वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २१५ ] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन [ ३९३
बिखरी हुई बालुकाएँ ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो मोतियोंके चूर्ण हैं। उसी स्थानपर क्रीडा करती हुई मनको मुग्ध करनेवाली एक कन्या दिखायी पड़ी। सभी देवताओंने उसे देखकर मुझे सूचित किया; क्योंकि सम्पूर्ण देवताओंका मैं अग्रणी था। मैं सोचने लगा यह क्या बात है? फिर मैं एक मुहूर्त्ततक ध्यानस्थ हो गया। तभी मुझे उस कन्याके विषयमें सहसा ज्ञान हुआ। मैंने सोचा, संसारके शासक शंकरकी मूल शक्ति, जिन्हें गिरिराज हिमालयकी पुत्री होनेका गौरव मिल चुका है, निश्चय ही ये वही भगवती 'उमादेवी' ही हैं। इसके बाद सभी प्रधान देवता उस पर्वत-शिखरके ऊपर चढ़ गये और वहाँसे नीचेकी ओर देखने लगे। तब उन सभीको सुरसत्तम शंकरका दर्शन प्राप्त हुआ। उस समय वे प्रभु मृग-समूहके बीचमें उनके रक्षककी भाँति विराजमान थे। उनके सिरपर एक सींग और एक पैर था। वे तपाये हुए सोनेकी भाँति चमक रहे थे। उनका प्रत्येक अङ्ग गठित, उनके मुख, नेत्र सुडौल और सुन्दर थे तथा उनके दाँत बड़े सुन्दर थे।
उस समय ऐसे मृगरूपधारी भगवान् रुद्रको देखकर सभी देवता शिखरसे उतरकर उनकी ओर दौड़े। उन मृगेन्द्रको पकड़नेके लिये उनके मनमें तीव्र अभिलाषा जग गयी थी। अतः बड़े वेगसे वे सब प्रकारके उद्यममें तत्पर हो गये। फिर तो इन्द्रने सींगके अगले भागको पकड़ लिया, मैं भी वहीं था। मैंने बड़ी श्रद्धाभक्तिसे उनके सींगके मध्यभागमें अपना हाथ लगाया। यही नहीं, उन महात्माके सींगके मूलभागको श्रीहरिने भी पकड़ लिया। फिर इस प्रकार तीनोंके पकड़ लेनेपर वह सींग तीन भागोंमें विभक्त हो गया। इन्द्रके हाथमें अगला भाग, मेरे हाथमें बीचका भाग और विष्णुके हाथमें मूलभाग शोभा पाने लगा। इस भाँति उसके तीन रूप हो गये। इस प्रकार हम-लोगोंने जब सींगके तीनों भागोंको अपना लिया, तब वे प्रधान मृगरूपधारी शंकर सींगरहित होकर वहाँ ही अन्तर्धान हो गये। फिर हम-लोगोंके लिये वे अदृश्य हो गये और आकाशमें चले गये तथा उपालम्भ देते हुए कहने लगे— 'देवताओ! मैंने तुम्हें ठग लिया। तुमलोग स्वयं हमें प्राप्त नहीं कर सकोगे। मैं शरीरी होकर तुम्हारे हाथ लग गया था; किंतु छुड़ाकर यहाँ आ गया। अब तुमलोग केवल मेरे सींगसे ही संतोष करो। तुमलोग मेरे वास्तविक रूपसे वञ्चित हो गये। मैं अपने पूरे शरीरसे रह सकूँ तो धर्म भी अपने चारों पैरोंसे रहने लगे। यह मेरा सिद्धान्त है।
'देवताओ! यह 'श्लेष्मातक' वन है। यहीं मेरे शृङ्गोंको विधिपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये। इस कार्यसे जगत्का कल्याण होगा। यह वन अत्यन्त महान् पुण्यक्षेत्र होगा। मेरे प्रभावसे प्रभावित इस स्थानपर महान् यज्ञ सम्भाव्य है। भूमण्डलपर जितने तीर्थ, समुद्र तथा नदियाँ हैं, मेरे लिये वे सब यहाँ आयेंगे। हिमवान् पर्वतोंके राजा हैं। उनके एक शुभ प्रदेशका नाम नेपाल है। मैं वहाँ पृथ्वीसे स्वयम्भूरूपसे स्वतः प्रकट होऊँगा। मेरे उस विग्रहमें चार मुख होंगे और मेरा सिर प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित होगा। फिर तीनों लोकोंमें सब जगह शरीरेश (पशुपतिनाथ*)के नामसे मेरी ख्याति होगी। वही नागह्रद नामसे प्रसिद्ध एक विशाल ह्रद होगा। सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेके विचारसे मैं उसके जलमें तीस हजार वर्षोंतक निवास करूँगा। जिस समय वृष्णिकुलमें
* यह सारा वर्णन स्पष्ट ही नेपालके 'पशुपतिनाथ' का ही है।