भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

भाव-? No, रहितस्वभाव-! Ah! प्राणादिविकाररहितस्वभाव-Line 25 starts with:त्वात्orधारणात्? Wait! Look at the first word of line 25: त्वात्, श्रेष्ठशब्देन मुख्य एव प्राण उक्तः ।Wait, let's look atत्वात्vsधारणात्: Wait, look at line 25, first word: त्वात्, श्रेष्ठशब्देन मुख्य एव प्राण उक्तः । 'प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च'Wait, look at the first letters of line 25:त्वात्? Wait, let's look at line 24 end: प्राणादिविकाररहितस्वभाव-And line 25 start:त्वात्, श्रेष्ठशब्देन मुख्य एव प्राणः उक्तः । 'प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च'Wait, why did I seeधारणात्earlier? That was upside down misreading! It is clearly:त्वात्, श्रेष्ठशब्देन मुख्य एव प्राण उक्तः ।(orप्राणः उक्तः ।) Let's check if there is visarga on प्राण: प्राण उक्तःorप्राणः उक्तः`.

Line 26: `(छा० ५।१।१) इति श्रुतिनिर्देशात् शुक्रनिषेककालभावाच्च तस्य