वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ ] रैभ्य-सनत्कुमार-संवाद, गयामें पिण्डदानकी महिमा २७
हो ?' इतना कहकर वह दिव्य पुरुष बढ़ने लगा और उसने अपने शरीरसे पृथिवी एवं आकाशके मध्यभागको व्याप्त कर लिया। सूर्यके समान देदीप्यमान उसके विमानने भी सम्पूर्ण भूगोल और खगोलको एवं साथ-ही-साथ विष्णुलोकको भी व्याप्त कर लिया। तब रैभ्यने अत्यन्त आश्चर्ययुक्त होकर उस योगीसे पूछा—'योगीश्वर ! आप कौन हैं ? मुझे बतानेकी कृपा करें।'
उस तेजोमय पुरुषने कहा—रैभ्य ! मैं ब्रह्माजीका मानस पुत्र सनत्कुमार हूँ। रुद्र मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं। मेरा जनलोकमें निवास है। तपोधन ! तुम्हारे पास प्रेमके वशीभूत होकर मैं आया हूँ। वत्स ! तुमने ब्रह्माजीकी सृष्टिका विस्तार किया है। तुम धन्य हो !
मुनिवर रैभ्यने पूछा—योगिराज ! आपको मेरा नमस्कार है। यह सारा विश्व आपका ही रूप है। आप प्रसन्न हों और मुझपर दया करें। योगीश्वर ! कहिये, मैं आपके लिये क्या करूँ ? अभी आपने मुझे जो धन्य कहा है, इसका क्या रहस्य है ?
सनत्कुमारजीने कहा—रैभ्य ! तुमने गयातीर्थमें जाकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक पिण्डदानके द्वारा पितरोंको तृप्त किया है, श्राद्धकर्मके अङ्गभूत व्रत, जप एवं हवनकी भी विधि तुम्हारे द्वारा सम्पन्न हुई है। अतएव तुम ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ तथा धन्यवादके पात्र हो। इस विषयमें एक आख्यान है, वह मुझसे सुनो। विशाल नामसे विख्यात एक राजा हो चुके हैं। उनके नगरका नाम भी विशाल ही था। वे राजा निःसंतान थे, इससे शत्रुओंको पराजित करनेवाले उन परम धैर्यशाली राजा विशालके मनमें पुत्र-प्राप्तिकी इच्छा हुई। अतः उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे पुत्र-प्राप्तिका उपाय पूछा। उन उदारचेता ब्राह्मणोंने कहा—'राजन् ! तुम पुत्र-प्राप्तिके निमित्त गयामें जाकर पुष्कल अन्नदान करके पितरोंको तृप्त करो। ऐसा करनेसे तुम्हें अवश्य ही पुत्र प्राप्त होगा। वह महान् दानी एवं सम्पूर्ण भूमण्डलपर शासन करनेवाला होगा।'
ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर विशाल-नरेशके अङ्ग-प्रत्यङ्ग हर्षसे खिल उठे। तदनन्तर सूर्य जब मघा नक्षत्रपर आये, उस समय प्रयत्नपूर्वक गयातीर्थमें जाकर उन नरेशने विधि-विधानके साथ भक्तिपूर्वक पितरोंके लिये पिण्डदान किया। सहसा उन्होंने आकाशमें श्वेत, पीत एवं कृष्ण वर्णके तीन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा। उनको देखकर राजाने पूछा—'आपलोग कौन हैं ?'
श्वेत पुरुषने कहा—राजन् ! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है, साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्वल) हैं। (मेरे साथ) ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, मेरे पिता हैं। इन्होंने बड़े निष्ठुर कर्म किये हैं। ये ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। इनका नाम अधीश्वर है। ये कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक वयोवृद्ध ऋषियोंका वध किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं; अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता जो दीर्घ कालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया था—तुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे—तीनों ही बलात् मुक्त हो गये। शत्रुदमन ! पिण्डदानके समय 'मैं अपने पिता, पितामह और प्रपितामहको तृप्त करनेके लिये यह जल देता हूँ'—ऐसा कहकर जो तुमने जल दिया है, उसीके प्रभावसे हमलोग यहाँ एक साथ एकत्र होकर