भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३९४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१५

भगवान् श्रीकृष्णका अवतार होगा और वे इन्द्रकी प्रार्थनासे अपने चक्रद्वारा पर्वतोंको उखाड़कर दानवोंका संहार करेंगे, उस समय वह म्लेच्छोंसे भरा प्रदेश शुद्ध होगा, बहुत-से सूर्यवंशी क्षत्री उत्पन्न होंगे और उनके प्रयाससे म्लेच्छोंकी सत्ता समाप्त हो जायगी। साथ ही क्षत्रियगण उस देशमें ब्राह्मणोंको बसायेंगे और उन ब्राह्मणोंकी सहायतासे प्रचलित धर्मोंकी स्थापना करेंगे। उन्हें अविनाशी एवं अचल राज्यकी उपलब्धि हो जायगी। पहले कुछ दिनोंतक वह प्रान्त शून्य रहेगा। पश्चात् क्षत्रियवंशमें उत्पन्न वे राजा लोग मुझे उस शून्य स्थानमें प्राप्तकर मेरे अर्चा-विग्रहकी प्रतिष्ठा करेंगे। इसके बाद वह स्थान प्रसिद्ध ब्राह्मणों तथा सम्पूर्ण वर्णाश्रमोंसे सम्पन्न होकर एक महान् जनपद बन जायगा। उस जनपदके विस्तृत भागमें राजाओंका सम्यक् प्रकारसे निवास होगा और सामान्य जनता वहाँ सुखपूर्वक निवास करने लगेगी। सभी प्राणी प्रत्येक समयमें वहाँ मेरी आराधना करेंगे। जो सज्जन एक बार भी विधिके साथ मेरी वन्दना एवं दर्शन करेंगे, उनके सम्पूर्ण पाप भस्म हो जायँगे। साथ ही वे शिवपुरीमें जायँगे और वहाँ उन्हें मेरा दर्शन प्राप्त हो जायगा। मेरा यह स्थान गङ्गासे उत्तर और अश्विनीमुखसे दक्षिणमें चौदह योजन दूरीके विस्तारमें होगा, ऐसा समझना चाहिये। वागमती नामकी नदी हिमालयके ऊँचे शिखरसे निकलकर उसकी शोभा बढ़ायेगी। उस वागमती नदीका शुद्ध जल भागीरथी गङ्गासे भी सौगुना अधिक पवित्र कहा गया है। उसमें स्नान करनेके प्रभावसे मानव विष्णु और इन्द्रके लोकोंका स्पर्श करके शरीर त्यागनेके पश्चात् सीधे मेरे लोकमें पहुँच जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले घोर पापकर्मा ही क्यों न हों, उन्हें भी यह गति सुलभ हो जाती है। इन्द्रकी नगरीमें जो नियमपूर्वक निवास करनेवाले देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, उरग, मुनि, अप्सरा तथा यक्षप्रभृति हैं, वे सभी मेरी मायासे मोहित होनेके कारण मेरे उस गुह्य स्थानको जाननेमें असफल हैं।

'सुरोत्तमो ! तपस्वियोंके लिये यह तपोभूमि एवं सिद्धक्षेत्र कहा गया है। विद्वान् पुरुष प्रभास, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर और कुरुक्षेत्रसे भी बढ़कर उस क्षेत्रकी महिमा बताते हैं। वहाँ मेरे श्वशुर पर्वतराज हिमवान् स्वयं विराजते हैं। गङ्गा, जो नदियोंमें उत्तम मानी जाती हैं। उनका तथा अन्य कई श्रेष्ठ नदियोंका वहींसे उद्गम होता है। वह उत्तम क्षेत्र परम पुण्यमय है। सभी श्रेष्ठ नद-नदियाँ तथा तीर्थ वहाँसे प्रकट होते हैं। वहाँके सभी पर्वत पुण्यस्वरूप हैं। वहीं मेरा आश्रम होगा। सिद्ध और चारण उस आश्रमकी सेवा करेंगे। वहाँ मेरा विग्रह शैलेश्वर नामसे विख्यात होगा। धारारूपसे बहनेवाली नदियोंमें श्रेष्ठ एवं पुण्यमयी वागमती नामकी नदी भी वहाँसे बहकर हिमालय आयेगी। भागीरथी और वेगवती नामकी नदियाँ परम पवित्र हैं। इनका कीर्तन करनेसे भी मनुष्योंका पाप भस्म हो जाता है और दर्शन करनेसे तो प्राणी सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्राप्त कर लेता है। इन श्रेष्ठ नदियोंका जल पीने तथा अवगाहन करनेसे पुरुष अपने सात कुलोंको तार देता है। उस तीर्थकी महिमाको स्वयं लोकपाल भी गाते हैं। वहाँ जो स्नान करते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, उन्हें पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता। जो लोग बार-बार वहाँ नित्य स्नान और मेरी पूजा करते हैं, उनपर परम प्रसन्न होकर मैं संसार-सागरसे उनका उद्धार कर देता हूँ। जो उसके जलसे भरा हुआ एक

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