वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२ ] राजा सुप्रतीककृत भगवान्की स्तुति तथा श्रीविग्रहमें लीन होना ४१
विराजनेवाले परम पुरुष एकमात्र आप ही हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि तथा यह सारा संसार आपका ही रूप है—आपसे ही यह विश्व प्रकट होता तथा आपमें ही लीन हो जाता है—ऐसा शास्त्रोंका कथन है। आपका आश्रय पाकर विश्व आनन्दका अनुभव करता है। इसीलिये तो समस्त संसारमें आपकी 'राम'नामसे प्रतिष्ठा हो रही है। भगवन्! यह संसार-समुद्र भयंकर दुःखरूपी तरङ्गोंसे व्याप्त है। इस भयंकर समुद्रमें इन्द्रियाँ ही घड़ियाल और नाक आदि क्रूर जल-जन्तु हैं। पर जिस मनुष्यने आपके नामस्मरणरूपी नौकाका आश्रय ले लिया है, वह इसमें नहीं डूबता। अतएव संतलोग तपोवनमें आपके राम-नामका स्मरण करते हैं। प्रभो! वेदोंके नष्ट होनेपर आपने मत्स्यावतार धारण किया। विभो! प्रलयके अवसरपर आप अत्यन्त प्रचण्ड अग्निका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे सारी दिशाएँ भस्ममय रूपसे रञ्जित हो जाती हैं। माधव! समुद्र-मन्थनके समय युग-युगमें आप ही स्वयं कच्छपके रूपसे पधारे थे। भगवन्! आप जनार्दन नामसे विख्यात हैं। जब आपकी तुलना करनेवाला दूसरा कोई कहीं भी नहीं मिला तो आपसे अधिककी बात ही क्या है। महात्मन्! आपसे यह सम्पूर्ण संसार, वेद एवं समस्त दिशाएँ ओत-प्रोत हैं। आप आदिपुरुष एवं परमधाम हैं। फिर आपके अतिरिक्त मैं दूसरे किसकी शरणमें जाऊँ। सर्वप्रथम केवल आप ही विराजमान थे। इसके बाद महत्तत्त्व, अहंतत्त्वमय जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन-बुद्धि एवं सभी गुण—इनका भी क्रमशः आविर्भाव हुआ। आपसे ही इन सबकी उत्पत्ति हुई है। मेरी समझसे आप सनातन पुरुष हैं। यह अखिल विश्व आपसे भलीभाँति विरचित एवं विस्तृत है। सम्पूर्ण संसारपर शासन करनेवाले प्रभो! विश्व आपकी मूर्ति है।
आप हजार भुजाओंसे शोभा पाते हैं। ऐसे देवताओंके भी आराध्य आप प्रभुकी जय हो। परम उदार भगवन्! आपके 'राम'रूपको मेरा नमस्कार है।
राजा सुप्रतीकके स्तुति करनेपर प्रभु प्रसन्न हो गये। भगवान्ने अपने स्वरूपका इस प्रकार उन्हें दर्शन कराया और कहा—'सुप्रतीक! वर माँगो।' श्रीहरिकी अमृतमयी वाणी सुनकर एक बार राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर उन देवाधिदेव प्रभुको प्रणाम कर वे बोले—'भगवन्! आपका जो यह सर्वोत्तम विग्रह है, इसमें मुझे स्थान मिल जाय—आप मुझे यह वर देनेकी कृपा करें।' इस प्रकारकी बातें समाप्त होते ही महाराज सुप्रतीककी चित्तवृत्ति भगवान् गदाधरकी दिव्यमूर्तिमें लग गयी। ध्यानस्थ होकर वे भगवान्के नामोंका उच्चारण करने लगे। फिर उसी क्षण अपने अनेक उत्तम कर्मोंके प्रभावसे वे पाञ्चभौतिक शरीर छोड़कर श्रीहरिके विग्रहमें लीन हो गये।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! तुम्हारे सामने मैंने इस समय जिसे प्रस्तुत किया है, वह यह वराहपुराण बहुत प्राचीन है। पूर्व सत्ययुगमें मैंने ब्रह्माजीको इसका उपदेश किया था। यह उसीका एक अंश है। कोई हजारों मुखोंसे भी इसे कहना चाहे तो नहीं कह सकता। कल्याणि! प्रसङ्ग छिड़ जानेपर पूर्णरूपसे जो कुछ स्मरणमें आ गया है, वही प्राचीन चरित्र तुम्हें सुनाया है। कुछ लोग इसकी समुद्रके बूँदोंसे उपमा देते हैं, पर यह ठीक नहीं है। स्वयम्भू ब्रह्माजी, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र भगवान् नारायण तथा मैं—सभी समस्त चरित्रका वर्णन करनेमें असमर्थ हैं। अतः उन परम प्रभु परमात्माके आदिस্বরূপका तुम्हें सदा स्मरण करना चाहिये। समुद्रके रेतोंकी तथा पृथ्विके रजःकणोंकी तो गणना हो सकती है; किंतु परब्रह्म परमात्माकी