वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११ ] राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग ३५
मित्र थे और तुम उनके पुत्र हो। ये दोनों कन्याएँ हमारी पुत्री हैं। मुझ हेतूकी कन्याका नाम सुकेशी और इस प्रहेतूकी कन्याका नाम मिश्रकेशी है। इन्हें तुम अपनी अर्द्धाङ्गिनीके रूपमें स्वीकार करो।''
हेतूके इस प्रकार कहनेपर राजा दुर्जयने उन दोनों मङ्गलमयी कन्याओंके साथ विधिपूर्वक विवाह कर लिया। सहसा ऐसी दिव्य कन्याओंको प्राप्तकर दुर्जयके हर्षकी सीमा न रही। वह सैनिकोंके साथ अपनी राजधानीमें लौट आया। बहुत समयके बाद राजा दुर्जयके दो पुत्र हुए। सुकेशीसे जो बालक उत्पन्न हुआ, उसका नाम प्रभव पड़ा और मिश्रकेशीके पुत्रका नाम सुदर्शन रखा गया। राजा दुर्जय महान् वैभवशाली तो था ही, उसे परमश्रेष्ठ दो पुत्रोंकी प्राप्ति भी हो गयी। कुछ समयके पश्चात् वह राजा शिकार खेलनेके लिये जंगलमें गया। वहाँ जाकर उसने भयंकर जंगली जानवरोंको पकड़कर बाँधना शुरू कर दिया। इस प्रकार वनमें विचरण करते हुए राजा दुर्जयको जंगलमें कुटी बनाकर रहनेवाले एक पुण्यात्मा मुनि दिखायी पड़े। वे महाभाग मुनि तपस्या कर रहे थे। उनका नाम गौरमुख था। वे ऋषियोंके परिवारोंकी रक्षा तथा पापियोंके उद्धार-कार्यमें लगे रहते थे। उनके आश्रममें विशिष्ट गुणोंसे युक्त एक पवित्र सरोवर था। वहाँ एक ऐसा उत्तम वृक्ष भी था, जिसकी सुगन्धसे सारे वनका वायुमण्डल सुगन्धित हो उठता था। वे मुनि अपने आश्रममें स्थित होकर ऐसे जान पड़ते थे, मानो कोई मेघ उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया हो। मुनिवर गौरमुखके देदीप्यमान मुखसे छिटकता हुआ प्रकाश आकाशको जगमगा देता था। वे पवित्र वस्त्रोंसे सुशोभित थे। उनके शिष्योंकी मण्डली उच्चस्वरसे सामवेदका गान कर रही थी। उनके आश्रममें मुनि-कन्याएँ तथा मुनि-पत्नियां भी अत्यन्त सात्त्विक वेष धारण किये हुए थीं। सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए अगणित वृक्ष उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। इस प्रकार उस आश्रममें मुनिवर गौरमुखकी यज्ञशाला अद्भुत शोभाको प्राप्त हो रही थी।
[ अध्याय १० ]
राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि ! उस समय मुनिवर गौरमुखके परम उत्तम आश्रमको देखकर राजा दुर्जयने सोचा—'इस परम मनोहर आश्रममें चलूँ और इसमें रहनेवाले अनुपम ऋषियोंके दर्शन करूँ।' यह विचार करके राजा दुर्जय आश्रमके भीतर चले गये। मुनिवर गौरमुख धर्मके साक्षात् स्वरूप थे। आश्रममें राजा दुर्जयके आनेपर मुनिका हृदय आनन्दसे भर उठा। उन्होंने राजाका भलीभाँति सम्मान किया। स्वागत-सत्कारके पश्चात् परस्पर कुछ वार्तालाप प्रारम्भ हुआ। मुनिवरने कहा—'महाराज! मैं यथाशक्ति अनुयायियोंसहित आपको भोजन-पान कराऊँगा। आप हाथी, घोड़े आदि वाहनोंको मुक्त कर दें और यहाँ पधारें।'
ऐसा कहकर मुनिवर गौरमुख मौन हो गये। मुनिके प्रति श्रद्धा होनेसे राजा दुर्जयके मनमें भी आतिथ्य स्वीकार करनेकी बात जँच गयी। अतः अनुचरोंके साथ वे वहीं रह गये। उनके पास पाँच अक्षौहिणी सेना थी। राजा दुर्जय सोचने लगे—'ये तपस्वी ऋषि मुझे यहाँ क्या भोजन देंगे?' इधर राजाको भोजनके लिये निमन्त्रित करनेके पश्चात् विप्रवर गौरमुख भी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे सोचने लगे—'मैं अब राजाको क्या