भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३९६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २१५

इस स्थानमें भोजन कराता है, उसे स्वर्गमें अमृत पान करनेका अवसर मिलता है और देवतालोग उसका आदर करते हैं। जो ब्राह्मण इस क्षेत्रमें अनेक प्रकारके व्रत-उपवास, भाँति-भाँतिके हवन, स्वादिष्ट नैवेद्य आदि उपचारोंके द्वारा समुचित श्रद्धासे सम्पन्न होकर मेरी आराधना करते हैं, उन्हें साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करनेका अवसर मिलता है। इसके पश्चात् उन्हें पुनः मृत्यु-लोकमें आना पड़ता है और उन्हें सभी ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं।

यहींके एक स्थानका नाम 'शैलेश्वर' भी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा स्त्री ही क्यों न हो, यदि वहाँ जाकर भक्तिके साथ मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मेरे पार्षद होनेकी सुविधा मिलती है और वे सदा मेरे गणों तथा देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं। यह 'शैलेश्वर' परम गुह्य स्थान है। इस भूमण्डलमें उससे श्रेष्ठ कहीं भी कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है। ब्राह्मण, गुरु अथवा गौका जिसके द्वारा हनन हो गया है अथवा जो सम्पूर्ण पापोंसे लिप्त है, ऐसा मानव भी इस क्षेत्रमें आकर पापोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँपर अनेक प्रकारके तीर्थ तथा बहुत-से पवित्र देवता निवास करते हैं। इस तीर्थका जल उनसे सम्बद्ध है। अतः जो मानव उन जलोंका स्पर्श करता है, वह अखिल अघोंसे छुटकारा पा जाता है।

उसके दो कोसकी दूरीपर 'कोशोदक' नामसे प्रसिद्ध एक पवित्र तीर्थ है, जो देवताओंद्वारा निर्मित है। यह मुनियोंको बहुत प्रिय है। यहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है और उसका मन वशमें हो जाता है तथा उसकी सत्यमें रुचि होती है। साथ ही वह पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर सभी प्रकारके उत्तम फलका भागी बन जाता है। महात्मा शैलेश्वरके दक्षिण भागमें वह अविनाशी तीर्थ है। जो पुरुष वहाँ जाता है, उसे उत्तम गति प्राप्त होती है। वहीं 'भृगुप्रपतन' नामका स्थान है। उसके प्रभावसे मानव काम और क्रोधसे रहित होकर विमानके द्वारा स्वर्गमें सिधार जाता है। अप्सराओंके समुदायसे उसे सहायता मिलती रहती है। 'भृगुप्रपतन'के आगे एक ब्रह्मोद्भेद नामसे विख्यात तीर्थ है। इसके निर्माता स्वयं ब्रह्माजी हैं। उसका जो फल है, वह भी मैं कहता हूँ; सुनो! जो पुरुष संयमशील बनकर एक वर्षतक वहाँ स्नान करता है, वह ब्रह्माजीके 'विरज' संज्ञक लोकमें जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। वहीं 'गो-रक्ष' नामका एक तीर्थ है। उस स्थानपर गायों और बैलोंके अनेक पदचिह्न हैं। उनका दर्शन करनेसे पुरुषको हजार गोदानका फल मिलता है। वहाँ 'गौरीशिखर' (गौरीशंकर) नामक भगवती गौरीका शिखर (चोटी) है, जहाँ सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। शिखरोंसे प्रेम रखनेवाली 'पार्वतीदेवी' वहाँ सदा विराजमान रहती हैं। वहाँ भी जाना चाहिये। संसारकी रक्षा करनेमें उद्यत जगन्माता भगवती उमा वहाँ विराजती हैं। उनके दर्शन, चरणोंके स्पर्श तथा अभिवादन करनेसे मानव उनके लोकमें जानेका अधिकारी हो जाता है। उनके स्थानसे नीचे वागमती नदी प्रवाहित होती है। उसके तटपर जो अपना प्राण त्यागता है, उसके सामने आकाशगामी विमान आता है और उसपर चढ़कर वह तुरंत ही भगवती उमाके लोकमें चला जाता है। वहीं देवी उमासे सम्बन्धित एक स्तनकुण्ड है। जो मानव उसमें स्नान करता है, वह अग्निके समान प्रकाशमान होकर स्वामिकार्तिकेयके लोकमें चला जाता है। यहीं पञ्चनद नामका एक पुण्य तीर्थ

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