भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 482 में से

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४४वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

कारवृत्ति स्वयं ही उत्पन्न होती है। यही आन्तर और बाह्य विषयों में विशेष है। अब 'दो उपाधियों को एकदेश में स्थित होने से उनमें भेदजनकत्व नहीं होता' इस कथन पर अतिव्याप्ति दोष का अनुवाद कर उसका परिहार करते हैं।

नन्वेवं स्ववृत्ति-सुखादि-स्मरणस्यापि सुखाद्यंशे प्रत्यक्षत्वापत्ति- रिति चेन्न । तत्र स्मर्यमाणसुखस्यातीतत्वेन स्मृतिरूपान्तःकरणवृत्ते- र्वर्तमानत्वेन तत्रोपाध्योर्भिन्नका^१लीनतया तत्तदवच्छिन्नचैतन्ययो- र्भेदात् । उपाध्योरेकदेशस्थत्वे सत्येकका^२लीनत्वस्यैवोपेधयाभेद- प्रयोजकत्वात् ॥

अर्थ—'दो उपाधियों को एकदेशस्थत्व होने पर भेदजनकत्व नहीं रहता'—यह कहने पर अन्तःकरणस्थित सुखादिस्मरण को भी सुखादि अंश में प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा। (परन्तु ऐसा होना अनिष्ट है, स्मरण को प्रत्यक्ष कहना किसी को भी सम्मत नहीं) यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि 'अन्तःकरणवृत्ति सुख' (अन्तःकरण में होने वाले स्मरण का विषय जो सुख) भूतकालीन है और 'स्मृतिरूप अन्तःकरणवृत्ति' वर्तमानकालीन होती है। इस कारण 'सुखविषय' और 'सुखाकारस्मृतिवृत्ति' इन दोनों उपाधियों में भिन्नकालत्व है। उनका काल भिन्न होने से (सुखरूप विषय का काल भूत, और स्मृति का काल वर्तमान ऐसा कालभेद होने से) सुख और स्मृतिवृत्ति से अवच्छिन्न हुए दोनों चैतन्य भी भिन्न हैं। (इस कारण अप्रत्यक्ष स्मृतिज्ञान में, प्रत्यक्षसुखादिज्ञान के प्रयोजक की अतिव्याप्ति नहीं होती) क्योंकि दोनों उपाधियों को एकदेशस्थत्व होकर एककालीनत्व भी जब हो, तभी वह उपधेय के (उपहित चैतन्य के) अभेद में प्रयोजक हो सकता है। (केवल एकदेशस्थत्व होकर एकाकालीनत्व यदि न हो तो वह उपधेय के अभेद में प्रयोजक नहीं हो सकता)।

**विवरण—**एक प्रदेश में स्थित होने पर भी यदि भिन्नकालित्व दो उपाधियों को हो तो उन्हें उपधेय का भेदकत्व ही रहता है, अभेदकत्व नहीं। (एककालीनत्व तथा एकदेशस्थत्व भी यदि उपाधियों में हो तो उनमें उपभेद का अप्रयोजकत्व रहता है, अन्यथा नहीं।) इस कारण 'मैं सुखी हूँ' इस सुखप्रत्यक्ष के समय जिस प्रदेश में सुखाकार अन्तःकरणपरिणाम था वहीं पर सुखरूप विषय भी था। इस कारण सुखावच्छिन्न चैतन्य से अभिन्न, सुखाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य होता है। परन्तु 'मैं इस सुखस्मरण के समय 'सुख' भूतविषय, और तदाकार वर्तमान वृत्ति इन दोनों के अन्तःकरण रूप एकदेश में स्थित होने पर भी 'सुख' भूतकालीन और 'वृत्ति' वर्तमानकालीन


१. 'कालिकतया'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'कालिकत्व'—इति पाठान्तरम् ।