वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८७ |
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विश्वका आधार हूँ। समयानुसार मैं ही बडवामुख नामक अग्नि बन जाता हूँ। माया मेरा ही आश्रय पाकर काम करती है, जिससे सभी जल बडवानलसे निकलकर मुझमें लीन हो जाते हैं। प्रलयकी अवधि पूरी हो जानेपर लोकपितामह ब्रह्माने मुझसे पूछा कि मैं क्या करूँ? तब मैंने उनसे यह वचन कहा—'ब्रह्मन्! तुम यथाशीघ्र सुर-असुर एवं मानवोंकी सृष्टि करो।'
देवि! इस प्रकार मेरे कहनेपर ब्रह्माने हाथसे कमण्डलु उठाया और उसके जलसे आचमनकर देवताओंकी सृष्टिका कार्य आरम्भ कर दिया। पितामहने बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण एवं सबका उद्धार करनेके लिये ब्राह्मण तथा सुरसमुदायकी सृष्टि की। उनकी भुजाओंसे क्षत्रियोंकी, ऊरुओंसे वैश्योंकी तथा चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई। देवि! उन्हींसे देवता और असुर सब-के-सब धराधामपर विराजने लगे। देवता और दानवोंमें तप तथा बलकी अधिकता हुई। अदिति देवीसे आदित्य वसुगण, रुद्रगण, मरुद्गण, अश्विनीकुमार आदि तैंतीस करोड़ देवता उत्पन्न हुए। दिति देवीसे देवताओंके विरोधी दानवोंकी उत्पत्ति हुई। उसी समय प्रजापतिने तपोधन ऋषियोंको उत्पन्न किया। वे सभी तीव्र तेजके कारण सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सभी शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञान था। अब उनके पुत्रों तथा पौत्रोंकी संख्या सीमित न रही। उन्हींमें एक निमि हुए*। उन निमिको भी एक पुत्र हुआ, जो आत्रेय नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह जन्मसे ही सुन्दर, संयतचित्त एवं उदार स्वभावका था। वह मनको एकाग्रकर अविचल भावसे सावधान होकर तपस्या करता। वसुंधरे! पञ्चाग्नि तापना, वायु पीकर रहना, भुजा ऊपर उठाकर एक पैरसे खड़े रहना, सूखे पत्ते एवं जल ग्रहण करना, शीतकालमें जलशयन करना, फलोंके आहारपर रहना तथा चान्द्रायणव्रतका पालन करना—ये उसकी तपस्याके अङ्ग थे। इन सभी नियमोंका पालन करते हुए वह दस हजार वर्षोंतक तपस्यामें लीन रहा। इतनेमें कालवश उसका देहान्त हो गया। ऐसे सुयोग्य पुत्रकी मृत्युसे निमिका हृदय शोकपूर्ण हो गया। इस प्रकार पुत्रशोकके कारण ये निमि दिन-रात चिन्तित रहने लगे।
माधवि! उस समय निमिने तीन राततक शोक मनाया। उनकी बुद्धि बहुत विस्तृत थी। अतः इस शोकसे मुक्त होनेका विचार किया कि माघमासकी द्वादशीका दिन उपयुक्त है और फिर उस दिन पुत्रके लिये श्राद्धकी व्यवस्था की। उस बालक (आत्रेय)-को खाने एवं पीनेके लिये जितने भोजनके पदार्थ अन्न, फल, मूल तथा रस थे, उन्हें एकत्रकर फिर स्वयं पवित्र होकर सावधानीके साथ ब्राह्मणको आमन्त्रित किया और अपसव्य-विधानसे सभी श्राद्ध-कार्य सम्पन्न किये। सुन्दरि! इसके बाद सात दिनोंका कृत्य एक साथ सम्पन्न किया। शाक, फल और मूल—इन वस्तुओंसे पिण्डदान किया। सात ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा की। कुशोंको दक्षिणकी ओर अग्रभाग करके रखकर नाम और गोत्रका उच्चारण करके मुनिवर निमिने धार्मिक भावनासे अपने पुत्रके नाम पिण्ड अर्पण किया। भद्रे! इस प्रकार विधान पूरा करते रहे, दिन समाप्त हो गया और भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये। यह परम
* ये 'निमि' मिथिला-नरेश—'मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥' (रामचरित० १।२२९।२)—से भिन्न कोई ब्राह्मण हैं।