वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८७ ] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [ ३३५
क्योंकि वह टूटा-फूटा दीखनेपर भी शुभप्रद माना जाता है। देवि! जिसने शालग्रामकी बारह मूर्तिका विधिवत् पूजन कर लिया, अब मैं तुम्हें उसका पुण्य बताता हूँ। यदि बारह करोड़ शिवके लिङ्गोंका सोनेके कमलपुष्प चढ़ाकर बारह कल्पोंतक पूजन किया जाय, उससे जितना पुण्य प्राप्त होता है, उतना पुण्य केवल एक दिन बारह शालग्रामकी पूजासे होता है। श्रद्धाके साथ सौ शालग्रामका अर्चन करनेवाला जो फल पाता है, उसका वर्णन मेरे लिये सौ वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है। अन्य देवताओंकी तथा मणि आदिसे बने हुए शिवलिङ्गोंकी पूजा सर्वसाधारण व्यक्ति कर सकते हैं, पर शालग्रामकी पूजा स्त्री एवं हीन अपवित्र व्यक्तियोंको नहीं करनी चाहिये। शालग्रामके चरणामृत लेनेसे सम्पूर्ण पाप भस्म हो जाते हैं। शिवजीपर चढ़े हुए फल, फूल, नैवेद्य, पत्र एवं जल ग्रहण करना निषिद्ध है। हाँ, यदि शालग्रामकी शिलासे उसका स्पर्श हो जाय तो वह सदा पवित्र माना जा सकता है। देवि! जो व्यक्ति स्वर्णके साथ किसी भगवद्भक्त पुरुषको शालग्रामकी मूर्तिका दान करता है, उसका पुण्य कहता हूँ, सुनो। वसुंधरे! उसे वन एवं पर्वतसहित समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी सत्पात्र ब्राह्मणको देनेका पुण्य प्राप्त होता है। यदि शालग्रामकी मूर्तिके मूल्यका निश्चय करके कभी कोई उसे बेचता और खरीदता है तो वे दोनों निश्चय ही नरकमें जाते हैं। वस्तुतः शालग्रामके पूजनके फलका वर्णन तो कोई सौ वर्षमें भी नहीं कर सकता। [अध्याय १८६]
सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन
पृथ्वी बोली— भगवन्! मैं आपके वराह तथा मथुराक्षेत्रकी महिमा सुन चुकी। प्रभो! मैं अब पितृयज्ञके सम्बन्धमें जानना चाहती हूँ कि यह क्या है और इसे किस प्रकार आरम्भ करना चाहिये? सर्वप्रथम किसने इस यज्ञका शुभारम्भ किया तथा इसका प्रयोजन एवं स्वरूप क्या है?
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! सर्वप्रथम मैंने स्वर्गलोककी रचना की, जो देवताओंका पहले आवास बना। जगत् प्रकाशशून्य था और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त था। उस समय मेरे मनमें ऐसा विचार उत्पन्न हुआ कि चर और अचर प्राणियोंसे सम्पन्न तीनों लोकोंका सृजन करूँ। उस समय मैं संसारकी सृष्टिसे विमुख शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहा था। ऐसा मेरा अनन्त शयन हुआ करता है। माया-स्वरूपिणी निद्रा मेरी सहचरी है। इसका सृजन मेरी इच्छापर निर्भर है। इसीसे मैं सोता और जागता हूँ। सृष्टिके प्रारम्भमें सर्वत्र जल-ही-जल था। कहीं कुछ भी पता नहीं चलता था। उस जलमें एक वट-वृक्षके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था। वह वट भी बीजजनित नहीं था, बल्कि मुझ विष्णुद्वारा ही उत्पन्न था*। मायाका आश्रय लेकर एक बालकके रूपमें मैं उसपर निवास करता था। मेरी आज्ञा पाकर मायाने चर और अचरसे परिपूर्ण तीनों लोकोंको सजाया है। ये सभी मेरी आँखोंके सामने हैं। शुभे! मैं ही इस विविध वैचित्र्योपेत चराचर
* प्रायः लोग प्रश्न करते हैं कि बीज पहले या वट पहले। यह उसीका उत्तर है, जिसमें विष्णुको ही वटका तथा विश्ववृक्षका बीज बतलाया गया है।