भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३५-१३६

मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसके आचरणसे मेरे पाप नष्ट हो जायँ और मैं शुद्ध हो जाऊँ।

भगवान् रुद्रको इस प्रकार चिन्तित देखकर मैंने उनसे कहा—'शंकरजी! आप कपालकी माला धारण करें और 'समल'-स्थानमें चले जायँ।' उस समय मेरी ऐसी बात सुनकर उन भूतभावन भगवान् भवने मुझसे पुनः कहा—'जगत्प्रभो! वह 'समल'-स्थान कहाँ है? आप मुझे बोध देकर पूर्णरूपसे समझानेकी कृपा करें।' इसपर मैंने उनसे कहा—'शंकरजी! श्मशान ही रक्त-पीबके गन्धसे युक्त 'समल'-स्थान है, जहाँ कोई भी मनुष्य जाना नहीं चाहता। वहाँ मनुष्य जाकर स्पृहारहित हो जाता है। शिवजी! आप कपालोंको लेकर वहीं रमण करें। अपने व्रतमें अटल रहकर देवताओंके वर्षसे आप एक हजार वर्षतक वहाँ रहें और पापोंको नष्ट करनेके लिये आप वहाँ रहकर मौनव्रतका पालन करें। पूरे एक हजार वर्षतक उस श्मशान-भूमिमें रहनेके पश्चात् आप मुनिवर गौतम मुनिके आश्रमपर जायँ। वहाँ आपको पूर्ण आत्मज्ञानकी उपलब्धि हो जायगी और उस समय आप इस कपालसे भी मुक्त हो जायँगे।'

वसुंधरे! इस प्रकार रुद्रको वर देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और रुद्र भी गजचर्मसे आच्छन्न होकर श्मशान-भूमिमें भ्रमण करते हुए निवास करने लगे। इसीलिये श्मशान-भूमि मुझे पसंद नहीं है और मैंने श्मशान-भूमिको निन्दित बताया है। वहाँ जाकर बिना संस्कार किये हुए प्राणीको मेरी पूजा-अर्चामें उपस्थित नहीं होना चाहिये। अब वह प्रायश्चित्त बताता हूँ, जिसका पालन करनेसे साधक इस पापसे छूट जाता है। वह पंद्रह दिनोंतक दिनके चौथे भागमें एक बार भोजन करे। रातमें एक वस्त्र पहनकर कुशके बिस्तरपर आकाश-शयन करे, अर्थात् शीतकालकी रात्रिमें खुले आकाशके नीचे शयन करे और प्रातःकाल उठकर वह पञ्चगव्यका प्राशन करे। ऐसा करनेसे उसके पापकर्मका परिमार्जन हो जाता है और वह पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

सुश्रोणि! इसी प्रकार जो व्यक्ति हींग खाकर मेरी उपासना करता है, उसे भी दोष लगता है, अब उसके पापका परिणाम तथा शोधन करनेवाला प्रायश्चित्त सुनो। वह जन्मान्तरमें दस वर्षोंतक उल्लू और तीन वर्षोंतक कछुआ होकर निवास करता है। तदनन्तर उसे फिरसे मनुष्यकी योनि मिलती है और मेरी उपासनामें उसकी रुचि होती है। वसुंधरे! इन प्रमादियोंके लिये तथा जिन्हें इस संसारमें केवल दूसरोंके दोष ही दिखायी पड़ते हैं, उनके मुक्त होनेके लिये मैं एक महान् ओजस्वी प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिसका पालन-कर वह पवित्र होकर संसार-सागरको पार कर जाता है। इस पापसे छूटनेके लिये मनुष्यको एक दिन यवकी लपसी खाकर तथा एक दिन गोमूत्रके आहारपर रहना चाहिये। रातमें वह वीरासनसे बैठकर तथा आकाश-शयनद्वारा कालक्षेप करे। इस विधिका पालन करनेसे वह पुरुष संसारमें न जाकर मेरे लोकमें पहुँच जाता है।

सुशोभने! जो दम्भी मनुष्य मदिरा-पानकर मेरी उपासनामें सम्मिलित होता है, उसका दोष बताता हूँ, तुम मनको एकाग्र करके सुनो। इस अपराधके कारण वह व्यक्ति दस हजार वर्षोंतक दरिद्र होता है। जो मेरा भक्त है और जिसने वैष्णव दीक्षा भी ग्रहण कर ली है, वह यदि कोई कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मोहित होकर मद्य पी लेता है तो उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं