वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ११ |
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खिलाऊँ ?' महर्षि गौरमुख निरन्तर भगवद्भावमें तल्लीन रहते थे। अतएव उनके मनमें चिन्ता उत्पन्न होनेपर उन्हें देवेश्वर जगत्प्रभु भगवान् नारायणकी याद आयी। मन-ही-मन उन्होंने भगवान् नारायणका स्मरण किया और गङ्गाके तटपर जाकर उन जगदीश्वर प्रभुकी स्तुति करने लगे।
पृथ्वीने पूछा—भगवन्! विप्रवर गौरमुखने भगवान् विष्णुकी किस प्रकार स्तुति की, इसको सुननेके लिये मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है।
भगवान् वराह बोले—पृथ्वि! गौरमुखने भगवान्की इस प्रकार प्रार्थना की—जो पीताम्बर धारण करते हैं, आदिरूप हैं तथा जलके रूपमें जो अभिव्यक्त होते हैं, उन सनातन भगवान् विष्णुको मेरा बारंबार नमस्कार है। जो घट-घट-वासी हैं, जलमें शयन करते हैं, पृथ्वी, तेज, वायु एवं आकाश आदि महाभूत जिनके स्वरूप हैं, उन भगवान् नारायणको मेरा बारंबार नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके आराध्य और सबके हृदयमें स्थित हैं, अन्तर्यामी परमात्माके रूपमें विराजमान हैं। आप ही ॐकार तथा वषट्कार हैं। प्रभो! आपकी सत्ता सर्वत्र विद्यमान है। आप समस्त देवताओंके आदिकारण हैं, पर आपका आदि कोई नहीं है। भगवन्! भूः, भुवः, स्वः, जन, मह, तप और सत्य—ये सभी लोक आपमें स्थित हैं। अतः चराचर जगत् आपमें ही आश्रय पाता है। आपसे ही सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय, चारों वेदों तथा सभी शास्त्रोंकी उत्पत्ति हुई है। यज्ञ भी आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। जनार्दन! पेड़-पौधे, वनौषधियाँ, पशु-पक्षी और सर्प—इन सबकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। देवेश्वर! यह दुर्जय नामका राजा मेरे यहाँ अतिथिरूपसे प्राप्त हुआ है। मैं इसका आतिथ्यसत्कार करना चाहता हूँ। भगवन्! आप देवताओंके भी आराध्य और जगत्के स्वामी हैं, मैं नितान्त निर्धन हूँ। फिर भी आपसे मेरी भक्ति और विनयपूर्ण प्रार्थना है कि आप मेरे यहाँ अन्न आदि भोज्य पदार्थोंका संचय कर दें। मैं अपने हाथसे जिस-जिस वस्तुका स्पर्श करूँ और आँखसे जिस-जिस पदार्थको देख लूँ, वह चाहे काठ अथवा तृण ही क्यों न हो, वह तत्काल चार प्रकारके सुपक्व अन्नके रूपमें परिणत हो जाय। परमेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। भगवन्! इसके अतिरिक्त यदि मैं किसी दूसरे पदार्थका भी मनमें चिन्तन करूँ तो वह सब-का-सब मेरे लिये सद्यः प्रस्तुत हो जाय।*
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! इस प्रकार जब मुनिवर गौरमुखने जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति की तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन महाभाग केशवने अपना श्रेष्ठ रूप गौरमुखको
* नमोऽस्तु विष्णवे नित्यं नमस्ते पीतवाससे। नमस्ते चाद्यरूपाय नमस्ते जलरूपिणे ॥
नमस्ते सर्वसंस्थाय नमस्ते जलशायिने। नमस्ते क्षितिरूपाय नमस्ते तैजसात्मने ॥
नमस्ते वायुरूपाय नमस्ते व्योमरूपिणे। त्वं देवः सर्वभूतानां प्रभुस्त्वमसि हृच्छयः ॥
त्वमोंकारो वषट्कारः सर्वत्रैव च संस्थितः। त्वमादिः सर्वदेवानां तव चादिर्न विद्यते ॥
त्वं भूस्त्वं च भुवः स्वस्त्वं जनस्त्वं च महः स्मृतः। त्वं तपस्त्वं च सत्यं च त्वयि देव चराचरम् ॥
त्वत्तो भूतमिदं सर्वं विश्वं त्वत्तो ऋगादयः। त्वत्तः शास्त्राणि जातानि त्वत्तो यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥
त्वत्तो वृक्षा वीरुधश्च त्वतः सर्वा वनौषधिः। पशवः पक्षिणः सर्पास्त्वत्त एव जनार्दन ॥
ममापि देवदेवेश राजा दुर्जयसंज्ञितः। आगतोऽभ्यागतस्तस्य चातिथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥
तस्य मे निर्धनस्याद्य देवदेव जगत्पते। भक्तिनम्रस्य देवेश कुरुष्वानादिसंचयम् ॥
यं यं स्पृशामि हस्तेन यं च पश्यामि चक्षुषा। काष्ठं वा तृणकन्दं वा तत्तदन्नं चतुर्विधम् ॥
तथा त्वन्यतमं वापि यद्ध्यायं मनसा मया। तत्सर्वं सिद्ध्यतां मह्यं नमस्ते परमेश्वर ॥
(अध्याय ११। ११—२१)