भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३४ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय १३५-१३६ ]

अब मैं रात्रिके अन्धकारमें दीपरहित स्थितिमें अपने स्पर्शदोषका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे दोष-मुक्त होकर वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति अनन्य भक्तिभावसे पंद्रह दिनोंतक आँखें ढककर रहे और बीस दिनोंतक सावधान होकर एक समय भोजन करे और फिर जिस किसी भी महीनेकी द्वादशी तिथिको एक समय भोजन करके और जल पीकर रह जाय। इसके पश्चात् गोमूत्रमें सिद्ध किया हुआ यवान्न भक्षण करे। इस प्रायश्चित्तके प्रभावसे वह इस दोषसे मुक्त हो जाता है।

देवि! जो व्यक्ति काला वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, उसका भी पतन होता है। वह अगले जन्ममें पाँच वर्षोंतक लाक्षा (लाह) आदि वस्तुओंमें रहनेवाला घुन होता है, फिर पाँच वर्षोंतक नेवला और दस वर्षोंतक कछुआ होकर रहता है। फिर कबूतरकी योनिमें जन्म लेकर वह चौदह वर्षोंतक मेरे मन्दिरके पार्श्वभागमें रहता है। अब उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। उसे चाहिये कि सात दिनोंतक यवके आटेकी लपसी और तीन दिनोंतक यवके सत्तूकी एक पिण्डी तथा तीन रातोंतक तीन-तीन पिण्डियाँ खाय। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। जो बिना धोये वस्त्र पहनकर मेरी उपासनामें लग जाता है, वह भी इस अपराधसे संसारमें गिर जाता है। जिसके फलस्वरूप वह एक जन्मतक मतवाला हाथी, एक जन्मतक ऊँट, एक जन्ममें भेड़िया, एक जन्ममें सियार और फिर एक जन्ममें घोड़ा होता है। इसके बाद वह एक जन्ममें मोर और पुनः एक जन्ममें मृग भी होता है। इस प्रकार सात जन्म व्यतीत होनेपर उसे मनुष्यकी योनि मिलती है। उस जन्ममें वह मेरा भक्त, गुणज्ञ-पुरुष और कार्यकुशल होकर मेरी उपासनामें परायण होता है तथा निरपराधी और अहंकार-शून्य जीवन व्यतीत करता है। अब उसके शुद्ध होनेका उपाय बतलाता हूँ, उसे सुनो, जिससे उसे हीन योनियोंमें नहीं जाना पड़ता। वह क्रमशः तीन दिनोंतक यव, तीन दिन तिलकी खली और फिर तीन दिनोंतक वह पत्ते, जल, खीर एवं वायुके आहारपर रह जाय। इस प्रकारके नियमका पालन करनेसे अशुद्ध वस्त्र पहननेवाले उपासकका दोष मिट जाता है और उसे कई जन्मोंतक संसारमें भटकना नहीं पड़ता।

देवि! जो मानव बत्तख आदि पक्षियों या किसी भी प्रकारका मांस खाकर मेरी पूजामें लगता है, वह पंद्रह वर्षोंतक बत्तखकी योनिमें रहता है। फिर वह दस वर्षोंतक तेंदुआ नामक हिंसक वन्य जन्तु होता है और पाँच वर्षोंतक उसे सूअर बनना पड़ता है। मेरे प्रति किये गये उस अपराधसे उसे इतने वर्षोंतक संसारमें भटकना पड़ता है। इस प्रकारके मांस खानेवाले व्यक्तिके लिये प्रायश्चित्त यह है कि वह क्रमशः तीन-तीन दिनोंतक यव, वायु, फल, तिल, बिना नमकके अन्नके आहारपर रहे। इस प्रकारका पंद्रह दिनोंमें प्रायश्चित्त पूराकर एक बारके मांसभक्षणदोषसे शुद्ध होता है। बार-बारके ऐसे अपराधोंका कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! दीपकका स्पर्श करके हाथ धो लेना चाहिये, अन्यथा इससे भी दोषका भागी बनना पड़ता है। महाभागे! इसके प्रायश्चित्तका यह रूप है कि जिस किसी भी महीनेके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके शुभ अवसरपर दिनके चौथे भागमें भोजन करके ठंडी ऋतुमें रात्रिके अवसरपर खुले आकाशमें सोये, फिर दीपदानकर इस दोषसे वह मुक्त हो जाता है। भद्रे! न्यायके अनुसार इस कर्मके प्रभावसे पुरुषमें पवित्रता आ जाती है और वह मेरे कर्म-पथपर आरूढ़ हो जाता है। दीपक-स्पर्श करके बिना हाथ धोये हुए मेरे कर्ममें लगनेका यह प्रसङ्ग तुम्हें बतला दिया। यह प्रायश्चित्त संसारमें शुद्ध करनेके लिये परम