वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ७
तुम्हारे समक्ष वार्तालाप कर सके हैं। अब मैं इस गया-तीर्थके प्रभावसे पितृलोकमें जा रहा हूँ। इस तीर्थमें पिण्डदान करनेके माहात्म्यसे ही ये तुम्हारे पितामह और प्रपितामह, जो पापी होनेके कारण दुर्गति को प्राप्त हो चुके थे एवं जिनके अङ्ग-प्रत्यङ्ग विकृत हो चुके थे, वे भी अब उत्तम लोकोंको प्राप्त हो रहे हैं। यह इस गयातीर्थका ही प्रताप है कि यहाँ पिण्डदान करनेके प्रभावसे पुत्र अपने ब्रह्मघाती पिताका भी पुनः उद्धार कर सकता है। वत्स! इसी कारण मैं इन दोनों—तुम्हारे पितामह और प्रपितामहको लेकर तुम्हें देखनेके लिये आ गया हूँ।
(सनत्कुमारजी कहते हैं—) महाभाग रैभ्य! यही कारण है कि मैंने तुमको धन्य कहा है। गयातीर्थमें एक बार जाना और पिण्डदान करना ही दुर्लभ है। फिर तुम तो प्रतिदिन यहाँ इस उत्तम कार्यका सम्पादन करते हो। मुनिवर! तुमने गदाधररूपमें विराजमान साक्षात् भगवान् नारायणका दर्शन कर लिया है। तुम्हारे इस पुण्यके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय? द्विजवर! इस गयाक्षेत्रमें भगवान् गदाधर सदा साक्षात् विराजते हैं। इसी कारण सम्पूर्ण तीर्थोंमें यह विशेष प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! ऐसा कहकर महायोगी सनत्कुमारजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तब मुनिवर रैभ्यने भगवान् गदाधरकी स्तुति करनी प्रारम्भ कर दी।
विप्रवर रैभ्य बोले—देवता जिनका स्तवन करते रहते हैं, जो क्षमाके धाम हैं, जो क्षुधा-ग्रस्त आर्तजनोंके दुःखोंको दूर करनेवाले हैं, जो विशाल नामक दैत्यकी सेनाओंका मर्दन करनेवाले हैं तथा जो स्मरण करनेसे समस्त अशुभोंका विनाश कर देते हैं, उन मङ्गलमय भगवान् गदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो पूर्वजोंके भी पूर्वज, पुराणपुरुष, स्वर्गलोकमें पूजित एवं मनुष्योंके एकमात्र परम आश्रय हैं, जिन्होंने वामन-अवतार ग्रहण करके दैत्यराज बलिके चंगुलसे पृथ्वीका उद्धार किया है, उन महाबलशाली शुद्धस्वरूप भगवान् गदाधरको मैं एकान्तमें नमस्कार करता हूँ। जो परम शुद्ध स्वभाववाले एवं अनन्त वैभवसम्पन्न हैं, लक्ष्मीने जिनका स्वयं वरण किया है, जो अत्यन्त निर्मल एवं विशिष्ट विचारशील हैं तथा पवित्र अन्तःकरणवाले भूपाल जिनका स्तवन करते हैं, ऐसे भगवान् गदाधरको जो प्रणाम करता है, वह जगत्में सुखसे रहनेका अधिकारी होता है। देवता और दानव जिनके चरणकमलोंकी अर्चना करते हैं, जो हार, केयूर, बाजूबंद एवं किरीट धारण किये हुए हैं तथा समुद्रमें शयन करते हैं, उन चक्रधारी भगवान् गदाधरकी जो वन्दना करता है, वही जगत्में सुखपूर्वक रहनेका अधिकारी है। जो भगवान् अच्युत सत्ययुगमें श्वेत, त्रेतामें अरुण, द्वापरमें पीत-वर्णसे अनुरञ्जित श्याम तथा कलियुगमें भौंरेके समान कृष्णवर्णयुक्त विग्रह धारण करते हैं, उन भगवान् गदाधरको जो प्रणाम करता है, वह जगत्में सुखपूर्वक निवास करता है। जिनसे सृष्टिके बीजरूप चतुर्मुख ब्रह्माका प्राकट्य हुआ है तथा जो नारायण विष्णुरूप धारण करके जगत्का पालन और रुद्ररूपसे संहार करते हैं एवं इस प्रकार जो ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—इन तीन मूर्तियोंमें विलसित होते हैं, उन भगवान् गदाधरकी जय हो। सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंका संयोग ही विश्वकी सृष्टिमें कारण बतलाया जाता है; किंतु इस प्रकार जो एक होकर भी इन तीन गुणोंके रूपमें अभिव्यक्त