भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २१५] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन ३१५


घड़ा लाकर मनको पवित्र करके श्रद्धापूर्वक उससे मुझे स्नान कराता है, वह वेद एवं वेदाङ्गके ज्ञाता श्रोत्रिय ब्राह्मणकी सहायतासे मेरा अभिषेक करता है, उसे अग्निहोत्रका फल सुलभ हो जाता है। उसके तटपर जलका भेदन करके मृगशृङ्गोदक नामसे प्रसिद्ध मेरी एक प्रतिमा प्रकट हुई है, जो मुनिजनोंको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ सावधान होकर सिरपर जल फेंकते हुए स्नान या अभिषेक करना चाहिये, इससे जीवनभरके किये हुए सभी पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। वहीं 'पञ्चनद' नामका भी एक पवित्र तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ केवल स्नान करनेमात्रसे प्राणी 'अग्निष्टोम' यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है। वागमती नदी यहाँ साठ हजार दिव्य गौवोंकी रक्षा करती है, अतः उसे कृतघ्न अथवा पापी मानव प्राप्त करनेमें असमर्थ हैं। जो सदा पवित्र रहते हैं, इष्टदेवतापर जिनकी श्रद्धा रहती है तथा जो सत्यका पालन करते हैं, ऐसे मानवोंको ही वागमतीमें स्नान करनेका सौभाग्य प्राप्त होता है और वे उत्तम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। जो दुःखी, भयभीत एवं संतप्त मनुष्य हैं अथवा जो व्याधियोंसे सतत कष्ट पाते रहते हैं, ऐसे व्यक्ति भी यदि इसमें स्नानकर मुझ 'पशुपतिनाथ'का दर्शन यहाँ करते हैं तो वे परम पवित्र हो जाते हैं और उन्हें शाश्वत शान्ति प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है। उसमें स्नान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण पाप मेरी कृपासे नष्ट हो जाते हैं, इतना ही नहीं, ईति¹ आदि सभी उग्र उपद्रव भी सर्वथा शान्त हो जाते हैं। वागमती सम्पूर्ण नदियोंमें प्रधान है। उसके जलमें जो स्नानकर मेरा दर्शन करते हैं, उनके अन्तःकरण शुद्ध एवं पवित्र हो जाते हैं। इस 'वागमती'के जलमें मानव जहाँ-जहाँ स्नान करता है, वहाँ-वहाँ उसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। यह क्षेत्र एक योजनके भीतर चारों ओर फैला हुआ है।

जिस स्थानपर मैं स्वयं नागेश्वर रुद्ररूपमें विराजमान रहता हूँ, उसको मूल क्षेत्र जानना चाहिये। उसके पूर्व और दक्षिणके भागमें नागराज वासुकि²का एक स्थान है। ये हजार अन्य नागोंके साथ मेरे दरवाजेपर सदा स्थित रहते हैं। जो लोग मेरे क्षेत्रमें प्रवेश करना चाहते हैं, वासुकिका काम उनके सामने विघ्न उपस्थित करना है। पर जो पहले उन्हें नमस्कार करके फिर मुझे प्रणाम करने आनेका कार्यक्रम बनाते हैं, उन प्रवेश करनेवाले पुरुषोंके सामने किसी प्रकारका भी विघ्न उपस्थित नहीं हो पाता। उस क्षेत्रमें जाकर जो मनुष्य परम भक्तिके साथ सदा मेरी वन्दना करता है, उसे पृथ्वीपर राजा होनेका सुयोग्य मिलता है और सभी प्राणी उसका अभिवादन करते हैं। जो मनुष्य गन्धों और मालाओंके द्वारा मेरी मूर्तिका अभ्यर्चन करता है, वह 'तुषित'संज्ञक देवताओंकी योनिमें पैदा होता है, इसमें कोई संशय नहीं। जो व्यक्ति मेरे उस पर्वतपर श्रद्धापूर्वक प्रज्वलित दीप प्रदान करता है, उसकी उत्पत्ति 'सूर्यप्रभ' नामक देवताओंकी योनिमें होती है। जो लोग संगीत-वाद्य, नृत्य-स्तुति अथवा जागरण करके मेरी सेवा, उपासना करते हैं, वे मेरे लोकमें निवासके अधिकारी हो जाते हैं। जो प्राणी दही, दूध, मधु, घृत अथवा जलसे मुझे स्नान कराते हैं, उनपर, बुढ़ापा रोग और मृत्युका वश नहीं चलता। जो मानव श्रद्धाके अवसरपर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको


¹ १. अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषकाः शुकाः। प्रत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः॥ (कामन्दक-नीतिसार) अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षी और बगलके राजा—इन छहोंको 'ईति' कहते हैं।
² २. यह वासुकीनाथका वर्णन है। यह देवघर वैद्यनाथ-धामसे २८ मीलपर दुमका जानेवाली सड़कपर है। यहाँ नागेश्वर-ज्योतिर्लिङ्ग है। द्रष्टव्य 'कल्याण'का 'तीर्थाङ्क'।

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