वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०७-१०८ ] 'नवनीतधेनु' तथा 'लवणधेनु' की दानविधि १७३
दानके साथ अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार अथवा सौ सोनेके सिक्के देने चाहिये। महाराज ! 'क्षीरधेनु' देनेसे जो फल होता है, अब उसे सुनो—इसका दाता साठ हजार वर्षोंतक इन्द्रलोकमें स्थान पाता है। फिर वह उत्तम माला और चन्दनसे सुशोभित होकर अपने पिता-पितामह आदिके साथ दिव्य विमानमें सवार होकर ब्रह्मलोकको जाता है। वहाँ वह बहुत दिनोंतक आनन्दका अनुभव करके फिर सूर्यके समान प्रकाशमान उत्तम विमानपर सवार होकर वह विष्णुलोकमें जाता है। जाते समय मार्गमें अप्सराएँ उसकी संगीत और वाद्योंसे सेवा करती हैं। वह विष्णुभवनमें बहुत दिनोंतक रहकर फिर श्रीविष्णुमें ही लीन हो जाता है। राजन् ! जो पुरुष इस 'क्षीरधेनु' के प्रसङ्गको सुनता है अथवा भक्तिभावसे पढ़ता है, वह सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें चला जाता है।
पुरोहित होताजी कहते हैं—राजन् ! अब मैं तुम्हें 'दधिधेनु'का विधान बताता हूँ, सुनो। पहले गोबरसे 'गोचर्म' के प्रमाणयुक्त पृथ्वीको लीपकर उसे पुष्पोंसे सुशोभित कर ले और उसपर कुशा बिछा देना चाहिये। फिर उसपर काला मृगचर्म और कम्बल बिछाकर पृथ्वीपर सप्तधान्य बिखेर दे और उसके ऊपर दहीसे भरा हुआ एक घड़ा रखे। उसके चौथाई भागमें बछड़ेके लिये छोटा कलश रखनेका विधान है। सोनेसे उसके मुखकी शोभा बनाये और दो वस्त्रोंसे आच्छादित करके फूल और चन्दनसे उसकी पूजा करे। तत्पश्चात् जो कुलीन एवं साधु स्वभावका हो तथा क्षमा आदि गुणोंसे युक्त हो—ऐसे बुद्धिमान् ब्राह्मणको वह दधिधेनु दान कर दे। धेनुके पुच्छभागमें बैठकर यह विधि सम्पन्न करनी चाहिये। अँगूठी और कानके भूषणोंसे अलंकृतकर खड़ाऊँ, जूता और छाता देकर 'दधिक्राव्णोअकारिषं०' (ऋक्० ४। ३९। ६)—यह मन्त्र पढ़कर भलीभाँति सुपूजित 'दधिधेनु' का दान करे। राजेन्द्र! जिस दिन यह दधिमयी धेनु दे, उस दिन दही खाकर ही रह जाय। राजन् ! यजमान एक दिन दहीके आहारपर रहे और ब्राह्मणको तीन रात्रियोंतक दहीके आहारपर रहना चाहिये। जो दधिधेनुके दान करते समय इस दृश्यको देखते हैं, उनको परम पदार्थ प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य श्रद्धाके साथ इस प्रसङ्गको सुनता अथवा किसी दूसरेको सुनाता है, वह भी अश्वमेध-यज्ञके फलको प्राप्तकर विष्णुलोकमें चला जाता है। [अध्याय १०५-१०६]
'नवनीतधेनु' तथा 'लवणधेनु' की दानविधि
पुरोहित होताजी बोले—राजन् ! अब 'नवनीतधेनु' के दानकी विधि सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट सकता है। 'गोचर्मप्रमाण'-की भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर काला मृगचर्म बिछाकर ढाई सेर वजनका मक्खनसे भरा हुआ एक घड़ा वहाँ स्थापित करे। उसके उत्तर दिशामें चतुर्थांश भागवाला एक कलश बछड़ेके प्रतिनिधिस्वरूप रखे। राजन् ! उस घड़ेपर ही सोनेकी सींग और सुन्दर मुखकी रचना करनी चाहिये। मोतियोंसे उसके नेत्र तथा गुड़से जीभ बनाये। फूलोंद्वारा उसके होंठ, फलोंद्वारा दाँत तथा स्वच्छ सूत्रोंद्वारा उसका गलकम्बल बनाये, अथवा शर्करासे उसकी जीभ एवं रेशमी सूत्रोंसे उसके गलकम्बलका निर्माण करे। राजन् ! मक्खनसे उसका थन बनाये, ईखसे चरण, उसकी ताम्रमय पीठ, रौप्यमय खुरकी रचनाकर दर्भमय