भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १२९ ] पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा २२७

आकृष्ट करनेवाला हो। उसे हाथमें लेकर ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रका उच्चारण कर इस प्रकार कहे—'केशव! आपके अङ्ग तो स्वभावतः सुगन्धित हैं ही; फिर भी मैं इन्हें इस सुन्दर गन्धवाले धूपसे सुगन्धित करना चाहता हूँ। फलस्वरूप मेरे भी सभी अङ्गोंको गन्धयुक्त बनानेकी कृपा करें। प्रभो! आपको धूप अर्पण करना साधकके लिये सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेका परम साधन है।'

इस प्रकार उत्तम दीपक हाथमें लेकर घुटनेके बल बैठ जाय और पूजाकर पुनः कहे—'विष्णो! आपके लिये नमस्कार है। आप परम तेजस्वी हैं। सम्पूर्ण देवता अग्निमें निवास करते हैं। और अग्नि आपके ही तेजसे प्रतिष्ठित है। तेज स्वयं आपका आत्मा है। भगवन्! प्रकाशमान यह दीप तेजोमय है। संसारसे मुक्त होनेके लिये मैं इसे आपको अर्पण करता हूँ। आप इसे स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये। आप मूर्तिमान् होकर मेरे इस अर्पणको सफल बनाइये।' वसुंधरे! जो इस प्रकार मुझे दीपक अर्पण करता है, उसके समस्त पिता-पितामह आदि पितर तर जाते हैं।

भगवान् नारायणकी इस प्रकारकी बात सुनकर पृथ्वीका मन आश्चर्यसे भर गया। अतः उन्होंने पूछा—'भगवन्! मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपके पूजाकी सामग्री कैसे पात्रोंमें रखी जानी चाहिये, जिससे आपको प्रसन्नता प्राप्त हो? भगवन्! इसे आप तत्त्वतः बतानेकी कृपा कीजिये।'

भगवान् वराह बोले—'देवि! मेरी पूजाके पात्र सोने, चाँदी और काँसे आदिके भी हो सकते हैं, किंतु उन सबको छोड़कर मुझे ताँबेका पात्र ही बहुत अच्छा लगता है।' भगवान् नारायणकी यह बात सुनकर धर्मकी इच्छा रखनेवाली पृथ्वी देवीने उन जगत्प्रभुके प्रति यह मधुर वचन कहा—'भगवन्! आपको ताँबेका पात्र ही अधिक रुचता है, इसका रहस्य क्या है, यह मुझे बतलानेकी कृपा करें।'

उस समय पृथ्वीका प्रश्न सुनकर अनादि, परम स्वतन्त्र भगवान् नारायण, जो विश्वमें सबसे बड़े देवता हैं, पृथ्वीसे इस प्रकार बोले—'माधवि! आजसे सात हजार युग पूर्व ताँबेकी उत्पत्ति हुई थी और वह मुझे देखनेमें अधिक प्रिय प्रतीत हुआ। कमलनयने! पूर्व समयमें 'गुडाकेश' नामका एक महान् असुर ताँबेका रूप बनाकर मेरी आराधना करने लगा। विशालाक्षि! उसने धर्मकी कामनासे चौदह हजार वर्षोंतक कठोर तप करते हुए मेरी आराधना की। उसके हार्दिक भाव एवं तीव्र तपसे मैं संतुष्ट हो गया, अतः ताँबेके समान चमकनेवाले उस दिव्य स्थानपर मैं गया, जहाँ ताँबेकी उत्पत्ति हुई थी। देवेश्वरि! उस आश्रमको देखकर मैंने उससे प्रसन्न होकर कुछ बातें कहीं। इतनेमें वह महान् असुर मुझे देखकर घुटनोंके बल बैठ गया और मेरी स्तुति करने लगा। फिर मेरी उपासनामें तत्पर रहनेवाले उस 'गुडाकेश' नामक असुरने मेरे चतुर्भुज रूपको देखा तो नम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लिया और भूमिपर मस्तक झुकाकर मेरी प्रार्थनाके लिये उद्यत हो गया। उस असुरको देखकर मेरा अन्तःकरण प्रसन्न हो गया और मैंने उससे कहा—'गुडाकेश! तुम बड़े भाग्यशाली हो। कहो, मैं तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य करूँ? सुव्रत! मेरी आराधना बड़ी कठिन वस्तु है, फिर भी तुम्हारी मन-क्रम-वचनोंद्वारा सम्पादित भक्तिसे मैं परम संतुष्ट हूँ। अनघ! अब तुम्हें जो रुचे, तुम वह वर माँग लो।'

वसुंधरे! मेरी इस प्रकारकी बात सुनकर गुडाकेशने हाथ जोड़कर शुद्ध हृदयसे कहा—'देव! यदि आप सचमुच मुझपर अन्तर्हृदय एवं मनसे प्रसन्न हैं तो मुझपर ऐसी कृपा करें कि हजारों जन्मोंतक मेरी आपमें दृढ़ भक्ति बनी रहे। केशव! साथ ही मेरी यह इच्छा है कि आपके हाथसे