भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

अध्याय ७ ] रैभ्य-सनत्कुमार-संवाद, गयामें पिण्डदानकी महिमा २९


होते हैं, वे भगवान् गदाधर धर्म एवं मोक्षकी कामनासे अधीर हुए मुझको धैर्य प्रदान करनेकी कृपा करें। जिस दयामय प्रभुने दुःखरूपी जल-जन्तुओं एवं मृत्युरूप ग्राहके भयंकर आक्रमणोंसे संसार-सागरमें थपेड़े खाकर डूबते हुए मुझ दीन-हीन प्राणीका विशाल जलपोत बनकर उद्धार कर दिया, उन भगवान् गदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्वयं महाकाशमें घटाकाशकी व्याप्तिकी भाँति अपने द्वारा अपनेमें ही तीन मूर्तियोंमें अभिव्यक्त होते हैं तथा अपनी मायाशक्तिका आश्रय लेकर इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं एवं उसीमें कमलासन ब्रह्माके रूपमें प्रकटित होकर तेजस् आदि तत्त्वोंका प्रादुर्भाव करते हैं, उन जगदाधार भगवान् गदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मत्स्य-कच्छप आदि अवतार ग्रहण करके देवताओंकी रक्षा करते हैं, जिनकी जगत्में ‘वृषाकपि’ के नामसे प्रसिद्धि है, वे यज्ञवराहरूपी भगवान् गदाधर मुझे सद्गति प्रदान करें।*

भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! मुनिवर रैभ्य महान् बुद्धिमान् थे। जब उन्होंने इस प्रकार भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति की तो भगवान् गदाधर सहसा उनके सामने प्रकट हो गये। उनका श्रीविग्रह पीताम्बरसे शोभायमान था। वे गरुडपर स्थित थे तथा उनकी भुजाएँ शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्मसे अलंकृत थीं। वे भगवान् पुरुषोत्तम आकाशमें ही स्थित रहकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—‘द्विजवर रैभ्य! तुम्हारी भक्ति, स्तुति एवं तीर्थ-स्नानसे मैं संतुष्ट हो गया हूँ। अब तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह मुझसे कहो।’

रैभ्यने कहा — देवेश्वर! अब मुझे उस लोकमें निवास प्रदान कीजिये, जहाँ सनक-सनन्दन आदि मुनिजन रहते हैं। भगवन्! आपकी कृपासे मैं उसी लोकमें जाना चाहता हूँ।

श्रीभगवान् बोले—‘विप्रश्रेष्ठ! बहुत ठीक, ऐसा ही होगा।’ ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये। फिर तो प्रभुके कृपाप्रसादसे उसी क्षण रैभ्यको दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया और वे परम सिद्ध सनकादि महर्षि जहाँ निवास करते हैं, उस लोकको चले गये।

भगवान् श्रीहरिका यह गदाधर-स्तोत्र रैभ्य मुनिके मुखसे उच्चरित हुआ है। जो मनुष्य गयातीर्थमें जाकर इसका पाठ करेगा, उसे पिण्डदानसे बढ़कर फलकी प्राप्ति होगी।

[ अध्याय ७ ]


* गदाधरं विबुधजनैरभिष्टुतं धृतक्षमं क्षुधितजनार्तिनाशनम्। शिवं विशालासुरसैन्यमर्दनं नमाम्यहं हतसकलाशुभं स्मृतौ ॥
पुराणपूर्वं पुरुषं पुरुष्टुतं पुरातनं विमलमलं नृणां गतिम् । त्रिविक्रमं हतधरणं बलोजितं गदाधरं रहसि नमामि केशवम् ॥
विशुद्धभावं विभवैरपावृतं श्रिया वृतं विगतमलं विचक्षणम् । क्षितीश्वरैरपगतकिल्बिषैः स्तुतं गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् ॥
सुरासुरैरर्चितपादपङ्कजं केयूरहाराङ्गदमौलिधारिणम् । अब्धौ शयानं च रथाङ्गपाणिनं गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् ॥
सितं कृते त्रैतयुगेऽरुणं विभुं तथा तृतीये नीलसुवर्णमच्युतम् । कलौ युगेऽलिप्रतिमं महेश्वरं गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् ॥
बीजोद्भवो यः सृजते चतुर्मुखं तथैव नारायणरूपतो जगत्। प्रपालयेद्रुद्रवपुस्तथान्तकृद्गदाधरो जयतु षडर्द्धमूर्तिमान् ॥
सत्त्वं रजश्चैव तमो गुणास्त्रयस्त्वतेषु विश्वस्य समुद्भवः किल । स चैक एव त्रिविधो गदाधरो दधातु धैर्यं मम धर्ममोक्षयोः ॥
संसारतोयार्णवदुःखतन्तुभिर्वियोगनक्रक्रमणैः सुभीषणैः । मज्जन्तमुच्चैः सुतरां महाप्लवो गदाधरो मामुदधौ तु योऽतरत् ॥
स्वयं त्रिमूर्तिः खमिवात्मनात्मनि स्वशक्तिस्रक्षाण्डमिदं ससर्ज ह । तस्मिञ्जलोत्हासनमाप तैजसं ससर्ज यस्तं प्रणतोऽस्मि भूधरम् ॥
मत्स्यादिनामानि जगत्सु चाश्नुते सुरादिसंरक्षणतो वृषाकपिः । मखस्वरूपेण स संततो विभुर्गदाधरो मे विदधातु सद्गतिम् ॥
(अध्याय ७। ३१—४०)

वराह पुराण · पृष्ठ 32, कुल 414 में से · BharatKosha