वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०३-१०४ ] शर्करा तथा मधु-धेनुके दानकी विधि १७१
जिससे स्वयं अपनी आत्माको न कष्ट पहुँचे, न धनका ही समूल संहार हो जाय। धेनुकी चारों दिशाओंमें बीज स्थापितकर उसके मुखाग्र और सींग सोनेके तथा आँखें मोतीकी बनाये। गुड़से उसका मुखान्तर भाग तथा पिष्टसे उसकी जीभका निर्माण करे। गलकम्बलका निर्माण रेशमी सूत्रसे करे। कण्ठके भूषणोंसे उस धेनुको भूषित करे। ईखसे चरण, चाँदीसे खुर तथा मक्खनसे थनकी रचना करे। श्रेष्ठ पत्रोंसे उसके कान बनाकर उसे श्वेत चँवरसे अलंकृत करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके पासमें पञ्चरत्न रखकर उसे वस्त्रसे ढक देना चाहिये। फिर चन्दन और फूलोंसे अलंकृत करके वह गाय ब्राह्मणको दे दे। ब्राह्मण श्रोत्रिय, दरिद्र और साधु स्वभाववाला हो। अयन, विषुव, व्यतीपात और दिनक्षय—इन पुण्य अवसरोंपर अपनी शक्तिके अनुसार इस प्रकारकी गौ बनाकर दान करना चाहिये। यदि सत्पात्र एवं श्रोत्रिय ब्राह्मण घरपर आया हुआ दीख जाय तो आये हुए उस ब्राह्मणको धेनुके पुच्छभागका स्पर्श करते हुए दान करनेकी विधि है। पूर्व अथवा उत्तरकी तरफ मुख करके दाता बैठे। गौका मुख पूर्व और बछड़ेका मुख उत्तर हो। दान करते समय गोदानके मन्त्रोंको पढ़कर ही गौका दान करना चाहिये। दाता एक दिनतक शर्कराके आहारपर रहे और लेनेवाला ब्राह्मण भी इसी प्रकार तीन दिनतक रहे। यह शर्कराधेनु सम्पूर्ण पापोंको दूर करनेवाली तथा अखिल कामनाओंको देनेमें पूर्ण समर्थ है। इस प्रकार दान करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं और ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। शर्कराधेनुका दान करते समय जो लोग उसका दर्शन करते हैं, उन्हें परम गति मिलती है। जो मानव भक्तिपूर्वक इसे सुनता अथवा पढ़ता भी है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर विष्णुलोकको प्राप्त होता है।
पुरोहित होताजी कहते हैं—राजन्! अब सम्पूर्ण पापोंके नाशक 'मधुधेनु'के दानकी विधि सुनो। लिपी हुई पवित्र भूमिपर काला मृगचर्म और कुशा बिछाकर सोलह घड़े मधुसे एक धेनु तथा उसके चौथाई भागसे बछड़ेकी आकृति बनाकर स्थापित करे। उस धेनुका मुख सोनेका, उसके शृङ्ग (सींग) अगुरु एवं चन्दनके, पीठ ताँबेकी और सास्ना (गलकम्बल) रेशमी सूतके बनाये। उसके चरण ईखके हों। फिर उजले कम्बलसे उस धेनुको ढककर गुड़से उसके मुखकी तथा शर्करासे जिह्वाकी आकृति बनानी चाहिये। उसके ओंठ पुष्पके और दाँत फलोंके बने हों। वह कुशके रोयें तथा चाँदीके खुरोंसे सुशोभित हो और उसके कान श्रेष्ठ पत्तोंसे बनाने चाहिये। फिर उसके चारों दिशाओंमें सप्तधान्यके साथ तिलसे भरे हुए चार पात्र रखने चाहिये। फिर दो वस्त्रोंसे उसको ढककर कण्ठके आभूषणसे उसे अलंकृत कर दे। काँसेकी दोहनी बनाकर चन्दन और फूलोंसे उस धेनुकी पूजा करनी चाहिये। अयन, विषुव, व्यतीपात, दिनक्षय, संक्रान्ति और ग्रहणके अवसरपर इस धेनुके दानका विशेष महत्त्व है, अथवा अपनी इच्छासे इसे सभी कालमें सम्पादित किया जा सकता है। द्रव्य, ब्राह्मण और सम्पत्तिको देखकर दानका प्रतिपादन करना चाहिये। दान लेनेवाला ब्राह्मण दरिद्र, विद्याभ्यासी, अग्निहोत्री, वेद-वेदान्तका पारगामी तथा आर्यावर्तदेशमें उत्पन्न हुआ होना चाहिये। धेनुकी पूँछभागका स्पर्श करके हाथमें जल और दक्षिणा लेकर चन्दन और धूपसे पूजा-कर फिर दो वस्त्रोंसे ढककर अपनी शक्तिके अनुसार अन्नसहित उसका दान कर दे, कंजूसी न करे। सभी विधि जलपूर्वक होनी चाहिये।