वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३५-१३६] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३५
साधन है, जिसका पालन करके पुरुष कल्याण प्राप्त कर लेता है।
देवि! जो मनुष्य श्मशानभूमिमें जाकर बिना स्नान किये ही मुझे स्पर्श करता है, उसे भी सेवापराधका दोष लगता है, फलस्वरूप वह चौदह वर्षोंतक पृथ्वीपर शृगाल होकर रहता है। फिर सात वर्षोंतक आकाशमें उड़नेवाला गीध होता है। इसके पश्चात् चौदह वर्षोंतक उसे पिशाचयोनिमें जाना पड़ता है।
पृथ्वी बोली—जगत्प्रभो! भक्तोंकी याचना पूर्ण करना आपका स्वभाव है। आपने यह जो परम गोपनीय विषय कहा है, इससे मुझे अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है, अतः प्रभो! आपसे मेरी प्रार्थना है कि वह सम्पूर्ण विषय मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें। कमललोचन भगवान् शंकरने तो श्मशानकी बड़ी प्रशंसा की है और उसे पवित्र बतलाया है, फिर वहाँ दोष क्या है? रुद्र तो परम बुद्धिमान् हैं, उनमें किसी ऐश्वर्यकी भी कमी नहीं है, तब भी वे दीप्तिमान् कपालको लिये सदा श्मशानभूमिमें विराजते हैं, फिर आप उसकी निन्दा कैसे करते हैं?
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! पवित्र व्रत करनेवाले पुरुष भी आजतक इस रहस्यसे अनभिज्ञ हैं। अखिल भूतोंके अध्यक्ष भगवान् शंकरको कोई नहीं जानता। उन्होंने त्रिपुरवधके समय बहुतेरे बालक-वृद्धों तथा बहुत-सी स्त्रियोंको भी मार डाला था, अतएव उस पापसे वे बड़े दुःखी थे। उस समय मैंने उन नष्टैश्वर्य भगवान् शंकरका स्मरण किया और वे मेरे पास पहुँचे। उस समय ज्यों ही मैंने उनपर अपनी दिव्य दृष्टि डाली कि वे पुनः सम्पूर्ण भूतोंके शासक महान् रुद्र बन गये। उस समय उनकी इच्छा मेरे यजनकी हुई, पर सहसा उनका ज्ञान और योगका बल नष्ट-सा हो गया। तब मैंने उनसे कहा—'प्रभो! आप ऐसे मुग्ध-से क्यों बैठे हैं? (आप मोहसे कैसे घिरे हैं?) बनाना, बिगाड़ना और बिगड़े हुएको पुनः बनाना—यह सब तो आपके हाथकी बात है। मृत्यु आपके अधीन रहती है, आप सबके मूल कारण और परमाश्रय हैं, आपको देवताओंका भी देवता कहा जाता है, आप साम और ऋक्स्वरूप हैं। देवेश्वर! आपकी इस म्लानताका कारण क्या है? आप कृपया इन्हें स्पष्टरूपसे बतलाइये। आप अपने योग और मायाको भी सँभालें। देखें, यह परब्रह्म परमेश्वरकी लीला है। मेरे मनमें आपको प्रसन्न करनेकी इच्छा हुई है, अतएव मैं यहाँ आया हूँ।'
वसुंधरे! फिर तो मेरी बात सुनकर शंकरजीको पूर्ण ज्ञान हो गया। उन्होंने मधुर वाणीमें मुझसे कहा—'नारायण! आप ध्यान देकर मेरी वाणी सुननेकी कृपा कीजिये। आप सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र शासक हैं। विष्णो! अब आपकी कृपासे मुझमें पुनः देवत्व जाग्रत् हो गया। माधव! मुझे योगकी उपलब्धि हो गयी और सांख्यका ज्ञान भी सुलभ हो गया, मेरी चिन्ताएँ शान्त हो गयीं, यही नहीं, आपकी कृपासे पूर्णमासीके अवसरपर उमड़नेवाले समुद्रकी भाँति मैं आनन्दमय बन गया हूँ। भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले भगवन्! मैं आपको तत्त्वतः जानता हूँ और आप मुझे। हम दोनोंकी अभिन्नताको दूसरा कोई भी नहीं देख सकता है। आप महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं। सम्पूर्ण मायाकी रचना आपके द्वारा हुई है।'
माधवि! भूतगणोंके महान् अधिष्ठाता रुद्रने इस प्रकार मुझसे कहा और एक मुहूर्त्ततक वे ध्यानमें बैठे रहे। इसके बाद पुनः मुझसे कहा—'विष्णो! आपकी कृपासे ही मैंने त्रिपुरासुरका वध किया था, उस समय मैंने बहुत-से दानवों और गर्भिणी स्त्रियोंका भी संहार कर दिया था। दसों दिशाओंमें भागते हुए बालक एवं वृद्धोंको भी मैंने मार डाला था। उस पापके कारण मैं योगमाया और ऐश्वर्योंसे शून्य हो गया हूँ। आपसे