वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२ |
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बाणोंसे शत्रुके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इस प्रकार सुमनका अग्निदत्तसे, सुवेदका अग्नितेजसे, सुनलका बाहु एवं शक्रसे तथा सुवेदका प्रतर्दनसे युद्ध छिड़ गया।
यों अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी कुशलता दिखाते हुए सैनिक आपसमें युद्ध करने लगे, पर अन्तमें मणिसे प्रकट हुए योद्धाओंके हाथ सभी दैत्य मार डाले गये। अब मुनिवर गौरमुख भी हाथमें कुशा आदि लिये वनसे आश्रममें पहुँचे। दुर्जय अब भी बहुतसे सैनिकोंके साथ खड़ा था। यह देखकर गौरमुख आश्रमके दरवाजेपर रुक गये और मन-ही-मन विचार करने लगे—'अहो, इस मणिके कारण ही यह सब कुछ हुआ और हो रहा है। अरे! यह भयंकर संग्राम इस मणिके लिये ही आरम्भ हुआ है।'
इस प्रकार सोचते-सोचते मुनिवर गौरमुखने देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही पीताम्बर धारण किये हुए भगवान् नारायण गरुडपर विराजमान हो मुनिके सामने प्रकट हो गये और बोले—'कहो ! मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?' तब मुनिवर गौरमुखने हाथ जोड़कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरिसे कहा—'प्रभो ! आप इस पापी दुर्जयको इसकी सेनाके सहित मार डालें।' मुनिके ऐसा कहते ही अग्निके समान प्रज्वलित भगवान्के सुदर्शनचक्रने सेनासहित दुर्जयको भस्म कर डाला। यह सब कार्य एक निमेषके भीतर—पलक मारते सम्पन्न हो गया। फिर भगवान्ने गौरमुखसे कहा—'मुने! इस वनमें दानवोंका परिवार एक निमेषमें ही नष्ट हो गया है। अतः इस स्थानकी 'नैमिषारण्य-क्षेत्र' के नामसे प्रसिद्धि होगी। इस तीर्थमें ब्राह्मणोंका समुचित निवास होगा। इस वनके भीतर मैं यज्ञपुरुषके रूपमें निवास करूँगा। ये पंद्रह दिव्य पुरुष, जो मणिसे प्रकट हुए हैं, सत्ययुगमें याज्य नामसे विख्यात राजा होंगे।'
इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और मुनिवर गौरमुख भी अपने आश्रममें आनन्दपूर्वक निवास करने लगे।
[ अध्याय ११ ]
राजा सुप्रतीककृत भगवान्की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! जब राजा सुप्रतीकने इतने बली पुरुषोंके चक्रकी आगमें भस्म होनेकी बात सुनी तो उनके सर्वाङ्गमें चिन्ता व्याप्त हो गयी और वे सोचमें पड़ गये। फिर सहसा उनके अन्तःकरणमें आध्यात्मिक ज्ञानका उदय हो गया। उन्होंने सोचा—'चित्रकूट पर्वतपर भगवान् विष्णु, जो राघवेन्द्र 'श्रीराम' नामसे कहे जाते हैं, अत्यन्त विख्यात हैं। अब मैं वहीं चलूँ और भगवान्के नामोंका उच्चारण करते हुए उनकी स्तुति करूँ।' मनमें ऐसा निश्चय कर राजा सुप्रतीक परम पवित्र चित्रकूट पर्वतपर पहुँचे और भगवान्की इस प्रकार स्तुति करने लग गये।
राजा सुप्रतीक बोले—जो राम नरनाथ, अच्युत, कवि, पुराण, देवताओंके शत्रु असुरोंका नाश करनेवाले, प्रभव, महेश्वर, प्रपन्नार्तिहर एवं श्रीधर नामसे सुप्रसिद्ध हैं, उन मङ्गलमय भगवान् श्रीहरिको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ। प्रभो! पृथ्वीमें (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इन) पाँच प्रकारसे, जलमें (शब्द, स्पर्श रूप, रस—इन) चार प्रकारसे, अग्निमें (शब्द, स्पर्श और रूप—इन) तीन प्रकारसे, वायुमें (शब्द एवं स्पर्श—इन) दो प्रकारसे तथा आकाशमें केवल शब्दरूपसे