वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०९-११०] 'कार्पास' एवं 'धान्य-धेनु' की दानविधि १७५
गो! तुम्हें नमस्कार। तुम मेरा मनोरथ पूर्ण करो। लवणधेनु दानकर दाता एक दिन लवणके आहारपर रहे और लेनेवाले ब्राह्मणको तीन रातोंतक लवणके आहारपर रहना चाहिये। दाता इस दानके फलस्वरूप, जहाँ भगवान् शंकरका निवास है, उसे प्राप्त कर लेता है। जो भक्तिके साथ इसका श्रवण करता है अथवा दूसरेको सुनाता है, वह मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर भगवान् रुद्रके लोकको प्राप्त करता है।
[अध्याय १०७-१०८]
'कार्पास' एवं 'धान्य-धेनु'की दानविधि
पुरोहित होताजी कहते हैं—राजन्! अब कर्पासमयी धेनुके दानकी विधि बताता हूँ, जिसके प्रभावसे मनुष्य उत्तम इन्द्रलोकको प्राप्त करता है। विषुवयोग, अयनके परिवर्तनका समय, युगादितिथि, ग्रहणके अवसर, ग्रहोंकी पीड़ा, दुःस्वप्न-दर्शन तथा अरिष्टकी सम्भावना होनेपर मनुष्योंके लिये यह कर्पासधेनुका दान श्रेयोवह होता है। राजन्! दानके लिये गायके गोबरसे लिपी भूमिपर कुश बिछाकर उसपर तिल बिखेरकर बीचमें वस्त्र और मालासे सुशोभित (कपाससे बनी) धेनुकी स्थापना करनी चाहिये। धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे श्रद्धापूर्वक (मात्सर्यरहित होकर) उसकी पूजा करनी चाहिये। कृपणताका त्यागकर चार भार कपाससे सर्वोत्तम गौकी रचना करे। दो भारसे गौकी रचना करना मध्यम तथा एक भारसे बनी हुई धेनु अधम श्रेणीकी कही गयी है। धनकी कंजूसीका सर्वथा त्याग करना अनिवार्य है। गायके चौथाई भागमें बछड़ेकी कल्पना करके उसका दान करना चाहिये। सोनेका सींग, चाँदीका खुर, अनेक फलोंके दाँत और रत्नगर्भसे युक्त धेनु होनी चाहिये। श्रद्धाके साथ ऐसी सर्वाङ्गपूर्ण कर्पासमयी धेनु बनाकर उसका मन्त्रोंके द्वारा आह्वान एवं प्रतिष्ठाकर उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। श्रद्धाके साथ संयमपूर्वक गौको हाथसे स्पर्श करके दान करना चाहिये। पूर्वोक्त विधिका पालन करते हुए मन्त्र पढ़कर
दान करे। मन्त्रका भाव इस प्रकार है—'देवि! तुम्हारे अभावमें किसी भी देवताका कार्य नहीं चलता, यदि यह बात सत्य है तो देवि! तुम इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो! मेरा उद्धार करो!'
पुरोहित होताजी कहते हैं—राजन्! अब धान्यमयी धेनुका प्रसङ्ग सुनो, जिससे स्वयं पार्वतीजी भी संतुष्ट हो जाती हैं। विषुवयोग, अयनके परिवर्तनका समय अथवा कार्त्तिककी पूर्णिमाके शुभ समयमें इस दानका विशेष महत्त्व है। इसके दान करनेसे जैसे राहुसे चन्द्रमाका उद्धार होता है, वैसे ही मनुष्य पापसे छूट जाता है। अब उसी धेनुदानकी उत्तम विधि मैं कहता हूँ। राजेन्द्र! दस धेनु-दान करनेसे जो फल मिलता है, वह फल एक धान्यमयी धेनुके दानसे सुलभ हो जाता है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पहलेकी भाँति गोबरसे लिपी हुई पवित्र भूमिपर काले मृगका चर्म बिछाकर उसपर इस धान्य-धेनुकी स्थापनाकर उसकी पूजा करे। चार द्रोण, छः मन वजनके अन्नसे बनी हुई धेनु उत्तम और दो द्रोण, तीन मन अन्नके बनी धेनु मध्यम मानी गयी है। सोनेके सींग, चाँदीके खुर, रत्न-गोमेद तथा अगुरु एवं चन्दनसे उस गायकी नासिका, मोतीसे दाँत तथा घी और मधुसे उस गायके मुखकी रचना करे। श्रेष्ठ वृक्षके पत्तोंसे कानकी रचनाकर काँसेका दोहनीपात्र उसके साथमें रखना चाहिये। उसके चरण ईखके और