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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ७३

पुरुषोंने कुछ भी न कहा। वे सभी परम प्रशंसनीय ब्राह्मण थे। बिना कुछ कहे ही वे चल पड़े। तदनन्तर उनके जानेके कुछ ही क्षण बाद एक अत्यन्त महान् पुरुष आये, जिनकी आकृति बहुत सुन्दर थी। उनके शरीरका वर्ण मेघके समान श्यामल था और आँखें कमलके तुल्य थीं। मैंने उनसे पूछा—'पुरुषप्रवर! आप कौन हैं तथा जो अभी गये हैं, वे पुरुष कौन हैं? आपके यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है? बतानेकी कृपा करें।'

**पुरुषने कहा—**ये पुरुष, जो पहले आकर चले गये हैं, इनका नाम आदित्य है। ये बड़े तेजस्वी हैं। ब्रह्माजीने इनका ध्यान किया है, अतः ये यहाँसे चले गये। कारण, इस समय ब्रह्माजी संसारकी रचना कर रहे हैं। इस अवसरपर उन्हें इनकी आवश्यकता है। देव! ब्रह्माके सृजन किये हुए जगत्की रक्षाका भार इनपर अवलम्बित होगा—इसमें कोई संशय नहीं है।

**श्रीरुद्र बोले—**भगवन्! आप महान् पुरुषोंके भी सिरमौर हैं। मैं आपको कैसे जानूँ! आप अपने नाम तथा स्वरूपका परिचय बताते हुए सभी प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि मुझे आपके सम्बन्धमें अभी कोई ज्ञान नहीं है।

इस प्रकार भगवान् रुद्रके पूछनेपर उस पुरुषने उत्तर दिया—'मैं भगवान् नारायण हूँ। मेरी सत्ता सदा सर्वत्र रहती है। मैं जलमें शयन करता हूँ। मैं आपको दिव्य आँखें दे रहा हूँ, आप मुझे अब देख सकते हैं। जब उन्होंने मुझसे ऐसी बात कही तब मैंने उनपर पुनः दृष्टि डाली। इतनेमें जिनकी आकृति केवल अँगूठेके बराबर थी, वे अब विराट्रूपमें दीखने लगे। उनका वह तेजस्वी विग्रह प्रदीप्त था। उनकी नाभिमें मैंने कमलका दर्शन किया। सूर्यके समान वहीं ब्रह्माजी भी दिखायी पड़े तथा उनके समीप ही मैंने स्वयं अपनेको भी देखा। उन परमात्माको देखकर मेरा मन आनन्दसे भर गया। विप्रवर! तब मेरे मनमें ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई कि इनकी स्तुति करूँ। सुव्रत! फिर तो निश्चित विचार हो जानेपर मैं इस स्तोत्रसे उन विश्वात्मा परम प्रभुकी आराधना करने लगा—मुझमें तपस्याका बल था, इसीसे इस शुभ कर्मकी ओर मेरी बुद्धि प्रवृत्त हुई।'

**मैं (रुद्र)-ने कहा—**जिनका अन्त नहीं है, जो विशुद्ध चित्तवाले, सुन्दर रूपधारी, सहस्र भुजाओंसे सुशोभित एवं अनन्त किरणोंके आकर हैं तथा जिनका कर्म महान् शुद्ध और देह परम विशाल है, उन परब्रह्म परमात्माके लिये मेरा नमस्कार है। अखिल विश्वका दुःख दूर करना जिनका सहजस्वभाव है, जो सहस्र सूर्य एवं अग्निके समान तेजस्वी हैं, सम्पूर्ण विद्याएँ जिनमें आश्रय पाती हैं तथा समस्त देवता जिन्हें निरन्तर नमस्कार करते हैं, उन चक्र धारण करनेवाले कल्याणके स्रोत प्रभुके लिये मेरा नमस्कार है। प्रभो! अनादिदेव, अच्युत, शेषशायी, विभु, भूतपति, महेश्वर, मरुत्पति, सर्वपति, जगत्पति, भुवःपति और भुवनपति आदि नामोंसे भक्तजन आपको सम्बोधित करते हैं। ऐसे आप भगवान्के लिये मेरा नमस्कार है। नारायण! आप जलके स्वामी, विश्वके लिये कल्याणदाता, पृथ्वीके स्वामी, संसारके संचालक, जगत्के लोचनस्वरूप, चन्द्रमा एवं सूर्यका रूप धारण करनेवाले, विश्वमें व्याप्त, अच्युत एवं परम पराक्रमी पुरुष हैं। आपकी मूर्ति तर्कका विषय नहीं है और आप अमृत-स्वरूप तथा अविनाशी हैं। नारायण! प्रचण्ड अग्निकी लपटें आपके श्रीविग्रहकी समता करनेमें असफल हैं। आपके मुख चारों ओर हैं। आपकी कृपासे देवताओंका महान् दुःख दूर हुआ है। सनातन प्रभो! आपके लिये नमस्कार है, मैं आपकी शरण

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