भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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or र्ध्ना? In L9, we have: शकृन्मूर्ध्नोऽपि. In L11, we have: शकृन्मूर्ध्नो. In L18, we have: शकृन्मूर्ध्नोपि. In L19: ablative of शकृन्मूर्द्धन् or शकृन्मूर्ध: शकृन्मूर्द्धात् -> with sandhi before वैशेष्यं: शकृन्मूर्द्धाद्वैशेष्यं! Wait, look at the letter between न्मू and द्वै: It is र्द्धा! Wait, let me look at र्द्धा: is there an ना? No, it's र्द्धा. Wait, let me look really closely at L19: शकृन्मूर्द्धाद्वैशेष्यं! Ah, wait, does it say द्वै then another वै? Look: र्द्धा (with a repha and a-matra), then द् with वै subscript/attached -> द्वै, then शे, ष्यं. Yes! द्वैशेष्यं! द् + वै + शे + ष्यं. It is just शकृन्मूर्द्धाद्वैशेष्यं! Wait

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