भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १०७-१०८

रोमोंसे उस धेनुको अलंकृत करे। पासमें पञ्चरत्न रखकर उसके चारों ओर तिलसे भरे हुए चार पात्र रख दिये जायँ। उस कलश (-रूपी गौ)-को दो वस्त्रोंसे ढककर चन्दन और फूलसे सुशोभित करे। फिर चारों दिशाओंमें दीपक प्रज्वलित कर वह गौ ब्राह्मणको अर्पण कर दे। पूर्वोक्त धेनुओंके विषयमें जो मन्त्र कहे गये हैं, उन्हीं मन्त्रोंका यहाँ भी जप करना चाहिये। साथमें इतना अधिक कहे—देवि! पूर्व समयमें सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने मिलकर समुद्रका मन्थन किया था। उस अवसरपर यह दिव्य अमृतमय पवित्र नवनीत निकला, जिससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी तृप्ति होती है। ऐसे नवनीतको मेरा नमस्कार! ऐसा कहकर परिवारवाले ब्राह्मणको वह गौ देना चाहिये। धेनु देनेके पश्चात् दोहनीपात्र और उसके उपकरण दे तथा उस गौको ब्राह्मणके घरतक पहुँचा दे। राजन्! इस धेनुका दान लेनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि उस दिन वह हविष्य तथा रसपर ही रह जाय और देनेवाला भी इसी प्रकार तीन दिनोंतक रहे। राजन्! धेनुदान करते समय इस दृश्यको देखनेवाला भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर भगवान् शिवके सायुज्यको प्राप्त कर लेता है। वह मानव अपने पहले हुए पितरों तथा आगे होनेवाले संततियोंके साथ प्रलयपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास करता है। जो भक्तिपूर्वक इस प्रसङ्गको सुनता तथा सुनाता है, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे शुद्ध होकर विष्णुलोकमें सम्मानित होता है।

पुरोहित होताजी बोले— राजेन्द्र! अब 'लवणधेनु' दानका प्रसङ्ग सुनो। मनुष्यको चाहिये कि वह एक मन वजनके नमकसे एक धेनु बनाकर लिपी हुई पवित्र भूमिपर मृगचर्मके ऊपर कुशा बिछाकर उसपर इस लवणमयी धेनुकी स्थापना करे। साथमें चार सेर नमकका एक बछड़ा भी बनाना चाहिये, जिसके चरण ईखसे बने हों। उसके मुँह और सींग सोनेके तथा खुर चाँदीके होने चाहिये। राजन्! उसके मुखका अन्तर्भाग गुड़्का, दाँत फलके, जीभ शर्कराकी, नासिका चन्दनकी, आँखें रत्नकी, कान पत्तोंके, कोख श्रीखण्डकी, थन नवनीतके, पुच्छ सूत्रमय, पृष्ठ ताम्रमय और उसके रोयें कुशके हों। राजेन्द्र! पासमें काँसेकी दोहनीपात्र भी रखना चाहिये। फिर घण्टा और आभूषणोंसे उस धेनुको भूषित करे। चन्दन, फूल और धूप आदिसे विधिपूर्वक उसकी पूजाकर दो वस्त्रोंसे ढककर फिर उसे ब्राह्मणको अर्पण कर दे। नक्षत्र और ग्रहोंद्वारा कष्ट होनेपर मनुष्य किसी भी समय लवणधेनुका दान कर सकता है। वैसे ग्रहण, संक्रान्तिकाल, व्यतीपात योग और अयन बदलते समय इसके दानकी विशेष विधि है। दान ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण साधु-स्वभावका, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, बुद्धिमान्, वेद और वेदान्तका पूर्ण विद्वान्, श्रोत्रिय और अग्निहोत्री होना चाहिये तथा राजन्! ऐसे ब्राह्मणको, जो अमत्सरी-(किसीसे द्वेष न करता) हो, उसे यह गौ देनी चाहिये। इस प्रकार पूजा करके मन्त्र पढ़कर गौके पूँछकी ओर बैठकर गौका दान करना चाहिये। साथ ही छाता-जूता भी दान करना चाहिये। फिर उसे दो वस्त्रोंसे ढककर अँगूठी, कानके कुण्डलोंसे पूजा करके दक्षिणा और कम्बल प्रदान करे। पहले कही हुई विधिका पालन करनेके साथ अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे ब्राह्मणकी विधिवत् पूजाकर ब्राह्मणके हाथमें दक्षिणासहित गौकी पूँछ पकड़ा दे। साथ ही दान करते समय कहना चाहिये—'ब्राह्मणदेव! आप इस रुद्ररूपी धेनुको स्वीकार करें। आपको मेरा नमस्कार है।' फिर गौसे प्रार्थना करे—'परमवन्दनीये! रुद्ररूपिणी