भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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॥ श्रीहरिः ॥

निवेदन

पुराण भारतकी सर्वोत्कृष्ट निधि हैं। प्राचीनकालसे ही भारतवर्षमें पुराणोंका बड़े आदरके साथ पठन-पाठन, श्रवण-मनन और अनुशीलन होता आया है। भारतीय मानसमें भगवद्भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार तथा धर्मपरायणताको दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित करने एवं मानव-जीवनके अन्तिम लक्ष्य—'भगवत्प्राप्ति' अथवा 'मोक्ष्य-साधन'की ओर प्रेरित करनेका श्रेय वस्तुतः पुराणोंको ही है। वेदादि शास्त्रोंके गूढ़तम ज्ञान-तत्त्वों एवं रहस्योंको सरल, रोचक एवं सुमधुर आख्यान-शैलीमें सर्वसाधारणके लिये सुलभ (उपलब्ध) करा देना ही पुराणोंकी अपूर्व विशेषता है। इसीलिये पुराणोंको भारतीय वाङ्‌मयमें विशिष्ट सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त है।

पुराणोंकी ऐसी विलक्षण महिमा और महत्त्वको सादर स्वीकार करते हुए गीताप्रेसने 'कल्याण'के विशेषाङ्कोंके माध्यमसे समय-समयपर अनेक पुराणोंका सरल हिन्दी-अनुवाद जनहितमें प्रकाशित किया है। 'संक्षिप्त वराहपुराणाङ्क' भी उनमेंसे एक है। यह 'कल्याण' के ५१वें वर्षके विशेषाङ्कके रूपमें जनवरी १९७७ ई०में प्रकाशित किया गया था। 'वराहपुराण'की गणना परम सात्त्विक पुराणोंमें की जाती है। इसकी कथाएँ बड़ी ज्ञानप्रद, रोचक और कल्याणकारी हैं। भगवत्परायणता, ज्ञान, वैराग्य, साधना एवं अध्यात्मके विकासके लिये इसका अनुशीलन बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है। इसमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ-यजन श्राद्ध, तर्पण, दान और अनुष्ठान आदिका शिक्षाप्रद और आत्मकल्याणकारी वर्णन है। भगवान् श्रीहरि (श्रीमन्नारायण)-की महिमा, पूजन-विधान, हिमालयकी पुत्रीके रूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शङ्करके साथ उनके विवाहकी रोचक कथा इसमें विस्तारसे वर्णित है। इसके अतिरिक्त इसमें वराह-क्षेत्रवर्ती आदित्य-तीर्थोंका वर्णन, भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाओंके प्रभावसे मथुरामण्डल और व्रजके समस्त तीर्थोंकी महिमा और उनके प्रभावका भी विशद तथा रोचक वर्णन है।

अमावस्या-तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी उत्पत्तिका कथन एवं पूर्णिमा-तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन, मोक्षदायिनी पवित्र नदियोंकी उत्पत्ति, प्रभाव तथा माहात्म्यादि भी इसमें वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त इसमें स्नान, दान, तर्पण आदिकी महिमाके साथ पुण्यकर्मों तथा पापकर्मोंके फलोंका विस्तृत वर्णन है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि त्रिदेवोंकी महिमासहित उनके दिव्य लोकों—ब्रह्मलोक, शिवलोक और वैकुण्ठ आदिका भी इसमें बड़ा ही सुन्दर वर्णन है। साथ ही पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप स्वर्गादि दिव्य लोकोंकी प्राप्ति और पापकर्मोंके परिणाम-स्वरूप भयावह नरकोंकी यातनाका भी वर्णन है। जो मनुष्यको अच्छे और बुरे कर्मोंके करने या उनसे बचनेकी प्रेरणा देता है। संक्षेपमें इसकी सभी कथाएँ अत्यन्त ज्ञानप्रद, रोचक और पुण्यप्रद कर्मोंकी ओर प्रेरित करनेवाली एवं पापकर्मोंसे विरत करनेवाली हैं। वराहपुराणकी फलश्रुति भी इसमें महत्त्वपूर्ण है।

हमारा विशेष प्रेमानुरोध है कि कल्याणकामी सभी महानुभावों, अध्यात्मचेता साधकों और समस्त श्रद्धालुजनोंको इसके अधिकाधिक अध्ययन-अनुशीलनद्वारा विशिष्ट पारमार्थिक लाभ उठाना चाहिये।

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