वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७३ ] वैराज-वृत्तान्त [ १३१
हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। विभो! आपके अनेक स्वरूपोंका मुझे दर्शन हो रहा है। आपके भीतर जगत्का निर्माण करनेवाले सनातन ब्रह्मा तथा ईश दिखायी पड़ रहे हैं, उन आप परम पितामहके लिये मेरा नमस्कार है। संसाररूपी चक्रमें भटकनेवाले परम पवित्र अनेक साधक उत्तम मार्गपर चलते हुए भी आपकी आराधनामें जब कथंचित् (किसी प्रकार) सफल होते हैं; तब आदिदेव! ऐसे आप प्रभुकी आराधना करनेकी मुझमें शक्ति ही कहाँ है, अतः देवेश्वर! मैं आपको केवल प्रणाम करता हूँ। आदिदेव! आप प्रकृतिसे परे एकमात्र पुरुष हैं। जो सौभाग्यशाली पुरुष आपके इस स्वरूपको जानता है, उसे सब कुछ जाननेकी क्षमता प्राप्त हो जाती है। आपकी मूर्ति बड़ी-से-बड़ी और छोटी-से-छोटी है। आपके स्वरूपोंमें जो गुण हैं, वे हठपूर्वक विभाजित नहीं किये जा सकते। भगवन्! आप वागिन्द्रियके मूलकारण, अखिल कर्मसे परे और विश्वात्मा हैं। आपका यह श्रेष्ठ शरीर विशुद्ध भावोंसे ओत-प्रोत है। आपकी उपासनामें संसारके बन्धन काटनेकी शक्ति है। उसीके द्वारा आपका सम्यक् ज्ञान सम्भव है। साधारण पुरुषकी बात तो दूर देवता भी आपको जान नहीं पाते। फिर भी तपस्याद्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे मैं आपको कवि, पुराण एवं आदिपुरुषके रूपमें जाननेमें सक्षम हुआ हूँ। मेरे पिता ब्रह्माजीने सृष्टिके अवसरपर बारंबार वेदोंकी सहायता ली है। अतएव उनका भी चित्त परम शुद्ध हो गया है। प्रभो! मुझ-जैसा व्यक्ति तो आपको पुकारनेमें भी असमर्थ है; क्योंकि आप ब्रह्मप्रभृति प्रधान देवताओंसे भी अगम्य कहे जाते हैं। अतएव वे देवताका रूप धारण करके आपको अनेकों बार प्रणाम करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप तपोरहित होनेपर भी उन्हें आपकी जानकारी प्राप्त हो जाती है। देवताओंमें भी बहुत-से उदार कीर्तिवाले हैं। किंतु भक्तिका अभाव होनेसे आपको जाननेकी उनके मनमें इच्छा ही नहीं होती है। प्रभो! अभक्त वेदवादियोंको भी कई जन्मतक विवेक नहीं होता। आपकी कृपासे उन्हें ऐसी बुद्धि उत्पन्न हो जाय—इसके लिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। जिसे आप प्राप्त हो जाते हैं, उसे किसी वस्तुकी अपेक्षा क्या है। यही नहीं, उसे देवता और गन्धर्वकी भी शरण नहीं लेनी पड़ती, वह स्वयं कल्याणस्वरूप हो जाता है। यह सारा संसार आपका ही रूप है। आप महान्, सूक्ष्म तथा स्थूलस्वरूप हैं। आदिप्रभो! यह जगत् आपका ही बनाया हुआ है।
भगवन्! आप कभी महान् रूप तथा कभी स्थूलरूप धारण कर लेते हैं और कभी आपका रूप अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। आपके विषयमें भिन्न विचार होनेसे मानव मोह-क्लेशमें पड़ता है। अब जब आप स्वयं प्रत्यक्ष पधारे हैं तब अधिक कहना ही क्या है? वसु, सूर्य, पवन एवं पृथ्वी सब आपमें ही स्थित हैं। आपका सदा समान रूप रहता है, आत्मारूपसे आप सर्वत्र विराजते हैं, व्यापकता आपका स्वभाव है। सत्त्वगुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं, आप अनन्त एवं सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हैं। आप मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा कीजिये।
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! अमित तेजस्वी महाभाग रुद्रने जब भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति की तब वे संतुष्ट हो गये। फिर तो मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन्होंने ये वचन कहे।
**भगवान् विष्णु बोले—**देवेश्वर! तुम्हारा कल्याण हो, उमापते! तुम वर माँगो। भगवन्! हममें भेद तो औपचारिकमात्र है। तत्त्वतः हम दोनों एक हैं।