वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 99, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ३९
व्याध सोचने लगा—'क्या अब करूँ? मुनिजीका मेरे यहाँ भोजन कैसे हो सकेगा?' फिर उस चतुर व्याधने मन-ही-मन अपने गुरु आरुणिको स्मरण किया। साथ ही उस सुन्दर बुद्धिवाले व्याधने उस देविका नदीकी भी स्तुतिपूर्वक शरण ली।
व्याध बोला—नदियोंमें श्रेष्ठ देविके! मैं व्याध हूँ। मैंने सदा पाप-ही-पाप किये हैं। ब्राह्मण-हत्या-जैसा महापाप भी कर चुका हूँ। देवि! फिर भी मैं आपको स्मरण कर आपकी शरण आया हूँ। आप मेरी रक्षा करें। देवता, मन्त्र और पूजनका विधान—यह सब मैं कुछ भी नहीं जानता। देवि! आप नदियोंमें प्रधान हैं। केवल गुरुके उत्तम चरणोंका ध्यान करनेसे मेरा सदा कल्याण होता आया है। अब आप मुझ पापीपर कृपा करें। आपगे! दुर्वासा ऋषि अपना पैर धो सकें, इस निमित्तसे आप उनके संनिकट पधारनेकी कृपा कीजिये।
इस प्रकार व्याधके प्रार्थना करनेपर पापनाशिनी देविका नदी वहीं पहुँच गयीं, जहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दुर्वासा मुनि विराजमान थे। यह देखकर मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे विस्मयविमुग्ध रह गये। साथ ही उन विद्वान् मुनिवर दुर्वासाके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने हाथ-पैर धोकर उसके श्रद्धापूर्वक दिये हुए अन्नको खाया तथा आचमन किया। उस समय व्याधके शरीरमें केवल हड्डी ही शेष रह गयी थी। भूखके कारण वह अत्यन्त दुर्बल हो गया था। दुर्वासा ऋषिने उससे कहा—'अङ्गोंसहित वेद तथा रहस्यके साथ पद एवं क्रम, ब्रह्म-विद्या और पुराण—सभी तुम्हें प्रत्यक्ष हो जायँ।' इस प्रकारका वर देकर दुर्वासाजीने उसका नवीन नामकरण किया। उन्होंने कहा—'तुम अब ऋषियोंमें अग्रगण्य सत्यतपा नामक ऋषि होओगे।'*
मुनिवर दुर्वासाजीने जब इस प्रकार व्याधको वर दिया तो उसने मुनिसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं व्याध होकर वेदोंका अध्ययन कैसे कर सकूँगा।'
ऋषि बोले—साधु व्याध! निराहार रहकर तपस्या करनेसे अब तुम्हारे पहलेके शरीरके संस्कार समाप्त हो गये हैं। तुम्हारा यह तपोमय शरीर उससे सर्वथा भिन्न है—इसमें कोई संशय नहीं। पूर्वकालीन अज्ञान भी शेष नहीं रह गया है। इस समय तुम्हारे अन्तःकरणमें शुद्धरूप अविनाशी परमात्मा निवास कर रहे हैं। अतः तुम परम पवित्र शरीरवाले बन गये हो—यह मैं तुमसे बिलकुल सच्ची बात बता रहा हूँ। मुने! इस कारण तुम्हें वेद और शास्त्र भलीभाँति प्रतिभासित—ज्ञात होंगे। [अध्याय ३८]
मत्स्यद्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन
सत्यतपाने कहा—भगवन्! आप ब्रह्म-ज्ञानियोंके शिरोमणि हैं। आपने जो दो शरीरोंकी बात कही है, यह शरीरभेद कैसे है? आप यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।
दुर्वासाजी बोले—दो ही नहीं, किंतु शरीरके तीन भेद हैं—ऐसा कहना चाहिये। प्राणियोंको ये शरीर इसलिये मिलते हैं कि उनको पाकर वह पूर्वकृत भोग भोगे। तुम्हारी पूर्वकी अवस्था भले
* इसी पुराणमें आगे चलकर ९८वें अध्यायमें भगवान्ने बतलाया है कि वस्तुतः ये सत्यतपा इस जन्ममें भी वाल्मीकिके समान ब्राह्मण ही थे। केवल व्याधोंके संसर्गमें रहकर वे व्याध-से बन गये थे। फिर ऋषियोंके सत्सङ्गसे विशेषकर दुर्वासाके उपदेशसे वे ब्राह्मण हो गये—
स हि सत्यतपाः पूर्वं भृगुवंशोद्भवो द्विजः। दस्युसंसर्गसम्भूतो दस्युवत् समजायत॥
ततः कालेन महता ऋषिसङ्गात्पुनर्द्विजः। बभौ दुर्वाससा सम्यग्बोधितश्च विशेषतः॥