वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ७४ |
|---|
रुद्रने कहा— प्रभो! पितामह ब्रह्माने सृष्टि करनेके लिये मेरी नियुक्ति की थी। मुझसे कहा था—'तुम प्रजाओंकी रचना करो।' प्राणियोंकी उत्पत्ति करनेवाले प्रभो! इस विषयमें आपसे तीन प्रकारका ज्ञान प्राप्त करना मेरे लिये परम आवश्यक है।
भगवान् विष्णुने कहा— रुद्र! तुम सनातन एवं सर्वज्ञ हो—इसमें कोई संदेह नहीं। तुम्हारे भीतर ज्ञानकी प्रभूत राशि है। तुम देवताओंके लिये सम्यक् प्रकारसे परम पूज्य बनोगे।
इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरिने स्वयं अपना रूप मेघका बना लिया। वे जलसे बाहर निकले और महाभाग रुद्रसे उन्होंने ये वचन कहे—'शम्भो! वे जो ग्यारह प्राकृत पुरुष थे, उनका नाम वैराज है। उन्हींको आदित्य कहते हैं। वे इस समय पृथ्वीपर गये हैं। उन्हें मेरा अंश जानना चाहिये। धरातलपर विष्णु-नामसे मैं ही बारह रूपोंमें अवतीर्ण होऊँगा। शंकरजी! इस प्रकार अवतार ग्रहणकर वे सभी आपकी आराधना करेंगे।' ऐसा कहकर वे भगवान् नारायण स्वयं अपने ही अंशसे एक दिव्य बादलकी रचनाकर आकाशसे अद्भुत शब्दकी तरह पता नहीं, कहाँ अन्तर्धान हो गये।
भगवान् रुद्र कहते हैं— ऐसी शक्तिसे सम्पन्न, सर्वत्र विचरनेवाले तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि करनेमें परम कुशल श्रीहरिने उस समय मुझे इस प्रकारका वर दिया था। अतएव मैं देवताओंसे श्रेष्ठ हुआ। वस्तुतः भगवान् नारायणसे श्रेष्ठ कोई देवता न हुआ है और न होगा। सज्जनश्रेष्ठ! पुराणों और वेदोंका यही रहस्य है। मैंने आपलोगोंके सामने यह सब प्रसङ्ग बता दिया, जिससे सुस्पष्ट हो जाता है कि इस जगत्में एकमात्र भगवान् श्रीहरिकी ही उपासना की जानी चाहिये। [अध्याय ७३]
भुवन-कोशका वर्णन
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! भगवान् रुद्र पुराणपुरुष, शाश्वत देवता, यज्ञस्वरूप, अविनाशी, विश्वमय, अज, शम्भु, त्रिनेत्र एवं शूलपाणि हैं। उन सनातन प्रभुसे सम्पूर्ण ऋषियोंने पुनः प्रश्न किया।
ऋषिगण बोले— देवेश्वर! आप हम सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। अतः हम आपसे एक प्रश्न पूछ रहे हैं, इसे आप बतानेकी कृपा करें। उमापते! पृथ्वीका प्रमाण, पर्वतोंकी स्थिति और उनका विस्तार क्या है। देवेश्वर! कृपया इसका वर्णन करें।
भगवान् रुद्र कहते हैं— धर्मका पूर्ण ज्ञान रखनेवाले महाभाग ऋषियो! समस्त पुराणोंमें भूलोककी ही चर्चा की जाती है। यह लोक पृथ्वीतलपर है। मैं तुम्हारे सामने संक्षेपसे इसका वर्णन करता हूँ, इस प्रसङ्गको सुनो।
जिन परब्रह्म परमेश्वरका प्रसङ्ग चला है, उनका ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओंकी जानकारीसे ही सम्भव है। उन्हींका नाम परमात्मा है। उनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। वे परमाणु-जैसा सूक्ष्म तथा अचिन्त्यरूप भी धारण कर लेते हैं। उन्हीं सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले पीताम्बरधारीका नाम नारायण है। पृथ्वी उन्हींके वक्षःस्थलपर टिकी है। वे दीर्घ, ह्रस्व, कृश, लोहित आदि गुणोंसे रहित तथा समस्त प्रपञ्चसे परे हैं। बहुत पहलेसे ही उनका यह रूप है। उनका स्वरूप केवल ज्ञानका विषय है। सृष्टिके आदिमें उन प्रभुमें सत्त्व, रज और तमके निर्माण करनेकी इच्छा हुई, अतः उन्होंने जलकी सृष्टि करके योगनिद्राकी सहायतासे उसमें शयन किया। फिर उनकी नाभिपर एक कमल उग आया। तब उस कमलपर जो सम्पूर्ण वेदों एवं ज्ञानके भंडार, अचिन्त्य स्वरूप, अत्यन्त शक्तिशाली तथा प्रजाओंके