वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८७] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [३३७
दिव्य उत्तम कर्म श्रेष्ठभावसे सम्पन्न हुआ। उन्होंने मन और इन्द्रियोंको वशमें करके आशाएँ त्याग दीं और अकेले ही शुद्ध भूमिमें पहले कुश, तब मृगचर्म और इसके बाद वस्त्र बिछाकर बैठ गये। उनका वह आसन न बहुत ऊँचा था न अति नीचा। चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें करके एकाग्र हो अपने अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये उन्होंने योगासन लगाया और अपने शरीर तथा सिरको समान रखकर अचल कर लिया। उनकी दृष्टि नासिकाके अग्रभागपर जमी थी। चित्तमें किसी प्रकारका क्षोभ भी न था। फिर निर्भीक एवं ब्रह्मचर्यसे रहकर श्रद्धाके साथ एकनिष्ठ होकर उन्होंने मुझमें अपने चित्तको लगाया। इस प्रकार सायंकालकी संध्या समाप्त हुई। पर रात्रिमें पुनः चिन्ता और शोकके कारण उनका मन सहसा क्षुब्ध हो उठा और इस प्रकार पिण्डदानकी क्रिया करनेसे उनके मनमें महान् पश्चात्ताप हुआ। वे सोचने लगे—'अहो, मैंने जो श्राद्ध-तर्पणकी क्रियाएँ की हैं, इन्हें आजतक किन्हीं मुनियोंने तो नहीं किया है। जन्म और मृत्यु पूर्वकर्मके फलसे सम्बद्ध हैं। पुत्रकी मृत्युके बाद मैंने जो तर्पण किया, यह अपवित्र कार्य है। अहो! स्नेह एवं मोहके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी। इसीसे मैंने यह कर्म किया। पितृ-पदपर स्थित जो देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, उरग और राक्षस आदि हैं, वे अब मुझे क्या कहेंगे।'
वसुंधरे! इस प्रकार निमि सारी रात चिन्तामें व्यग्र रहे। फिर रात्रि बीती, सूर्य उदित हुए। फिर निमिने प्रातःसंध्या कर, जैसे-तैसे अग्निहोत्र किया। पर वे चिन्ता-दुःखसे पुनः संतप्त हो उठे और अकेले बैठकर प्रलाप करने लगे। उन्होंने कहा—'ओह! मेरे कर्म, बल एवं जीवनको धिक्कार है। पुत्रसे सभी सुख सुलभ होते हैं। पर आज मैं उस सुपुत्रको देखनेमें असमर्थ हूँ। विवेकी पुरुषोंका कथन है कि 'पूतिका' नामका नरक घोर क्लेशदायक है, पर पुत्र इससे रक्षा करता है। अतः सभी मनुष्य इस लोक तथा परलोकके लिये ही पुत्रकी इच्छा करते हैं। अनेक देवताओंकी पूजा, विविध प्रकारके दान तथा विधिवत् अग्निहोत्र करनेके फलस्वरूप मनुष्य स्वर्गमें जानेका अधिकारी होता है, पर वही स्वर्ग पिताको पुत्रद्वारा सहज ही सुलभ हो जाता है। यही नहीं, पौत्रसे पितामह तथा प्रपौत्रसे प्रपितामह भी आनन्द पाते हैं। अतः अब अपने पुत्रके बिना मैं जीवित नहीं रहना चाहता हूँ।'
देवि! इस प्रकार वे चिन्तासे अत्यन्त दुःखी हो रहे थे कि देवर्षि नारद सहसा उन निमिके आश्रममें पहुँच गये। उस अलौकिक आश्रममें सभी ऋतुएँ अनुकूल थीं। अनेक प्रकारके फल-फूल एवं जल उपलब्ध थे। स्वयंप्रकाशसे प्रकाशमान नारदजी निमिके आश्रमके भीतर गये। धर्मज्ञ निमिने उन्हें आया देखकर उनका स्वागत और पूजन किया। देवि! उस समय निमिके द्वारा आसन, पाद्य एवं अर्घ्य आदि दिये गये। नारदजीने उन्हें ग्रहणकर फिर उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
नारद बोले—'निमे! तुम्हारे-जैसे ज्ञानी पुरुषको इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये। जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये तथा जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये पण्डितजन शोक नहीं करते। यदि कोई मर जाय, नष्ट हो जाय अथवा कहीं चला जाय, इनके लिये जो व्यक्ति शोक करता