वराह पुराण

वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished414 पृष्ठ
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| १६८ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १००-१०१ |
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| ग्रहीता ब्राह्मण कहे कि 'देवि! मैं तुम्हें श्रद्धापूर्वक ग्रहण कर रहा हूँ, तुम मेरे परिवारका भरण-पोषण करो। देवि! तुम मेरी कामनाओंको पूरी करो। तुम्हें मेरा नमस्कार है।' राजन्! इस प्रकार प्रार्थनाकर तिलधेनुका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जो व्यक्ति | श्रद्धाके साथ इस प्रसङ्गको सुनता या तिलधेनुका दान करता है अथवा दूसरेको दान करनेकी प्रेरणा करता है, वह समस्त पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें जाता है। गोमयसे मण्डल बनाकर गोचर्म* जितनी भूमिमें धेनुके आकारकी तिलधेनु होनी चाहिये।<br>[ अध्याय ९९] |
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जलधेनु एवं रसधेनु-दानकी विधि
| पुरोहित होताजी कहते हैं—राजेन्द्र! अब 'जलधेनु'-दानका विधान बताता हूँ। किसी पवित्र दिनमें सबसे पहले 'गोचर्म'के बराबर भूमिको गायके गोबरसे लीपकर उसके मध्यभागमें जल, कपूर, अगरु और चन्दनयुक्त एक कलश स्थापित करे। फिर उस कलशमें जलधेनुकी धारणाकर इसी प्रकारके एक दूसरे कलशमें बछड़ेकी कल्पना करे। फिर वहीं एक मन्त्रपुष्पोंसे युक्त वर्द्धनीपात्र रखे। पूर्वोक्त कलशमें दूर्वाङ्कुर, जटामासी, उशीर (खस)-की जड़, कुष्ठसंज्ञक ओषधि, शिलाजीत, नेत्रबाला, पवित्र पर्वतकी रेणु, आँवलेके फल, सरसों तथा सप्तधान्य आदि वस्तुओंको डालकर उसे पुष्पमालाओंसे सजाना चाहिये। राजन्! फिर चारों दिशाओंमें चार पात्रोंकी विशेषरूपसे कल्पना करे। इनमें एक पात्र घृतसे, दूसरा दहीसे, तीसरा मधुसे तथा चौथा शर्करासे पूर्ण होना चाहिये। इस कल्पित (कुम्भमयी) धेनुमें सुवर्णमय मुख एवं ताँबेके शृङ्ग, पीठ तथा नेत्रकी कल्पना करनी चाहिये। पासमें काँसेकी दोहनी रखे तथा उसके कुशके रोयें बनाये और सूत्रसे उसकी पूँछकी रचना करे। पुनः वस्त्र-आभरण तथा घण्टिकासे उसे | सजाकर शुक्तिसे दाँत एवं गुड़से मुखकी रचना करे। चीनीसे उस धेनुकी जीभ और मक्खनसे स्तनोंका निर्माणकर ईखके चरण बनाये तथा चन्दन एवं फूलोंसे उस धेनुको सुशोभितकर काले मृगचर्मपर स्थापित करे। फिर चन्दन और फूलोंसे भलीभाँति उसकी पूजा करके वेदके पारगामी ब्राह्मणको निवेदित कर दे।<br><br>राजन्! जो मानव इस धेनु-दानको देखता और इस चर्चाको कहता-सुनता है तथा जो ब्राह्मण यह दान ग्रहण करता है—वे सभी सौभाग्यशाली पुरुष पापसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें जाते हैं। राजन्! जिसने सदक्षिण अश्वमेध-यज्ञ किया और जिसने एक बार 'जलधेनु'का दान किया, उन दोनोंका फल समान होता है। इस प्रकार जलधेनुके दान करनेवाले व्यक्तिके सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और वे जितेन्द्रिय पुरुष स्वर्गको जाते हैं।<br><br>पुरोहित होताजी कहते हैं—राजन्! संक्षेपमें अब 'रसधेनु'का विधान कहता हूँ। लिपी हुई पवित्र भूमिपर काला मृगचर्म और कुश बिछाकर उसपर ईखके रससे भरा हुआ एक घड़ा रखे और फिर पूर्ववत् ही संकल्प करे। उस घड़ेके पासमें |
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* सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्तनम्। दश तान्येव गोचर्मं दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥
इस (पद्म०उत्त० ३३।८-९, मार्क०पुरा० ४९।३९, शातातप १।१५)-के वचनानुसार—सात हाथका दण्ड, तीस दण्डका निवर्तन और दस निवर्तनका 'गोचर्म' मान होता है।