भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 237
२२६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२१

है, पुत्रजीवककी माला मध्यम एवं कमलगट्टेकी माला कनिष्ठ समझनी चाहिये। देवि! यह दीक्षाप्रसङ्गका मैंने तुमसे वर्णन किया। यह ‘गणान्तिका’ नामकी प्रसिद्ध दीक्षा शुद्धस्वरूप, सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये हितकारी तथा मोक्ष चाहनेवालोंके लिये उत्तम साधन है। साधक जप करनेकी इस मालाको जूठे हाथ न छुए और न इसे स्त्रियोंके हाथमें ही दे, बायें हाथसे भी इसका स्पर्श न करे। इसे अन्तरिक्ष (दीवाल)-में किसी कीलके सहारे लटका देना चाहिये। जपके समय इसे किसीको दिखाना भी ठीक नहीं है। जपके पूर्व एवं उपरान्त इसकी भी पूजा-स्तुति करनी चाहिये।

देवि! यह मैंने तुमसे दीक्षाका गूढ़ रहस्य बतलाया। जो पुरुष मेरी उपासनामें परायण होकर इस विधिके अनुसार मेरे (भगवत्सम्बन्धी) इन कर्मोंको सम्पन्न करता है, वह अपने सात कुलोंको तार देता है। [अध्याय १२८]


पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा

**पृथ्वी बोली—**भगवान्! अब आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि आपके उपासक पुरुषको संध्या आदि कर्म तथा आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये?

**भगवान् वराह कहते हैं—**माधवि! संध्यामें संसारसे मुक्त करनेकी शक्ति है। अतः प्रातःकाल शौच-स्नानादिसे निवृत्त होकर विधिपूर्वक संध्याकी उपासना करनी चाहिये। पहले श्रद्धालु पुरुष हाथमें एक अञ्जलि जल लेकर कुछ क्षणतक मेरा ध्यान करे। फिर कहे—‘भगवान्! आदिकालमें आप ही व्यक्तरूपसे विराजमान थे। आपसे संसारकी सृष्टि हुई। ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य सभी देवता आपसे ही उत्पन्न होकर आपके ध्यानमें तत्पर हुए। वे संध्याके समयमें ध्यानद्वारा आपकी आराधना करते हैं। आप ही सातों दिन, पक्ष, मास, ऋतु आदि कालक्रमकी व्यवस्था करनेके लिये सूर्यरूपसे प्रकट हैं। अतः भगवान्! इस संध्याकालमें हम आपकी उपासना करते हैं। आपको हमारा नमस्कार है।’ उपासनाका यह विषय अत्यन्त गोपनीय, रहस्यमय तथा परम श्रेष्ठ है। जो इसका सदा पाठ करता है, वह पापसे लिप्त नहीं हो सकता। जिसने दीक्षा नहीं ली है एवं यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है, उसे कभी भी इस मन्त्रको नहीं बताना चाहिये।

देवि! संध्याके बाद मेरी पूजाके लिये पहले ‘कर्माङ्गदीपक’ जलानेकी विधि है। इसके लिये साधक पुरुष यों प्रार्थना करे—‘भगवान्! मैं आपके धर्मोंका पालन करता हुआ यह उत्तम दीप अर्पण कर रहा हूँ, आप इसे कृपाकर स्वीकार कीजिये।’ फिर घुटनोंके बल बैठकर कहे—‘विष्णो! ‘ॐ’ आपका स्वरूप है। आप ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण, कृपामय एवं तेजस्वरूप हैं। आपको मेरा नमस्कार है। भगवान्! आपकी आज्ञासे समस्त देवता अग्निमें निवास करते हैं। अग्निमें जो दाहिका शक्ति है, वह आपका ही तेज है। मुझमें और मन्त्रमें भी आपका ही तेज काम कर रहा है। यह दीपक तथा सभी वैदिक-तान्त्रिक मन्त्र भी आपके ही स्वरूप हैं। आप ही समस्त कल्याणोंके स्रोत हैं। आप यह दीपक स्वीकार करें।’

तदनन्तर मेरा उपासक अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, चन्दन, पुष्प आदिसे मेरा अर्चन कर, धूप दिखलाये। धूप उत्तम गन्धसे युक्त और मनको