भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 23

.............. ॥' Wait, let's check this verse: "भेदो ज्ञानक्रियायाश्च कर्मभेदानिबन्धनः । क्रियाधराणां वैचित्र्ये यद्वा ..." Wait, who is this quote from? Maybe Vākyapadīya or Tantravārttika or Ślokavārttika? Ślokavārttika / Nyāyamañjarī? Wait, look at line 20: "ज्ञानस्य वस्तुतन्त्रत्वाद् ................ ॥" There are dots! The text itself printed dotted lines: "................ ॥"! Look at line 20: "ज्ञानस्य वस्तुतन्त्रत्वात् ................ ॥"

Now let's check Line 21: दृष्ट्यादिकदूराद्विदूरसारवत्त्वेन दर्शनदर्शनस्पष्टतासमष्टत्वाद्वावरवत्त्वे Wait, let's look closely at line 21: दृ-ष्ट्या-दि-क-दू-रा-द्वि-दू-र-सा-र-व-त्त्वे-न Wait, "दृष्ट्यादिके दूराद्विदूरभाववत्त्वेन"? "दर्शनदर्शनस्पष्टतासमष्टत्वाद्वावरवत्त्वे"? Let's read line 21-22: "दर्शनदर्शनस्पष्टताऽस्पष्टत्वाद्वा..." "दर्शनदर्शनस्पष्टताऽस्पष्टत्वाद्वावरवत्त्वे सत्यपि विषयभेदनिश्चयेनैव ज्ञान