भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 482 में से

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प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४३

विवरण—घटाकारवृत्ति ( घटसदृश आकार से युक्त हुआ मन का भाग ) घट से संयुक्त होती है । यहाँ संयोग शब्द का अर्थ भी घट को चूना लगाने पर घट और चूने ( सफेद रङ्ग ) का जैसा संयोग होता है वैसा ही 'परिणामपदवाच्य' घटनिष्ठ 'सम्बन्ध-विशेष' है । अतः संयोग, नियमेन अव्याप्यवृत्ति होने से मन का संयोग भी पूरे घट को नहीं व्याप्त कर सकेगा । तब 'सर्वांश से घट प्रत्यक्ष है' यह व्यवहार कैसे सम्भव होगा । तार्किकों की इस शंका का निरसन हुआ । अर्थात् घटाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का अर्थ घट से संयुक्त हुए मन के भाग से अवच्छिन्न चैतन्य है । और घटज्ञान का ( घटाधिष्ठान ब्रह्मचैतन्य का ) 'घट' अंश में घटावच्छिन्नत्वेन प्रत्यक्ष है ।

सुख-दुःखादि पदार्थों से चक्षुरादि इन्द्रियों का सन्निकर्ष नहीं रहने से अन्तःकरण की सुखाद्याकार वृत्ति भी उत्पन्न नहीं हो सकती । तब सुखादि अंश में प्रत्यक्ष कैसे ? यह आशङ्का कर सुखादिकों का 'आन्तर-विषयत्व' है, घटादिकों की तरह की तरह 'बाह्य विषयत्व' नहीं है । उससे उनकी 'प्रत्यक्ष प्रमा' में चक्षुरादि-सन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं होती । इसी आशय से सिद्धान्ती कहता है—

'सुखाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य च नियते-नैकदेशस्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वात् नियमेनाहं सुखीत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ।

अर्थ—सुखादिकों से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' और सुखादि के आकार से परिणत हुई 'अन्तःकरण-वृत्ति' से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य—ये दोनों, नियम से एक ही स्थान में ( अन्तःकरण रूप एक ही स्थान में ) स्थित उपाधिद्वय ( सुखादि और सुखाद्याकार-वृत्तिरूप ) से अवच्छिन्न होने से नियमेन 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान को ( सुखादि के अंश में ) प्रत्यक्षत्व है ।

विवरण—यदि सुखादि, घटादिकों की तरह बाह्य ( शरीर के बाहर ) होते तो उसके प्रत्यक्ष-ज्ञान के लिए ( विषयाकार वृत्ति के लिए ) बाह्य इन्द्रियसन्निकर्ष की आवश्यकता पड़ती, परन्तु सुखादि-विषय तो आन्तर हैं । इस कारण सुखादि ज्ञान को (सुखाद्याकार वृत्ति को) सन्निकर्ष की आवश्यकता नहीं है । वेदान्त-सिद्धान्त के अनुसार सुख, दुःख, काम, सङ्कल्प इत्यादि भाव, अन्तःकरण के धर्म हैं । इसलिए वे अन्तःकरण में ही रहते हैं । सुखादिकों के अनुभवकाल में सुखाद्याकार-वृत्ति भी अन्तःकरण में ही रहती है । अतः सुखादिविषयावच्छिन्न-चैतन्य और सुखाद्याकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का पूर्वोक्त प्रकार से ( दो उपाधियाँ एक प्रदेश में स्थित होने पर उन्हें उपधेय-भेदजनकत्व नहीं होता, इस प्रकार से ) एकत्व होने के कारण सुखादि अंश में उसे प्रत्यक्षत्व है । बाह्यविषयाकार-वृत्ति को इन्द्रियसन्निकर्ष की अपेक्षा होती है । परन्तु आन्तर विषया-


१. 'सुखदुःखाद्य'—इति पाठान्तरम् ।

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