भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 140

अध्याय ७३ ] वैराज-वृत्तान्त १२९

भगवन्! मेरी यह जिज्ञासा है कि किस समय आपकी प्रधानता रहती है? कब विष्णु प्रधान माने जाते हैं? अथवा किस समय ब्रह्माकी प्रधानता होती है? आप यह बात मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् रुद्रने कहा—द्विजवर! वैदिक सिद्धान्तके अनुसार परब्रह्म परमात्मा विष्णु ही ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव—इन तीन भेदोंसे पठित एवं निर्दिष्ट हैं; पर माया-मोहित बुद्धिवाले इसे समझ नहीं पाते हैं। 'विश प्रवेशने' यह धातु है। इसमें 'स्नु' प्रत्यय लगा देनेसे 'विष्णु' शब्द निष्पन्न हो जाता है। इन विष्णुको ही सम्पूर्ण देवसमाजमें सनातन परमात्मा कहते हैं। महाभाग! जो ये विष्णु हैं, वे ही आदित्य हैं। सत्ययुगसे सम्बन्धित श्वेतद्वीपमें उन दोनों महानुभावोंकी मैं निरन्तर स्तुति करता हूँ। सृष्टिके समय मेरे द्वारा ब्रह्माजीका स्तवन होता है और मैं कालरूपसे सुशोभित होता हूँ। ब्रह्मासहित सभी देवता और दानव सदा सत्ययुगमें मेरे स्तवनके लिये प्रयत्न-शील रहते हैं। भोगकी इच्छा करनेवाला देवसमुदाय मेरी लिङ्ग-मूर्तिका यजन करता है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले मानव सहस्र मस्तकवाले जिन प्रभुका मनसे यजन करते हैं, वे ही विश्वके आत्मा स्वयं भगवान् नारायण हैं। द्विजवर! जो पुरुष ब्रह्मयज्ञके द्वारा निरन्तर यजन करते हैं, उनका प्रयास ब्रह्मको प्रसन्न करनेके लिये होता है। वेदको भी 'ब्रह्म' कहा जाता है। नारायण, शिव, विष्णु, शंकर और पुरुषोत्तम—इनमें केवल नामोंका ही भेद है। वस्तुतः इन सबको सनातन परब्रह्म परमात्मा कहते हैं। विप्र! वैदिक कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर—इन नामोंका पृथक्-पृथक् उच्चारण होता है। हम तीनों मन्त्रके आदि देवता हैं, इसमें कुछ विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। वैदिक कर्मके अवसरपर ही मेरा, विष्णुका तथा वेदोंका पार्थक्य है। वस्तुतः हम तीनों एक ही हैं। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इसमें भेद-भावकी कल्पना न करे। उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले द्विजवर! जो पक्षपातके कारण इसके विपरीत कल्पना करता है, वह पापी नरकमें जाता है। उसकी समझमें मैं रुद्र, ब्रह्मा और विष्णु तथा ऋग्, यजुः और साम—इनमें ऐसी भेद-भावना होती है। [अध्याय ७२]


वैराज-वृत्तान्त

भगवान् रुद्र कहते हैं—द्विजवर! अब एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ! इसमें बड़े कौतूहलकी बात है। जिस समय मैं जलमें था, तब यह घटना घटी थी। विप्रवर! सर्वप्रथम ब्रह्माजीने मेरी सृष्टि करके कहा—'तुम प्रजाओंकी रचना करो', किंतु इस कार्यकी जानकारी मुझे प्राप्त न थी। अतः मैं जलमें (तपस्या करनेके लिये) चला गया। जलमें गये अभी एक क्षण ही हुआ था—ज्यों ही मैं पैठता हूँ, त्यों ही परम प्रभु परमात्माकी मुझे झाँकी मिली। उन पुरुषकी आकृति केवल अँगूठेके बराबर थी। मैं मनको सावधान करके उनका ध्यान करने लगा। इतनेमें ही जलसे ग्यारह पुरुष निकल आये। उनकी ऐसी प्रतिभा थी, मानो प्रलयकालकी अग्नि हो। वे अपनी किरणोंसे जलको संतप्त कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा—'आपलोग कौन हैं, जो जलसे निकलकर अपने तेजसे इस पानीको अत्यन्त तप्त कर रहे हैं? साथ ही यह भी बतायें कि आप कहाँ जायेंगे?'

इस प्रकार मेरे पूछनेपर उन आदरणीय