वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १०५-१०६ |
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ब्राह्मणको दान करनेके पूर्व दाता इस प्रकार प्रार्थना करे—'मधुधेनो! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम्हारी कृपासे मेरे पितर और देवतागण प्रसन्न हो जायँ।' ग्रहीता कहे—'देवि! मैं विशेष रूपसे कुटुम्बकी रक्षाके लिये तुम्हें ग्रहण करता हूँ। मधुधेनो! तुम कामदुहा हो। मेरी कामनाओंको पूर्ण करो। तुम्हें मेरा नमस्कार। 'मधुवाता०'* इस मन्त्रको पढ़कर इस धेनुका दान करना चाहिये। महाराज! दानके पश्चात् छाता और जूता भी देना चाहिये। राजन्! इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो 'मधुधेनु'का दान करता है, वह एक दिन खीर और मधुके आहारपर रहे। दान लेनेवाले ब्राह्मणको मधु और खीरके आहार-पर तीन रातें व्यतीत करनी चाहिये। इसका दाता दस पूर्वजों और आगे होनेवाली दस पीढ़ियों एवं स्वयं आप—इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियोंको तारकर भगवान् विष्णुके स्थानमें पहुँचता है। जो मानव इस प्रसङ्गको श्रद्धाके साथ सुनता अथवा सुनाता है, वह समस्त पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें चला जाता है।' [अध्याय १०३-१०४]
'क्षीरधेनु' तथा 'दधिधेनु'-दानकी विधि
पुरोहित होताजी कहते हैं—राजन्! अब क्षीरधेनु-दानकी विधि सुनो—राजेन्द्र! गायके गोबरसे लिपी गयी पवित्र भूमिपर 'गोचर्म'मात्र प्रमाणमें सब ओर कुशाएँ बिछा दे। उसके ऊपर विवेकी पुरुष कृष्णमृगका चर्म रखे। उसपर गायके गोबरसे एक विस्तृत कुण्डिकाका निर्माण करे और वहाँ दूधसे भरा हुआ एक घड़ा रखे। उसके चौथाई भागवाला कलश बछड़ेके स्थानमें रखे, जिसका मुख सोनेका एवं सींग चन्दन तथा अगुरु-काष्ठके बने हों। कानोंके स्थानमें वृक्षके उत्तम पत्ते रखे। इस कुम्भके ऊपर तिलका पात्र रखनेका विधान है। गुड़से उसके मुखकी, शर्करासे जिह्वाकी, उत्तम फलोंसे दाँतोंकी और मोतियोंसे आँखोंकी रचना करनी चाहिये। उसके ईखके चरण, कुशके रोयें और ताँबेकी पीठ बनायी जाय। सफेद कम्बलसे उसका गलकम्बल बनाये और काँसेकी दोहनी उसके पासमें रख दे। रेशमके सूतोंसे उसकी पूँछ तथा मक्खनसे उसका थन बनाये अथवा उसके सींग सोनेके एवं खुर चाँदीके हों। फिर पासमें पञ्चरत्न रखे। चारों दिशाओंमें तिलसे भरे हुए चार पात्र तथा सभी दिशाओंमें सप्तधान्य रखनेका नियम है। इस प्रकारके लक्षणोंसे सम्पन्न क्षीरधेनुकी कल्पना करनी चाहिये। फिर दो वस्त्रोंसे ढककर चन्दन और फूलोंसे उसकी पूजा करनी चाहिये। उसे वस्त्र आदिसे अलंकृत करके मुद्रिका और कानके कुण्डलसे भी सजाये। तत्पश्चात् धूप-दीप देकर वह क्षीरधेनु ब्राह्मणको अर्पण कर दे। दानके समय खड़ाऊँ, जूते और छाता भी दे। 'आप्यायस्व०' (तै०आर०३।१७) इस वेदोक्त मन्त्रसे प्रार्थना करनेका नियम है। राजन्! पूर्वोक्त 'आश्रयः सर्वभूतानाम्०' तथा 'आप्यायस्व ममाङ्गानि०' इन मन्त्रोंको क्षीरधेनुका दान लेनेवाला ब्राह्मण भी पढ़े। यह इस दानकी विधि कही गयी है। इस प्रकार दी जानेवाली धेनुका जो दर्शन करते हैं, उन्हें भी परम गति प्राप्त होती है। इस
* यह पूरा मन्त्र इस प्रकार है—'मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः॥ माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः। मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ २ अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥' (ऋक्० १।९०।६-८, यजु० १३।२७-२९)।