वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३८ ] सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग [ ८७
सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग
**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि ! अब वह व्याध साधुओंके मार्गका अवलम्बनकर मन-ही-मन गुरुका ध्यान करते हुए निराहार रहकर तपस्या करने लगा। भिक्षा लेनेका समय आनेपर वह वृक्षसे गिरे सूखे पत्ते खा लिया करता था। एक दिनकी बात है, उसे भूख लगी तो किसी वृक्षके नीचे गया। भूखके कारण पेड़के पाससे उसे सूखे पत्ते उठाकर खानेकी इच्छा हुई। पर वैसा करते ही आकाशवाणी हुई—'अरे, ये शाखोटके निकृष्ट पत्ते हैं, इन्हें मत खाओ।' यह शब्द पर्याप्त उच्च स्वरसे हुआ था। अतः वह व्याध उसे छोड़कर हट गया। अब वह किसी दूसरे वृक्षका पत्ता उठाकर लेने लगा। अब पुनः वहाँ भी वैसी ही ध्वनि हुई। इस प्रकारकी आपत्ति मानकर व्याधने उस दिन कुछ भी न खाया और निराहार रहकर बड़ी सावधानीके साथ गुरुदेव आरुणिको स्मरण करते हुए वह तप करनेमें तत्पर रहा।
इस प्रकार वह तप कर ही रहा था कि इतनेमें महर्षि दुर्वासा उस व्याधके पास पधारे। उन ऋषिने देखा—व्याधके प्राणमात्र शरीरमें हैं, पर तपस्याके तेजसे यह ऐसा चमक रहा है, मानो घी डालनेसे अग्नि प्रदीप्त हो रही हो। उस व्याधने उन मुनिवर दुर्वासाजीको सिर झुकाकर प्रणाम किया और बोला—'भगवन् ! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। आज श्राद्धका दिन है। आप अतिथि देवता मेरे पास पधारे हैं। सूखे पत्ते आदिसे श्राद्ध करके आप द्विजवरको मैं तृप्त करना चाहता हूँ।' इधर इसमें कितनी पवित्र भावनाएँ हैं, इन्द्रियाँ कितनी वशमें हो गयी हैं तथा इसने तपसे कितना बल प्राप्त कर लिया है—यह जाननेके लिये वे मुनि भी उद्यत थे ही। अतः उन्होंने उच्च स्वरसे व्याधसे कहा—'ठीक है, तुम अपने पास आये मुझ अतिथिको यव, गेहूँ एवं धान्यसे भलीभाँति सिद्ध किया हुआ अन्न दो। मैं भूखसे अत्यन्त पीडित हो रहा हूँ।' दुर्वासाजीके ऐसा कहनेपर व्याध बड़ी चिन्तामें पड़ गया। वह सोचने लगा—'यह सब सामग्री कहाँसे मिलेगी।' वह इस प्रकार सोच ही रहा था इतनेमें एक सोनेका पवित्र पात्र आकाशसे गिरा। वह पात्र सिद्ध अन्नोंसे पूर्ण था। व्याधने उसे हाथमें उठा लिया और उसे लेकर वह डरता हुआ दुर्वासा मुनिसे कहने लगा—'ब्रह्मन् ! आप परम ब्रह्मज्ञ पुरुष हैं। जबतक मैं भिक्षा लाने जाता हूँ, तबतक आप यहीं रहनेकी कृपा करें। मुझपर किसी प्रकार आपकी इतनी कृपा अवश्य होनी चाहिये।'
इस प्रकार कहकर वह साधु व्याध भिक्षा माँगनेके लिये जैसे ही आगे बढ़ा—इतनेमें उसे बहुत-से उपवन एवं अहीरकी बस्तियोंसे युक्त एक नगर दिखायी पड़ा। वहाँ पहुँचनेपर वृक्षोंमेंसे दूसरे अनेक पुरुष सुवर्णपात्र लिये निकल पड़े और विविध दिव्यान्नोंसे उसकी थालीको भर दिया। व्याध उसे लेकर अपनेको कृतार्थ-सा मानता हुआ अपने स्थानपर लौट आया। वहाँ आकर उसने जापकोंमें श्रेष्ठ महर्षि दुर्वासाको बैठे देखा। मुनिको देखकर उसने प्रसन्नतापूर्वक भिक्षाको एक पवित्र स्थानपर रख दिया और उन्हें प्रणाम कर कहा—'ब्रह्मन् ! यदि आपकी मुझपर दया है तो कृपा करें, यह आसन लें और पैर धोकर पवित्र आसनपर बैठ जायें।' व्याधके ऐसा कहनेपर उसके पवित्र तपोबलकी परीक्षा करनेके विचारसे महर्षिने कहा—'व्याध ! मैं नदी जानेमें असमर्थ हूँ। मेरे पास जलपात्र भी नहीं है; फिर मेरा पैर कैसे धुल सकता है?' मुनिके ऐसा कहनेपर