भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८६

वेद, ब्राह्मण, सम्पूर्ण ग्रह, नदियाँ, समुद्र, इन्द्र, अग्नि, वरुण, आठों लोकपाल आदि देवता—ये सभी विश्वमें शान्ति प्रदान करें। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवन्! आप सर्वत्र व्याप्त, मनोहर और यम अर्थात् अहिंसा, सत्य वचन एवं ब्रह्मचर्यस्वरूप हैं। ऐसे ॐकारमय आप परम पुरुषके लिये मेरा नमस्कार है।' फिर मेरी प्रदक्षिणा, स्तुति तथा अभिवादन करे। इसके पश्चात् भगवान् श्रीहरिमें श्रद्धा रखनेवाले ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें भी तृप्त करे। कमलनयने! विप्रवर्ग शान्ति-कलशका जल लेकर प्रतिमापर सिंचन करें। साधकको ब्राह्मणों, मेरे भक्तों एवं गुरुजनोंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। प्रतिष्ठाके समय मेरे अङ्गोंपर जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह व्यक्ति विष्णुलोकमें रहनेका अधिकारी हो जाता है। जो मनुष्य इस विधिसे मेरी स्थापना करेगा, उसने मानो अपने मातृपक्ष एवं पितृपक्ष—दोनों कुलके पितरोंका उद्धार कर दिया। भद्रे! कांस्यधातुसे निर्मित मेरी प्रतिमाकी जैसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये, वह बात मैं तुम्हें बता चुका। अब ऐसे ही चाँदीसे बनी मूर्तिकी भी स्थापना होती है, वह आगे बताऊँगा। [अध्याय १८५]

रजत-स्वर्णप्रतिमाके स्थापन तथा शालग्राम और शिवलिङ्गकी पूजाका विधान

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इसी प्रकार मेरी चाँदी तथा स्वर्णसे भी प्रतिमा बनाने एवं उसकी प्रतिष्ठा करनेका विधान है। मूर्ति-निर्माण एवं प्रतिष्ठा उसी प्रकार की जानी चाहिये, जैसी ताम्र या काँसेकी विधि है। वसुंधरे! इसमें भी पूजा-अर्चा, कलश-स्थापन एवं शान्तिपाठका भी पूर्वोक्त विधान ही अनुष्ठित होना चाहिये।

पृथ्वी बोली—माधव! आपने सुवर्ण आदिसे बनी हुई जिन प्रतिमाओंकी बात बतायी है, प्रायः उन सभीमें आपका निवास है। पर शालग्रामशिलामें आप स्वभावतया सदा निवास करते हैं। प्रभो! मैं यह जानना चाहती हूँ कि गृह आदिमें साधारण रूपसे किनकी पूजा करनी चाहिये अथवा विशेष-रूपसे कौन देवता पूज्य हैं? आप मुझे इसका रहस्य बतानेकी कृपा करें। साथ ही मुझे यह भी स्पष्ट करा दीजिये कि शिवपरिवारके पूजनमें कितनी संख्याएँ होनी आवश्यक हैं?

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! गृहस्थके घरमें दो शिवलिङ्ग, तीन शालग्रामकी मूर्तियाँ, दो गोमती-चक्र, दो सूर्यकी प्रतिमाएँ, तीन गणेश तथा तीन दुर्गाकी प्रतिमाओंका पूजन करना निषिद्ध है। विषम संख्यायुक्त शालग्रामकी पूजा नहीं करनी चाहिये। युग्ममें भी दोकी संख्या नहीं होनी चाहिये। विषमसंख्यक शालग्रामकी पूजा निषिद्ध है, पर विषममें भी एक शालग्रामका पूजन विहित है। इसमें विषमताका दोष नहीं है*। अग्निसे जली हुई तथा टूटी-फूटी प्रतिमाकी पूजा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि घरमें ऐसी मूर्तियोंकी पूजा करनेसे गृह-स्वामीके मनमें उद्वेग या अनिष्ट होता है। शालग्रामकी मूर्ति यदि चक्रके चिह्नसे युक्त हो तो खण्डित होनेपर भी उसकी पूजा करनी चाहिये,


* गृहे लिङ्गद्वयं नार्च्यं शालग्रामत्रयं तथा। द्वे चक्रे द्वारकायास्तु नार्च्यं सूर्यद्वयं तथा॥
गणेशत्रितयं नार्च्यं शक्तित्रितयमेव च। शालग्रामसमाः पूज्याः समेषु द्वितयं नहि॥
विषमा नैव पूज्याः स्युर्विषमे त्वेक एव हि।
(१८६। ४०–४२)

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