एक कलश रखनेका विधान है। उस कलशपर एक ताँबेका पात्र अथवा अपने वित्तके अनुसार काष्ठ या बाँसका पात्र रखकर उसके ऊपर भगवान् नृसिंहकी स्वर्णमयी मूर्ति पधरानी चाहिये। घड़ेमें रत्न डालकर द्वादशीके दिन पूजा करनेके उपरान्त भगवान्की वह प्रतिमा वेदके विशेषज्ञ ब्राह्मणको अर्पण कर दे।