वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९ ] तिलधेनुका माहात्म्य [ १६७
स्वर्गको छोड़कर श्वेतपर्वतपर पहुँचे। उनके पूर्वजन्मका शरीर उस समय भस्म हो गया था। अतः भूखे राजा श्वेतने अपनी हड्डियोंको एकत्रकर चाटना प्रारम्भ किया। फिर विमानपर चढ़कर वे स्वर्गमें गये। इसी प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेके बाद उत्तम व्रती उन राजा श्वेतको महात्मा वसिष्ठने अपनी हड्डियाँ चाटते हुए देखा। उन्होंने पूछा—'राजन्! तुम अपनी हड्डी क्यों चाट रहे हो?' महात्मा वसिष्ठके ऐसी बात कहनेपर राजा श्वेतने उन मुनिवरसे ये वचन कहे—'भगवन्! मुझे क्षुधा सता रही है। मुनिवर! पूर्वजन्ममें मैंने अन्न और जलका दान नहीं किया, अतः इस समय मुझे भूख-प्यास कष्ट दे रही है।' राजा श्वेतके ऐसा कहनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने पुनः उनसे कहा—'राजेन्द्र! मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? अदत्तदानका फल किसी प्राणीको नहीं मिलता। रत्न और सुवर्णका दान करनेसे मनुष्य सम्पत्तिशाली तो बन सकता है, पर अन्न और जल देनेसे उसकी सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं; वह सर्वथा तृप्त हो जाता है। राजन्! तुम्हारी समझमें अन्न अत्यन्त तुच्छ वस्तु थी। अतः तुमने उसका दान नहीं किया।
राजा श्वेत बोले—अब मेरी, जिसने अन्नदान नहीं किया, तृप्ति कैसे होगी? यह मैं सिर झुकाकर आपसे पूछता हूँ, महामुने! बतानेकी कृपा कीजिये।
वसिष्ठजीने कहा—अनघ! इसका एक उपाय है, उसे सुनो। पूर्वकल्पमें विनीताश्व नामके एक बड़े प्रसिद्ध राजा हो चुके हैं, उन नरेशने कई अश्वमेध-यज्ञ किये। यज्ञोंमें ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ, हाथी और धन दिये, तुच्छ समझकर अन्नका दान नहीं किया। इसके बाद बहुत समय बीत जानेपर वे मरकर स्वर्ग पहुँचे और वहाँ वे राजा भी तुम्हारी ही तरह भूखसे दुःखका अनुभव करने लगे। फिर सूर्यके समान प्रकाशमान विमानपर चढ़कर वे स्वर्गसे मर्त्यलोकमें नीलपर्वतपर गङ्गा नदीके तटपर, जहाँ उनका निधन हुआ था, पहुँचे और अपने शरीरको चाटने लगे। उन्होंने वहीं अपने 'होता' पुरोहितको देखकर पूछा—'भगवन्! मेरी क्षुधा मिटनेका उपाय क्या है?' होताने उत्तर दिया—'राजन्! आप 'तिलधेनु', 'जलधेनु', 'घृतधेनु' तथा 'रसधेनु' का दान करें—इससे क्षुधाका क्लेश तुरंत शान्त हो जायगा। जबतक सूर्य तपते हैं, चन्द्रमा प्रकाश पहुँचाते हैं, तबतकके लिये इससे आपकी क्षुधा शान्त हो जायगी।' ऐसी बात कहनेपर राजाने मुनिसे फिर इस प्रकार पूछा।
विनीताश्व बोले—ब्रह्मन्! 'तिलधेनु'-दानका विधान क्या है? विप्रवर! मैं यह भी पूछता हूँ कि उसका पुण्य स्वर्गमें किस प्रकार भोगा जाता है, आप कृपया यह सब हमें बतलायें।
होता बोले—राजन्! 'तिलधेनु'का विधान सुनो। (मानशास्त्रके अनुसार) चार कुडवका एक 'प्रस्थ' कहा गया है, ऐसे सोलह प्रस्थ तिलसे धेनुका स्वरूप बनाना चाहिये। इसी प्रकार चार 'प्रस्थ'का एक बछड़ा भी बनाना चाहिये। चन्दनसे उस गायकी नासिकाका निर्माण करे और गुड़से उसकी जीभ बनायी जाय। इसी प्रकार उसकी पूँछ भी फूलकी बनाकर फिर घण्टा और आभूषणसे अलंकृत करना चाहिये। ऐसी रचना करके सोनेके सींग बनवाये। उसकी दोहनी काँसेकी और खुर सोनेके हों, जो अन्य धेनुओंकी विधिमें निर्दिष्ट है। तिलधेनुके साथ मृगचर्म वस्त्ररूपमें सर्वौषधिसहित मन्त्रद्वारा पवित्रकर उसका दान करना सर्वोत्तम है। दानके समय प्रार्थना करे—तिलधेनो! तुम्हारी कृपासे मेरे लिये अन्न-जल एवं सब प्रकारके रस तथा दूसरी वस्तुएँ भी सुलभ हों। देवि! ब्राह्मणको अर्पित होकर तुम हमारे लिये सभी वस्तुओंका सम्पादन करो।'