वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 344, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८५ ] कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि ३३३
स्नान कराते समय जलकी जितनी बूँदें मूर्तिके ऊपर गिरती हैं, प्रतिष्ठा करनेवाला व्यक्ति उतने वर्षोंतक मेरे लोकमें निवास पाता है।
[ अध्याय १८३-१८४ ]
कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि
भगवान् वराह कहते हैं—'सुन्दरि! कांस्य-धातुसे स्वच्छ सुन्दर सभी अङ्ग-सम्पन्न प्रतिमा बनवाकर ज्येष्ठा नक्षत्रमें मूर्तिको घरपर लाकर माङ्गलिक ध्वनिके साथ उसकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। मेरी प्रतिमाके प्रवेशकालमें विधिके अनुकूल अर्घ्य लेकर मन्त्र पढ़ना चाहिये। उसका भाव यह है—'जगत्प्रभो! जो सम्पूर्ण यज्ञोंमें पूजा प्राप्त करते हैं, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं, जो सदा सबकी रक्षा करते हैं, जिनकी इच्छापर विश्वकी सृष्टि, पालन आदि निर्भर है तथा जो महान् आत्मा एवं सदा प्रसन्न रहते हैं, वे आप ही हैं। भगवन्! आप भली प्रकारसे मेरी यह पूजा स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक इस विग्रहमें विराजिये। फिर अर्घ्य देकर शास्त्रीय विधिका पालन करते हुए मूर्तिके मुखको उत्तरकी ओर करके रखे। प्रतिष्ठाके समय पञ्चगव्य, सभी प्रकारके चन्दन, लाजा एवं मधुसे सम्पन्न चार कलशोंको स्थापित करनेकी विधि है। पवित्रात्मा पुरुषको चाहिये कि सूर्यास्त हो जानेपर मेरी वह प्रतिमा पूजा करनेके विचारसे वहीं रख दे। साथ ही भगवन्निमित्त उन शुद्ध कलशोंको उठाकर विग्रहके पास—'ॐ नमो नारायणाय' कहकर रखना चाहिये। तत्पश्चात् आगेका मन्त्र पढ़ना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! ब्रह्माण्ड एवं युगका आदि और अन्त आपके ही रूप हैं। आपके अतिरिक्त विश्वमें कहीं कुछ भी नहीं है। लोकनाथ! अब आप यहाँ आ गये हैं, अतः सदाके लिये विराजिये। प्रभो! आप संसाररूपसे विकार, परमात्मरूपसे निराकार, निर्गुण होनेसे आकारशून्य तथा मूर्तिमान् होनेसे साकार भी हैं। आपको मेरा प्रणाम है।'
पृथ्वि! दूसरे दिन प्रातः सूर्य-उदय होनेपर अश्विनी, मूल अथवा तीनों उत्तरा नक्षत्रसे युक्त मुहूर्तमें पूर्वोक्त विधानके अनुसार मुझे मन्दिरके द्वारदेशपर स्थापित करे। सब प्रकारसे शान्ति करनेके लिये जल, गन्ध और फलके साथ—'ॐ नमो नारायणाय' इसका उच्चारण कर प्रतिमाको भीतर ले जाय। कलशोंमें चन्दनयुक्त जल भरकर उसे अभिमन्त्रित करे। फिर उसी जलसे स्नान कराये। सम्पूर्ण अङ्गोंको शुद्ध करनेके लिये मन्त्रपूर्वक जलका आवाहन करे। मन्त्रका भाव यह है—'पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। भगवन्! ऐसी कृपा करें कि समस्त सागर, सरिताएँ, सरोवर तथा पुष्कर आदि जितने तीर्थ हैं, वे सभी यहाँ आयें, जिनसे मेरे अङ्ग शुद्ध हो जायें।'
तत्पश्चात् उपासक भक्तिपूर्वक प्रतिमाको स्नान कराकर सविधि अर्चन कर, गन्ध-धूप-दीप आदिसे पूजा कर वस्त्र अर्पित करे। साथ ही यह मन्त्र पढ़े—'ॐकारस्वरूप देवेश! ये सूक्ष्म, सुन्दर एवं सुखदायी वस्त्र आपकी सेवामें उपस्थित हैं। आप इन्हें स्वीकार करें। आपको मेरा नमस्कार है। वेद, उपवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये सभी आपके रूप हैं और सभी आपकी आराधना करते हैं।' पृथ्वि! मन्त्रके विशेषज्ञ व्यक्ति विधिके साथ पूजा करके मुझे अलंकृत करनेके बाद नैवेद्य अर्पित कर आचमन करायें। फिर शान्तिपाठ करें। शान्तिपाठके मन्त्रका भाव यह है—'विद्या,