वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३ |
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कितनी लीलाएँ हैं—इसकी संख्या असम्भव है। शुचिस्मिते ! तुम्हें मैंने जो प्रसङ्ग सुनाया है, यह उन भगवान् नारायणके केवल एक अंशसे सम्बन्ध रखता है। यह लीला सत्ययुगमें हुई थी। अब तुम दूसरा कौन प्रसङ्ग सुनना चाहती हो, यह बतलाओ। [ अध्याय १२]
पितरोंका परिचय, श्राद्धके समयका निरूपण तथा पितृगीत
पृथ्वीने पूछा—प्रभो! मुनिवर गौरमुखने भगवान् श्रीहरिके अद्भुत कर्मको देखकर फिर क्या किया ?
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! भगवान् श्रीहरिने निमेषमात्रमें ही वह सब अद्भुत कर्म कर दिखाया था। उसे देखकर मुनिश्रेष्ठ गौरमुखने भी नैमिषारण्यक्षेत्रमें जाकर जगदीश्वर श्रीहरिकी आराधना आरम्भ कर दी। उस क्षेत्रमें प्रभास नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। वह परम दुर्लभ तीर्थ चन्द्रमासे सम्बन्धित है। तीर्थके विशेषज्ञोंका कथन है कि वहाँके स्वामी भगवान् श्रीहरि दैत्योंका संहार करनेवाले 'दैत्यसूदन' नामसे सदा विराजते हैं। मुनिकी चित्तवृत्ति उन प्रभुकी आराधनामें स्थिर हो गयी। अभी वे उन भगवान् नारायणकी उपासना कर ही रहे थे—इतनेमें परम योगी मार्कण्डेयजी वहाँ आ गये। उन्हें अतिथिके रूपमें प्राप्तकर गौरमुखने दूरसे ही बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक उनकी पाद्य एवं अर्घ्य आदिसे पूजा आरम्भ कर दी। उन प्रतापी मुनिको कुशके आसनपर विराजित कर गौरमुखने सविनय पूछा—'महाव्रती मुनिश्रेष्ठ ! मुझे पितरों एवं श्राद्धतत्त्वका उपदेश करें' गौरमुखके यों पूछनेपर महान् तपस्वी द्विजवर मार्कण्डेयजी बड़े मीठे स्वरमें उनसे कहने लगे।
मार्कण्डेयजी बोले—मुने! भगवान् नारायण समस्त देवताओंके आदि प्रवर्तक एवं गुरु हैं। उन्हींसे ब्रह्मा प्रकट हुए हैं और उन ब्रह्माजीने फिर सात मुनियोंकी सृष्टि की है। मुनियोंकी रचना करके ब्रह्माजीने उनसे कहा—'तुम मेरी उपासना करो।' सुनते हैं, उन लोगोंने स्वयं अपनी ही पूजा कर ली। अपने पुत्रोंद्वारा इस प्रकार कर्म-विकृति देखकर ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया—'तुमलोगोंने (ज्ञानाभिमानसे) मेरी जगह अपनी पूजा कर विपरीत आचरण किया है। अतः तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जायगा।'
इस प्रकार शाप-ग्रस्त हो जानेपर उन सभी ब्रह्मपुत्रोंने अपने वंशके प्रवर्तक पुत्रोंको उत्पन्न किया और फिर स्वयं स्वर्गलोक चले गये। उन ब्रह्मवादी मुनियोंके परलोकवासी होनेपर उनके पुत्रोंने विधिपूर्वक श्राद्ध करके उन्हें तृप्त किया। उन पितरोंकी 'वैमानिक' संज्ञा है। वे सभी ब्रह्माजीके मनसे प्रकट हुए हैं। पुत्र मन्त्रका उच्चारण करके पिण्डदान करता है—यह देखते हुए वे वहाँ निवास करते हैं।
गौरमुखने पूछा—ब्रह्मन् ! जितने पितर हैं और उनके श्राद्धका जो समय है, वह मैं जानना चाहता हूँ तथा उस लोकमें रहनेवाले पितरोंके गण कितने हैं, यह सब भी मुझे बतानेकी कृपा करें।
मार्कण्डेयजी कहने लगे—द्विजवर ! देवताओंके लिये सोम-रसकी वृद्धि करनेवाले कुछ स्वर्गनिवासी पितर मरीचि आदि नामोंसे विख्यात हैं। उन श्रेष्ठ पितरोंमें चारको मूर्त (मूर्तिमान्) और तीनको अमूर्त (बिना मूर्तिका) कहा गया है। इस प्रकार उनकी संख्या सात है। उनके रहनेवाले लोकको तथा उनके स्वभावको बताता हूँ, सुनो। सन्तानक नामक लोकोंमें 'भास्वर' नामक पितृगण निवास करते हैं, जो देवताओंके उपास्य हैं। ये सभी ब्रह्मवादी हैं। ब्रह्मलोकसे अलग होकर ये नित्य-