भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४३

विवरण—घटाकारवृत्ति ( घटसदृश आकार से युक्त हुआ मन का भाग ) घट से संयुक्त होती है । यहाँ संयोग शब्द का अर्थ भी घट को चूना लगाने पर घट और चूने ( सफेद रङ्ग ) का जैसा संयोग होता है वैसा ही 'परिणामपदवाच्य' घटनिष्ठ 'सम्बन्ध-विशेष' है । अतः संयोग, नियमेन अव्याप्यवृत्ति होने से मन का संयोग भी पूरे घट को नहीं व्याप्त कर सकेगा । तब 'सर्वांश से घट प्रत्यक्ष है' यह व्यवहार कैसे सम्भव होगा । तार्किकों की इस शंका का निरसन हुआ । अर्थात् घटाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का अर्थ घट से संयुक्त हुए मन के भाग से अवच्छिन्न चैतन्य है । और घटज्ञान का ( घटाधिष्ठान ब्रह्मचैतन्य का ) 'घट' अंश में घटावच्छिन्नत्वेन प्रत्यक्ष है ।

सुख-दुःखादि पदार्थों से चक्षुरादि इन्द्रियों का सन्निकर्ष नहीं रहने से अन्तःकरण की सुखाद्याकार वृत्ति भी उत्पन्न नहीं हो सकती । तब सुखादि अंश में प्रत्यक्ष कैसे ? यह आशङ्का कर सुखादिकों का 'आन्तर-विषयत्व' है, घटादिकों की तरह की तरह 'बाह्य विषयत्व' नहीं है । उससे उनकी 'प्रत्यक्ष प्रमा' में चक्षुरादि-सन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं होती । इसी आशय से सिद्धान्ती कहता है—

'सुखाद्यवच्छिन्नचैतन्यस्य तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्य च नियते-नैकदेशस्थितोपाधिद्वयावच्छिन्नत्वात् नियमेनाहं सुखीत्यादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वम् ।

अर्थ—सुखादिकों से अवच्छिन्न हुआ 'चैतन्य' और सुखादि के आकार से परिणत हुई 'अन्तःकरण-वृत्ति' से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य—ये दोनों, नियम से एक ही स्थान में ( अन्तःकरण रूप एक ही स्थान में ) स्थित उपाधिद्वय ( सुखादि और सुखाद्याकार-वृत्तिरूप ) से अवच्छिन्न होने से नियमेन 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान को ( सुखादि के अंश में ) प्रत्यक्षत्व है ।

विवरण—यदि सुखादि, घटादिकों की तरह बाह्य ( शरीर के बाहर ) होते तो उसके प्रत्यक्ष-ज्ञान के लिए ( विषयाकार वृत्ति के लिए ) बाह्य इन्द्रियसन्निकर्ष की आवश्यकता पड़ती, परन्तु सुखादि-विषय तो आन्तर हैं । इस कारण सुखादि ज्ञान को (सुखाद्याकार वृत्ति को) सन्निकर्ष की आवश्यकता नहीं है । वेदान्त-सिद्धान्त के अनुसार सुख, दुःख, काम, सङ्कल्प इत्यादि भाव, अन्तःकरण के धर्म हैं । इसलिए वे अन्तःकरण में ही रहते हैं । सुखादिकों के अनुभवकाल में सुखाद्याकार-वृत्ति भी अन्तःकरण में ही रहती है । अतः सुखादिविषयावच्छिन्न-चैतन्य और सुखाद्याकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य का पूर्वोक्त प्रकार से ( दो उपाधियाँ एक प्रदेश में स्थित होने पर उन्हें उपधेय-भेदजनकत्व नहीं होता, इस प्रकार से ) एकत्व होने के कारण सुखादि अंश में उसे प्रत्यक्षत्व है । बाह्यविषयाकार-वृत्ति को इन्द्रियसन्निकर्ष की अपेक्षा होती है । परन्तु आन्तर विषया-


१. 'सुखदुःखाद्य'—इति पाठान्तरम् ।

४४वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

कारवृत्ति स्वयं ही उत्पन्न होती है। यही आन्तर और बाह्य विषयों में विशेष है। अब 'दो उपाधियों को एकदेश में स्थित होने से उनमें भेदजनकत्व नहीं होता' इस कथन पर अतिव्याप्ति दोष का अनुवाद कर उसका परिहार करते हैं।

नन्वेवं स्ववृत्ति-सुखादि-स्मरणस्यापि सुखाद्यंशे प्रत्यक्षत्वापत्ति- रिति चेन्न । तत्र स्मर्यमाणसुखस्यातीतत्वेन स्मृतिरूपान्तःकरणवृत्ते- र्वर्तमानत्वेन तत्रोपाध्योर्भिन्नका^१लीनतया तत्तदवच्छिन्नचैतन्ययो- र्भेदात् । उपाध्योरेकदेशस्थत्वे सत्येकका^२लीनत्वस्यैवोपेधयाभेद- प्रयोजकत्वात् ॥

अर्थ—'दो उपाधियों को एकदेशस्थत्व होने पर भेदजनकत्व नहीं रहता'—यह कहने पर अन्तःकरणस्थित सुखादिस्मरण को भी सुखादि अंश में प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा। (परन्तु ऐसा होना अनिष्ट है, स्मरण को प्रत्यक्ष कहना किसी को भी सम्मत नहीं) यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि 'अन्तःकरणवृत्ति सुख' (अन्तःकरण में होने वाले स्मरण का विषय जो सुख) भूतकालीन है और 'स्मृतिरूप अन्तःकरणवृत्ति' वर्तमानकालीन होती है। इस कारण 'सुखविषय' और 'सुखाकारस्मृतिवृत्ति' इन दोनों उपाधियों में भिन्नकालत्व है। उनका काल भिन्न होने से (सुखरूप विषय का काल भूत, और स्मृति का काल वर्तमान ऐसा कालभेद होने से) सुख और स्मृतिवृत्ति से अवच्छिन्न हुए दोनों चैतन्य भी भिन्न हैं। (इस कारण अप्रत्यक्ष स्मृतिज्ञान में, प्रत्यक्षसुखादिज्ञान के प्रयोजक की अतिव्याप्ति नहीं होती) क्योंकि दोनों उपाधियों को एकदेशस्थत्व होकर एककालीनत्व भी जब हो, तभी वह उपधेय के (उपहित चैतन्य के) अभेद में प्रयोजक हो सकता है। (केवल एकदेशस्थत्व होकर एकाकालीनत्व यदि न हो तो वह उपधेय के अभेद में प्रयोजक नहीं हो सकता)।

**विवरण—**एक प्रदेश में स्थित होने पर भी यदि भिन्नकालित्व दो उपाधियों को हो तो उन्हें उपधेय का भेदकत्व ही रहता है, अभेदकत्व नहीं। (एककालीनत्व तथा एकदेशस्थत्व भी यदि उपाधियों में हो तो उनमें उपभेद का अप्रयोजकत्व रहता है, अन्यथा नहीं।) इस कारण 'मैं सुखी हूँ' इस सुखप्रत्यक्ष के समय जिस प्रदेश में सुखाकार अन्तःकरणपरिणाम था वहीं पर सुखरूप विषय भी था। इस कारण सुखावच्छिन्न चैतन्य से अभिन्न, सुखाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य होता है। परन्तु 'मैं इस सुखस्मरण के समय 'सुख' भूतविषय, और तदाकार वर्तमान वृत्ति इन दोनों के अन्तःकरण रूप एकदेश में स्थित होने पर भी 'सुख' भूतकालीन और 'वृत्ति' वर्तमानकालीन


१. 'कालिकतया'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'कालिकत्व'—इति पाठान्तरम् ।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४५

होने से 'सुखावच्छिन्न-तद्वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य न हो पाने के कारण ( सुखावच्छिन्न चैतन्य और तद्वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य दोनों का अभेद न हो पाने के कारण ) प्रत्यक्षत्व-प्रयोजकत्व की सुखस्मरण में अतिव्याप्ति नहीं होती ।

अब सिद्धान्ती ही पूर्वोक्त समाधान की अरुचि से दूसरा समाधान दे रहा है—

यदि चैकदेशस्थत्वमात्रमुपधेयाभेदप्रयोजकं, तदा ^१'अहं पूर्वं सुखीत्यादिस्मृतावतिव्याप्तिवारणाय वर्तमानत्वं विषयविशेषणं देयम् ।

**अर्थ—**और यदि दो उपाधियों का एकदेशस्थत्व ही उपधेय के अभेद में प्रयोजक ( नियामक ) मानना है तो 'मैं पहले सुखी था' इत्यादि स्मृति में उसकी अतिव्याप्ति न होने देने के लिए 'विषय' में 'वर्तमानत्व' विशेषण देना चाहिये ।

विवरण—'तुष्यतु दुर्जनन्याय' से वादी के कथन को ( दो उपाधियों के एकदेशस्थत्व को ही उपधेय भेद में प्रयोजकत्व—नियामकत्व—है ) स्वीकार कर उस प्रयोजकत्व के लक्षण पर भी अतिव्याप्ति नहीं हो पाती, यह बताते हैं । 'प्रमाणचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्याभेदः' इस पूर्वोक्त लक्षण के 'विषय' पद में 'वर्तमानत्व' विशेषण के देने पर 'वर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्य ही' = वर्तमानकालीन विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से अभिन्न जो वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य, वही ज्ञानप्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है, ऐसा लक्षण निष्पन्न होने से सुखादिकों के स्मरणज्ञान में उसकी अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि सुखादिस्मरण में सुखादिविषय, वर्तमानकालीन न होकर भूतकालीन हैं । इस कारण स्मृति में लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती । अब अवर्तमानत्व को उपाधित्व नहीं होता ( अविद्यमान पदार्थ, उपाधि नहीं होता ) । इसलिये 'विषयावच्छिन्न' इतने ही से पूर्वोक्त अतिव्याप्ति का निरसन हो जायगा । उसके लिये 'वर्तमानत्व' इस विषयविशेषण की आवश्यकता न रहने पर भी 'विषय शब्द को उपलक्षण मानकर भूत, भविष्यत्, अविषय इत्यादि अन्य पदार्थों का भी ग्रहण किया जाय—ऐसा यदि कोई कहे तो उसके लिये विषयत्व के उपलक्षणत्व का भी निरसन कर तद्द्वारा पूर्वोक्त अतिव्याप्ति का भी निवारण करने के लिये 'वर्तमानत्व' इस विषय-विशेषण की नितान्त अपेक्षा है । इस प्रकार 'प्रमाणचैतन्य का वर्तमानकालीनविषयावच्छिन्न चैतन्याभेद' यही प्रत्यक्षप्रयोजक है सिद्ध हुआ । इस पर पुनः शंका—

नन्वेवमपि स्वकीयधर्माधर्मौ वर्तमानौ यदा शब्दादिना ज्ञायेते तदा तादृश-शाब्दज्ञानादावतिव्याप्तिः, तत्र धर्माद्यवच्छिन्न-^२तद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्ययोरेकत्वात् ।


१. 'पूर्वमहं सुखी'—इति पाठान्तरम् । २. 'न्नचैतन्य-तद्०'—इति पाठान्तरम् ।

४६वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

अर्थ—ऐसा मानने पर भी जिस समय अपने वर्तमान धर्माधर्म, शब्दादिप्रमाणों के द्वारा जाने जाते हैं, तब उस तरह के शाब्द ज्ञान में अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि वहाँ पर धर्मादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य और तदाकार-वृत्त्यवच्छिन्न हुए चैतन्य दोनों का एकत्व रहता है।

विवरण—'विषय' में 'वर्तमान' विशेषण को लगाने पर भी धर्माधर्मविषयकशाब्द-ज्ञान में उस लक्षण की अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि धर्माधर्म में वर्तमानत्व है। धर्म और अधर्म, मन के धर्म होने पर भी वे स्वभाववैचित्र्य के कारण परोक्ष ही हैं। तथापि 'आप धार्मिक हैं,' 'तू अधार्मिक है' इत्यादि वाक्यरूप शब्द सुनकर 'मैं धार्मिक हूँ' इत्यादि ज्ञान होता है। वह ज्ञान शब्दजन्य होने से शाब्द है। इस शाब्द-ज्ञान में धर्मा-धर्म रूप विषय और तदाकार-वृत्ति (अन्तःकरणपरिणाम) ये दोनों उपाधियाँ एकदेश में स्थित होने से दोनों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का भी अभेद है। इस कारण विषया-वच्छिन्न से वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य के अभेदरूप प्रत्यक्ष का प्रयोजकत्व, धर्माधर्मादिकों के शाब्द ज्ञान में है। क्योंकि सुखादि आन्तर पदार्थों का अन्तःकरण के साथ बिना बाहर गये ही परिणाम होता है, यह अनुभवसिद्ध है। यही प्रकार धर्माधर्मादिकों में भी है। मूलस्थ 'शब्दादिना' के आदि पद से 'मैं सुकृतादृष्ट से (पुण्य से) युक्त हूँ, क्योंकि मैं सुखी हूँ। मैं दुष्कृतादृष्ट से युक्त हूँ, क्योंकि मैं दुःखी हूँ' इत्याकारक अनुमानादिकों का ग्रहण करना चाहिये। शाब्द ज्ञानादिकों में उन धर्मादिकों के जो शब्दादि प्रमाण हैं, उनसे अवच्छिन्न-चैतन्य का और वर्तमान धर्मादिविषयावच्छिन्न-चैतन्य का अभेद है। इस कारण ऐसे धर्माधर्मादिकों के शब्द-ज्ञान में पुनः प्रत्यक्षत्व-प्रयोजक के लक्षण की अतिव्याप्ति हुई। मूल में 'स्वकीयधर्माधर्मों' कहा गया है। यहाँ 'स्वकीय' शब्द से प्रमाण और विषय का एकदेशस्थत्व सूचित किया है।

अब सिद्धान्ती 'इति चेत्' पद से पूर्वोक्त शंका का अनुवाद करके 'न' इत्यादि अग्रिम ग्रन्थ से उसका निरसन करता है—

इति चेत् ? न। योग्यत्वस्यापि विषयविशेषणत्वात्। अन्तःकरण-धर्मत्वाविशेषेऽपि किञ्चिदयोग्यं किञ्चिद्योग्यमित्यत्र फलबलकल्प्यः स्वभाव एव शरणम्। अन्यथा न्यायमतेऽप्यात्मधर्मत्वाविशेषात्¹ सुखादिवद्धर्मादेरपि² प्रत्यक्षत्वापत्तिर्दुर्वारा ॥

अर्थ—('विषय' में 'वर्तमान' विशेषण के देने पर भी वर्तमान धर्माधर्म के शाब्दजन्य ज्ञान में लक्षण की अतिव्याप्ति होती है) ऐसा यदि कहें तो ठीक नहीं है।


१. 'षेऽपि' - इति पाठान्तरम् ।
२. 'देः प्रत्य०'-इति पाठान्तरम् ।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४७

क्योंकि योग्यत्व को भी विषयविशेषणत्व है । ( प्रत्यक्षत्वप्रयोजक के लक्षण में 'विषय' शब्द के साथ 'वर्तमान' विशेषण की तरह 'योग्य' विशेषण भी जोड़ना चाहिये । तब धर्मा-धर्मादिकों के शाब्द-ज्ञान में प्रत्यक्षत्वप्रयोजक लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि सुखादिकों की तरह धर्मादिकों में अन्तःकरणधर्मत्व होने पर भी उनमें से कुछ प्रत्यक्षयोग्य और कुछ प्रत्यक्ष के अयोग्य हुआ करते हैं, इस विषय में फलबल से कल्पनीय स्वभाव ही शरण ( आधार ) है । ऐसा न मानने पर न्यायमत पर भी यही दोष आता है । न्यायमत में भी सुखादिकों की तरह धर्मादिकों में भी आत्मधर्मत्व समान होने से प्रत्यक्षत्व की प्राप्ति होना दुर्वार ( अपरिहार्य ) है । अर्थात् नैयायिक सुख-दुःख के समान धर्म अधर्म को भी आत्मा के धर्म जानते हैं । इस कारण फलबलकल्प्य स्वभाव का शरण न मानने पर उन्हें भी सुखादि की तरह धर्माधर्म का प्रत्यक्ष होना स्वीकार करना होगा ।

विवरण--'प्रमाणचैतन्य और वर्तमानविषयावच्छिन्न-चैतन्य का अभेद' प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है । यहाँ पर 'विषय' को 'वर्तमान' विशेषण की तरह 'योग्यत्व' विशेषण भी देना चाहिये । योग्यत्व का अर्थ है—प्रत्यक्षयोग्यत्व । इस विशेषण के जोड़ने पर 'वर्तमान और प्रत्यक्ष ज्ञान के योग्य होना—विषयावच्छिन्न चैतन्य का वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य के साथ अभेद रहना—प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है—' यह लक्षण सिद्ध होता है । धर्म और अधर्म प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं किन्तु परोक्ष हैं, और प्रस्तुत लक्षण में 'विषय' को 'प्रत्यक्षयोग्य' विशेषण दिया है । इस कारण उक्त लक्षण की धर्माधर्म में अतिव्याप्ति नहीं होती ।

शंका—सुखादि और धर्मादि दोनों यदि अन्तःकरण के ही धर्म हैं अर्थात् दोनों में अन्तःकरणधर्मत्व यदि समान है तो उनमें से कुछ धर्मों में प्रत्यक्ष योग्यता है और कुछ में नहीं—यह मानने में क्या नियामक है ?

समाधान—सुखादि और धर्मादि दोनों यद्यपि एक अन्तःकरण के ही धर्म हैं तथापि तद्वृत्ति-सुखादि, प्रत्यक्ष ज्ञान के योग्य हैं और धर्मादि, प्रत्यक्ष योग्य नहीं हैं—ऐसा मानने में कारण उनका भिन्न-स्वभाव ही है । अनुद्भूतत्व, धर्मादिकों का स्वभाव है । इस कारण धर्मादिक, प्रत्यक्ष के योग्य नहीं हैं और उद्भूतत्व, सुखादिकों का स्वभाव है, इस कारण सुखादिक, प्रत्यक्ष के योग्य हैं । अर्थात् अन्तःकरण के धर्मों में से कुछ प्रत्यक्ष के योग्य हैं और कुछ नहीं । इस विषय में फलबल से कल्पनीय ( फल रूप कार्य से अनुमान किया जाने वाला ) पूर्वोक्त उद्भूतत्व और अनुद्भूतत्वरूप स्वभाव ही अगत्त्या स्वीकार करना पड़ता है । इसके सिवाय अन्य उपाय नहीं । नैयायिकों को भी इस फलबलकल्प्य स्वभाव का सहारा लेना है । अन्यथा उनके मत में भी धर्मादिकों का प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि वे सुखादिकों को तो प्रत्यक्ष योग्य मानते हैं और धर्मादिकों को प्रत्यक्ष के अयोग्य मानते हैं । परन्तु इसकी उपपत्ति को वे भी फलबलकल्प्य-स्वभाव

४८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रत्यक्षविचारः

को बिना शरण किये बता नहीं सकते। इसलिए एक ही वस्तु के अनेक धर्मों में प्रत्यक्ष योग्यता है और कुछ में नहीं, इसमें स्वभावविशेष ही नियामक है।

इस प्रकार प्रत्यक्षत्वप्रयोजक-लक्षण की धर्माधर्म के शब्द ज्ञान में शंकित अतिव्याप्ति का असंभव दिखाकर पुनश्च आगामी शंका को बताते हुए उसका समाधान करते हैं—

न चैवमपि सुखस्य वर्तमानतादशायां त्वं सुखीत्यादिवाक्यजन्यज्ञानस्य प्रत्यक्षता स्यादिति वाच्यम्। इष्टत्वात्, 'दशमस्त्वमसि' इत्यादौ सन्निकृष्टविषये शब्दादप्यपरोक्षज्ञानाभ्युपगमात्¹।

अर्थ— "'विषय' में 'योग्य' विशेषण के देने पर भी सुख की वर्तमान अवस्था में 'तू सुखी है' इस वाक्य से पैदा होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्षता प्राप्त होगी (वह वाक्यजन्य ज्ञान, प्रत्यक्ष है)। अर्थात् वह 'योग्य' पदघटित लक्षण भी वाक्यजन्य ज्ञान में अतिव्याप्त होगा।" यह कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि उस वाक्यजन्य ज्ञान को हम 'अपरोक्ष' ही मानते हैं और यही हमें इष्ट है (उसका अपरोक्षत्व ही हमें सम्मत है)। इस कारण पूर्वोक्त लक्षण पर अतिव्याप्ति नहीं होने पाती। कारण 'तू दसवाँ है' इत्यादि जिस वाक्यजन्य ज्ञान का विषय संनिकृष्ट होता है, ऐसे शब्द से होनेवाला ज्ञान भी अपरोक्ष ही होता है, यह हमारा अभ्युपगम (सिद्धान्त) है। अतः पूर्वोक्त दोष नहीं है।

विवरण— प्रत्यक्षत्वप्रयोजक-लक्षण के 'विषय' पद में 'वर्तमानत्व' और 'योग्यत्व' इन दो विशेषणों के लगाने पर भी सुख की वर्तमानतावस्था में (जब कि व्यक्ति, सुख का साक्षात् अनुभव ले रहा हो तब) किसी व्यक्ति से 'तुम सुखी हो' कहने पर 'मैं सुखी हूँ' इत्याकारक ज्ञान को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होगा। (तुम सुखी हो' इस वाक्य से होने वाले 'मैं सुखी हूँ' इत्याकारक ज्ञान को अपरोक्ष = प्रत्यक्ष कहना होगा) क्योंकि सुखा-


१. शब्दो हि परोक्षज्ञानजननस्वभावः कथमिव अपरोक्षज्ञानं स जनयेत्? इति जिज्ञासायां 'दशमस्त्वमसी'ति आप्तवाक्याज्जायमानं 'दशमत्व'-ज्ञानमपरोक्षमेव, न परोक्षम्। अन्यथा अपरोक्षस्य भ्रमस्याऽनिवृत्तेः। अपरोक्षज्ञानमेव भ्रमनिवर्तकं भवति तथा च पञ्चदशीकाराः—

"न मृतो दशमोऽस्तीति श्रुत्वाप्तवचनं तदा।
परोक्षत्वेन दशमं वेत्ति स्वर्गादिलोकवत्॥
त्वमेव दशमोऽसीति गणयित्वा प्रदर्शितः।
अपरोक्षतया ज्ञात्वा हृष्यत्येव न रोदिति॥"

न च आप्तवाक्यस्य अपरोक्षज्ञानजनकत्वे शाब्दबोधोच्छेद एव स्यादिति शङ्कनीयम्। प्रमातृभिन्नाथंकस्य शब्दस्यैव अपरोक्षज्ञानजनकत्वमिति नियमः, नान्यस्य। अत एव 'सन्निकृष्टविषये प्रमातृभिन्नाथंविषय इत्यर्थः, न तु इन्द्रिय सन्निकृष्टे विषये' इत्यवगन्तव्यम्, तथैव प्रमाणान्तरस्यापि प्रमातृभिन्नाथंविषये अपरोक्षज्ञानजनकत्वमस्ति।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ४९

समय 'सुख', वर्तमान तथा प्रत्यक्ष के योग्य भी होता है। इस कारण उस सुखज्ञान में 'योग्य और वर्तमान विषय' से अवच्छिन्न चैतन्य के साथ अभिन्न-तत्त्ववच्छिन्न चैतन्य, होता है। परन्तु 'त्वं सुखी' वाक्य से होने वाला ज्ञान, पूर्वोक्तलक्षण का लक्ष्य ही नहीं बन सकता। क्योंकि वाक्यजन्य-ज्ञान, नियमेन 'परोक्ष' रहता है। इस कारण वाक्य-जन्य-ज्ञान में (अलक्ष्य में लक्षण का रहना रूप) अतिव्याप्ति होती है।

सिद्धान्ती—'वाक्यजन्य-सुखादि-ज्ञान का प्रत्यक्ष होना' हमें इष्ट ही है। इसलिये अतिव्याप्ति नहीं है।

वादी—(१) 'तू सुखी है' इत्यादि वाक्य, स्वविषय सुखादि का अपरोक्ष ज्ञान करानेवाला नहीं होता। (२) क्योंकि यह वाक्य है। सभी वाक्य परोक्ष ज्ञान कराने वाले होते हैं—यह व्याप्ति है। (३) ज्योतिष्टोमादि वाक्यों के समान। अथवा (१) 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञान अपरोक्ष नहीं है। क्योंकि वह वाक्यजन्य है। (२) ज्योतिष्टोमादि वाक्यजन्य ज्ञान के तुल्य। इत्यादि अनुमान-प्रमाण¹ से वाक्यजन्य-ज्ञान को नियमेन परोक्षत्व होता है। ऐसी स्थिति में आप 'तू सुखी है' इस वाक्य से होनेवाले ज्ञान में अपरोक्षत्व हमें इष्ट ही है—कैसे कह सकते हैं ?

सिद्धान्ती—'तू दसवां है' इस वाक्य से 'मैं दसवां हूँ' इत्याकारक ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट = प्रत्यक्ष होने से उससे होने वाला ज्ञान भी 'प्रत्यक्ष' है। इस कारण 'वाक्य-जन्य ज्ञान में नियमेन परोक्षत्व ही रहता है'—आपके इस नियम का सन्निकृष्ट विषयक वाक्यार्थज्ञान में व्यभिचार होता है। उपर्युक्त दो अनुमानों में आपने क्रमशः 'वाक्य-त्वात्' और 'वाक्यजन्यत्वात्' दिये हुए दोनों हेतु, सोपाधिक हैं, उनमें 'सन्निकृष्ट-विषयत्व' उपाधि² है। सिवाय हेतुओं में सत्प्रतिपक्षत्व भी है। (१) 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यजन्य-ज्ञान, अपरोक्ष है। (२) क्योंकि उसका विषय अपरोक्ष है। (३) चाक्षुष प्रत्यक्ष के तुल्य। इस प्रत्यनुमान³ में हेतु के साध्य का (परोक्षत्व का) अभाव सिद्ध करनेवाला है। इस कारण आपके दोनों हेतु सत्प्रतिपक्षित⁴ हैं।

'तू दसवां है' इस वाक्य को सुनकर 'मैं ही दसवां हूँ' यह जो ज्ञान होता है, उसे इन्द्रियजन्य नहीं कह सकते। क्योंकि पूर्वोक्त वाक्य के श्रवण से पूर्व, इन्द्रियसन्निकर्ष के रहने पर भी (अन्य सब, दसवें मनुष्य को और स्वयं को दसवां स्वयं को प्रत्यक्ष


१. 'त्वं सुखी'त्यादिवाक्यं सुखविषयकाऽपरोक्षज्ञानाऽजनकं वाक्यत्वात्, ज्योतिष्टोमादिवाक्यवत् । यद् यद्वाक्यं तत्तत्परोक्षज्ञानजनकमितिव्याप्तिः ।
अथवा—'तत्त्वमसीत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानं परोक्षं, वाक्यजन्यत्वात् ज्योतिष्टोमादिवाक्यजन्यज्ञानवत् ।'
२. उपाधिर्नाम—साध्यव्यापकत्वेसति साधनाऽव्यापकत्वम् ।
३. 'तत्त्वमसीत्यादिवाक्यजन्यं ज्ञानम् अपरोक्षम्, अपरोक्षविषयत्वात्, चाक्षुषप्रत्यक्षवत्
४. 'साध्याभावसाधकं हेत्वन्तरं यस्य स सत्प्रतिपक्षः ।'

५०वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

देखता हुआ भी 'मैं ही दसवाँ' यह ज्ञान किसी को भी नहीं हुआ था। 'प्रत्यक्ष-ज्ञान उत्पन्न करते समय इन्द्रियों को, शब्द का सहकारित्व रहता है' ऐसा किसी ने भी नहीं माना है। इसलिए 'तू दसवाँ' इस ज्ञान को 'शब्दसहकृत-इन्द्रियजन्यत्व होने से अपरोक्षत्व है' यह नहीं कह सकते और इन्द्रियजन्यत्व न होने से वह ज्ञान 'परोक्ष ही है' यह भी नहीं कह सकते। क्योंकि उसे यदि परोक्ष कहें तो 'दसवाँ है' यह परोक्ष ज्ञान, 'दसवाँ नहीं' इस अपरोक्ष अध्यास की निवृत्ति नहीं कर पाता। इसलिए 'तू दसवाँ है' अथवा 'तू वह ब्रह्म है' इत्यादि अपरोक्ष-विषयक वाक्य से हुआ ज्ञान, अपरोक्ष ही है—यह मानना पड़ता है।$^१$

शंका—'अपरोक्ष-विषयक वाक्य से हुआ ज्ञान अपरोक्ष ही होता है' मानने पर 'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमिति-ज्ञान को भी प्रत्यक्ष कहना पड़ेगा, यह शंका कर अनुमिति ज्ञान में प्रत्यक्षत्व की प्राप्ति 'पर्वत' अंश में होगी या 'वह्नि' अंश में होगी ? पर्वतांश में यदि कहें तो वह हमें इष्ट ही है। इस आशय से ग्रंथकार समाधान करते हैं—

अत एव पर्वतो वह्निमानित्यादि ज्ञानमपि वह्न्यंशे परोक्षं पर्वतांशेऽपरोक्षम्, पर्वताद्यवच्छिन्न-चैतन्यस्य बहिर्निःसृतान्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्या$^२$भेदात् । वह्न्यंशे त्वन्तःकरणवृत्तिनिर्गम$^३$नासम्भवेन वह्न्यवच्छिन्नचैतन्यस्य प्रमाणचैतन्यस्य च परस्परं भेदात् । तथा चानुभवः 'पर्वतं पश्यामि, वह्निमनुमिनोमीति' ।

न्यायमते $^४$तु पर्वतमनुमिनोमीत्यनुव्यवसायापत्तिः ।


१. पं. द. तृप्तिदीप, श्लो० २३-२७ ।
२. 'न्यस्य च परस्परं भेदाभावात्'-इति पा. ।
३. 'माभावेन'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'मते पर्व०'-इति पाठान्तरम् ।
५. अयमभिप्रायः—विषयस्वरूपग्रहणसमकालमेव ज्ञानस्वरूपमपि गृह्यते । तत्र यादृशाकारो विषयः तादृशाकारमेव तं विषयं, ज्ञानं गृह्णाति । पर्वतांशे ज्ञानं यदि अनुमितिरूपं स्यात् तदा तदनुमितिरूपमेव गृह्णीयात् पर्वतमनुमिनोमीति, किन्तु तथा तन्नगृह्णाति । सर्वेषामपि ज्ञानग्रहणाकारः पर्वतं पश्यामीत्येव भवति । अयः पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं न लोकविरुद्धम् । किन्तु न्यायमते नैतत्सम्भवति, यतः न्यायमते व्यवसायानन्तरमनुव्यवसायो भवति । तत्र विषयज्ञानं व्यवसाय इत्युच्यते । ज्ञानस्य ज्ञानं तु अनुव्यवसाय इत्युच्यते । प्रत्यक्षे विषयज्ञानस्याकारो घटोऽयमिति । अनुमितौ पर्वतो वह्निमानिति । प्रत्यक्षे ज्ञानविषयक-ज्ञानस्याकारो घटं पश्यामीति । अर्थात् घट-विषयकज्ञानवानहमित्याकारः । अनुमितौ तु वह्निमनुमिनोमीति । अर्थात् वह्निविषयकानु-मितिज्ञानवानहमित्याकारः । तत्र पर्वतांशे ज्ञानं यदि अनुमितिरूपं स्यात्, तदा तदनुमिति-रूपं गृह्णीयात्, ज्ञानग्रहणाकारश्च पर्वतमनुमिनोमीति स्यात् । न च तथा नैयायिका-नामपि । अतः पर्वतांशे ज्ञानं प्रत्यक्षमेवाभ्युपगन्तव्यं, नाऽप्रत्यक्षम् ।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५१

अर्थ—इसलिये ( प्रमाणचैतन्य और योग्यवर्तमानविषयचैतन्य के अभेद को प्रत्यक्ष-प्रयोजकत्व है—हमारा यह अभ्युपगम होने से ही ) 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि ज्ञान भी 'वह्नि अंश' में परोक्ष और 'पर्वत अंश' में अपरोक्ष है, क्योंकि पर्वतादिकों से अवच्छिन्न हुए चैतन्य और इन्द्रिय के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरणवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद है । परन्तु 'वह्नि अंश' में अन्तःकरण-वृत्ति का देह के बाहर निकलने का संभव न होने से वह्न्यवच्छिन्न-चैतन्य और प्रमाणचैतन्य का परस्पर भेद है ( इस कारण 'पर्वतो वह्निमान्' यह अनुमिति-ज्ञान 'वह्नि अंश' में परोक्ष है ), तथा अनुभव भी 'मैं पर्वत को देखता हूँ और उस पर स्थित अग्नि का अनुमान करता हूँ' ऐसा ही है । परन्तु इसके विपरीत न्यायमत में 'मैं पर्वत का अनुमान करता हूँ' ऐसा अनुव्यवसाय होता है ।

विवरण—'प्रमाणचैतन्य और प्रमेयचैतन्य के अभेद' को हमने प्रत्यक्ष का प्रयोजक माना है । ( जिस ज्ञान का विषय सन्निकृष्ट = अतिसमीप होता है, वह ज्ञान, इन्द्रिय-जन्य न होने पर भी अपरोक्ष माना जाता है ) इसलिये 'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि ज्ञान भी सन्निकृष्ट-स्थित 'पर्वत' अंश में अपरोक्ष है और चक्षु से सन्निकृष्ट न हुए 'वह्नि' अंश में परोक्ष है । 'पर्वत' अंश में अपरोक्ष कैसे होता है ? यदि पूछो, तो बताते हैं—पर्वतविशिष्ट चैतन्य और तदाकार-अन्तःकरणवृत्ति विशिष्ट चैतन्य का अभेद हुआ है । 'प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य का अभेद ही प्रत्यक्ष का प्रयोजक ( कारण ) है' यह हमारा अभ्युपगम होने से 'पर्वत वह्निमान् है' यह ज्ञान, पर्वत रूप विषय-अंश में अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है । परन्तु उपर्युक्त वाक्य से जिस अग्नि का ज्ञान होता है उस अग्नि से अन्तःकरणवृत्ति का साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता । इस कारण अग्निविशिष्ट चैतन्य और अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रमाणचैतन्य का परस्पर भेद है, अभेद नहीं । इसलिए वह्नि अंश में पूर्वोक्त ज्ञान को प्रत्यक्षत्व न होकर परोक्षत्व है ।

परन्तु भट्टापाद ने कहा है— 'सिद्धानुगममात्रं हि कर्तुंयुक्तं परीक्षकैः । न सर्वलोकसिद्धस्यलक्षणेन निवर्तनम् ॥' श्लो० वा० सू० ४-श्लो० १३३ ।

अर्थात् परीक्षकों को लोक-प्रसिद्धि का अनुसरण करना ही योग्य है । लोकप्रसिद्धि को छोड़कर केवल लक्षण से सर्वलोकप्रसिद्ध वस्तु का निवर्तन करना कभी भी उचित नहीं है । इसलिए 'पर्वत वह्निमान् है' इस प्रसिद्ध अनुमिति को केवल लक्षण के द्वारा हटाना योग्य नहीं है । इस शंका का समाधान ग्रंथकार 'तथा च' वाक्य से करते हैं । हमारे कहने के अनुसार ही लोकप्रसिद्धि भी ( लोगों का अनुभव भी ) है । सभी लोक 'मैं पर्वत को प्रत्यक्ष देखता हूँ' परन्तु उस पर स्थित अग्नि को प्रत्यक्ष नहीं देख रहा हूँ, किन्तु 'धूम' लिङ्ग से उसका अनुमान करता हूँ' यही कहते हैं । अर्थात् हम लोकप्रसिद्धि का अनुसरण कर ही—'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान 'पर्वत अंश' में अपरोक्ष है और 'वह्नि अंश' में परोक्ष है—कहते हैं; लोकप्रसिद्धि का अपलाप नहीं करते ।

५२वेदान्तपरिभाषा[ प्रत्यक्षविचारः

इस प्रकार हम वेदान्तपक्ष में लोकप्रसिद्धि का अनुसरण किस प्रकार होता है यह दिखाकर नैयायिक अपने पक्ष में लोकप्रसिद्धि का अतिक्रमण कैसे करते हैं, उसे दिखाने के लिये 'न्यायमते तु' इत्यादि ग्रंथ का प्रारम्भ करते हैं । न्यायमत में ही 'मैं पर्वत का अनुमान करता हूँ' यह अनुव्यवसाय होता है । क्योंकि नैयायिक पर्वत को और उस पर स्थित धूम को भी प्रत्यक्ष देखकर पश्चात् 'यह पर्वत वह्निमान् है' ऐसा अनुमान करता है । इस कारण 'यह घट' इस प्रकार पहले प्रत्यक्ष देखकर पश्चात् 'मैं घट को जानता हूँ' इस मानस-अनुव्यवसाय के समान उस अनुमितिज्ञान में भी अनुव्यवसायत्व है, व्यवसायत्व ( इन्द्रियजन्यपूर्वज्ञानत्व ) नहीं । मूलस्थ 'न्यायमते तु' यहाँ 'तु' शब्द वेदान्त से न्यायमत में वैलक्षण्य व्यक्त करने के लिए है । अब ग्रन्थकार किस अनुमिति में 'ज्ञान' सर्वांश में परोक्ष होता है—बताकर 'सुरभिचन्दनम्' ज्ञान में भी पूर्वोक्त न्याय ही लगता है—बताते हैं ।

'१असन्निकृष्टपक्षकानुमितौ तु सर्वांशेऽपि ज्ञानं परोक्षम् । सुरभि-चन्दनमित्यादिज्ञानमपि चन्दनखण्डांशे२ अपरोक्षं, सौरभांशे३ तु परोक्षं, सौरभस्य चक्षुरिन्द्रियायोग्यतया योग्यत्वघटितस्य निरुक्त-लक्षणस्याभावात्४ ॥

अर्थ—जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष, असन्निकृष्ट ( चक्षुरादि इन्द्रियों से असम्बद्ध इन्द्रियों का विषय न बननेवाला ) होता है । उसमें 'ज्ञान' सभी अंशों में परोक्ष ही होता है । क्योंकि 'योग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेद' रूप प्रत्यक्षप्रयोजक का वहाँ अभाव है । 'यह चन्दन का मूठा सुगन्धी है' इत्यादि दूरस्थ मूठे को ( विषय को ) देख होनेवाला ज्ञान भी 'चन्दन का मूठा' इस अंश में अपरोक्ष और सुगन्ध अंश में परोक्ष है । क्योंकि 'सुगन्ध' चक्षुरिन्द्रिय के विषय होने योग्य नहीं है । ( सौरभ में चक्षुरिन्द्रिय का विषय बनने की योग्यता नहीं है ) और प्रत्यक्षप्रयोजकत्व के पूर्वोक्त लक्षण में 'योग्य' विशेषण दिया है । अतः योग्यत्वघटित निरुक्त ( पूर्वोक्त ) लक्षण का यहाँ अभाव है ।


१. 'पर्वतं पश्यामि, वह्निमनुमिनोमी'त्युपयुक्तप्रकारेण पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं वह्न्याद्यंशे च परोक्षत्वमिति अनुमितौ द्विरूपं ज्ञानं भवति चेत् 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः पृथिवीत्वात् घटवत्' इत्यादौ परमाण्वंशेऽपि प्रत्यक्षं स्यात्, इत्यत आह 'असन्निकृष्टे'ति । 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः' इत्यादौ अप्रत्यक्षपक्षकानुमितौ पक्षे साध्ये च ज्ञानं परोक्षमवगन्तव्यम् ।
२. चन्दनांशेऽपरोक्षमिति पाठान्तरम् ।
३. सौरभांशे परोक्षम्-इति पाठान्तरम् ।
४. वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याऽभिन्नयोग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्यत्वरूपस्य अभावत् । तत्र हेतुः इन्द्रियाऽसन्निकृष्टतयेति ।

प्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५३

विवरण—परन्तु इसके विपरीत ( १ )—'पृथिवी के परमाणु गंधवान् हैं। ( २ )—क्योंकि उनमें पृथिवीत्व है। ( ३ )—घटादिकों के समान' । इस अनुमान¹ में पृथिवी के परमाणु-पक्ष हैं। परन्तु वे अप्रत्यक्ष ( असन्निकृष्ट ) हैं। क्योंकि उनमें प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है। इसी तरह जिस अनुमिति-ज्ञान में 'पक्ष' अप्रत्यक्ष होता है उस अनुमान में पक्ष और साध्य रूप दोनों अंशों में ज्ञान 'परोक्ष' होता है। और जिस अनुमिति में पक्ष, प्रत्यक्ष रहता है वहाँ पक्ष रूप अंश में ज्ञान प्रत्यक्ष रहता है और साध्य अप्रत्यक्ष ( परोक्ष ) रहता है। अतः जिस अनुमिति में पक्ष तथा साध्य भी अप्रत्यक्ष हो वहाँ पक्ष और साध्य रूप दोनों अंशों में ज्ञान परोक्ष ही रहता है—इस नियम के अनुसार ही 'सुरभिचन्दनम्' ज्ञान की विशेषता के सम्बन्ध में शंका करते हैं—

शंका—चन्दन का मूठा; देखनेवाले व्यक्ति से दूर है, और उस व्यक्ति को 'यह चन्दन का मूठा सुगन्धी है' इत्याकारक ज्ञान उस मूठे को देखकर ही हुआ है। ऐसी स्थिति में यह ज्ञान 'सौरभ' अंश में परोक्ष है या अपरोक्ष ? उस ज्ञान में परोक्ष की सामग्री न होने से उसे परोक्ष नहीं कह सकते। 'जहाँ जहाँ चन्दन का टुकड़ा होता है, वहाँ वहाँ सुरभित्व होता है' इत्यादि व्याप्तिज्ञानादि, 'परोक्ष ज्ञान' की सामग्री है, परन्तु वह ( सामग्री ) 'चन्दन सुरभि है' इस ज्ञान के पूर्व सम्भव नहीं होती। सिवाय उस ज्ञान का विषय जो 'सौरभ', वह प्रत्यक्ष-योग्य भी है। इसलिए उस विषय में भी अनुमान करना व्यर्थ है। अतः 'सुरभि चन्दनम्' यहाँ ज्ञान को 'सौरभ अंश' में परोक्ष नहीं कह सकते, और अपरोक्ष भी नहीं कह सकते। क्योंकि वहाँ सुगन्धाकार वृत्ति, उत्पन्न नहीं हुई है। और विषयाकार वृत्ति जब तक उत्पन्न नहीं होती तब तक अपरोक्ष ज्ञान का सम्भव नहीं।

समाधान—इस पर सिद्धान्ती कहता है—'चन्दन सुगन्धि है' यहाँ सौरभ अंश में ज्ञान को हम परोक्ष ही मानते हैं। ( मूल में 'इत्यादि ज्ञानम्' के आदि शब्द से 'मधुर आम्रफल' इत्यादि दूसरे ज्ञानों का भी ग्रहण करना चाहिये ) किसी व्यक्ति ने दूर से ही चन्दन का मूठा अथवा आम्रफल को चक्षु से देखा और उसे वह मूठा या फल देखकर ही 'चन्दन सुगन्धि है और आम्रफल मधुर है' ज्ञान हुआ। उस स्थिति में उसे गन्ध का या रस का जो ज्ञान हो रहा है, वह परोक्ष है या अपरोक्ष ? क्योंकि उसने चन्दन को स्वयं सूंघा नहीं या आम्रफल को चखा नहीं, किन्तु दूर से ही उन पदार्थों को चक्षु से केवल देखा है। अतः उस ज्ञान में संशय होता है।

तथापि ऐसे प्रसंग में गंध-रसादिकों का ज्ञान 'परोक्ष' और चन्दन का टुकड़ा तथा आम्रफल का ज्ञान 'अपरोक्ष' रहता है, यही मानना चाहिये। क्योंकि उस व्यक्ति ने पहले उसी चन्दन का यदि गन्ध लिया होता तो मूठे को केवल देखकर ही 'वह सुगन्धी है' यह उत्पन्न हुआ ज्ञान 'स्मृति' कहावेगा। और यदि उसने पहले बिना सूंघे ही 'वह


१. 'पृथिवीपरमाणवः गन्धवन्तः पृथिवीत्वात् घटवत्' इत्यनुमानम् ।

५४ | वेदान्तपरिभाषा | [ जातिखण्डनम्

सुगंधी है' यह ज्ञान उसे हो रहा हो तो 'चन्दन-खण्डत्व' रूप लिंग (हेतु) से होनेवाला सौरभज्ञान 'अनुमितिज्ञान' कहावेगा। आम्रफल के मधुर रस के विषय में भी इसी तरह समझना चाहिये। क्योंकि पूर्वोक्त 'पर्वत अग्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में पर्वत की तरह प्रस्तुत उदाहरण में सौरभ व माधुर्य का आश्रयभूत मूठा और आम्रफल प्रत्यक्ष दीखते हैं। इस कारण तत्तद् अंश में उनका ज्ञान अपरोक्ष ही है।

शंका—सौरभ में भी योग्यविषयता है। वह घ्राणेन्द्रिय का विषय बन सकता है। तब सौरभ अंश में भी ज्ञान अपरोक्ष क्यों नहीं ? अर्थात् सुगन्ध में इन्द्रिययोग्यविषयत्व होते हुए भी उसका ज्ञान क्यों न प्रत्यक्ष हो।

समाधान—सौरभ में चक्षुरिन्द्रिय-विषय होने की योग्यता नहीं है तथापि घ्राणेन्द्रिय के विषय होने की योग्यता है, क्योंकि सुगन्ध घ्राणेन्द्रिय का विषय है, वह चक्षुरिन्द्रिय का विषय नहीं। इस कारण हमने प्रत्यक्ष-प्रयोजक का जो पहले 'तत्तदिन्द्रिययोग्यत्वघटित' लक्षण¹ बताया है, उसका इस सौरभ में अभाव है। केवल चक्षु से देखकर सौरभ का अपरोक्ष ज्ञान होना शक्य नहीं। इसलिये उपर्युक्त शंका हो नहीं सकती।

जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष 'असन्निकृष्ट' (परोक्ष) रहता है उस अनुमिति में पक्ष की अपरोक्षता का असन्निकृष्टत्व (परोक्षत्व) जैसा बाधक बनता है उसी तरह जिस अनुमिति में पक्ष सन्निकृष्ट (अपरोक्ष) है ऐसे 'चन्दन सुरभि है' ज्ञान में 'पक्षांश' का ज्ञान अपरोक्ष तथा 'साध्यांश' का ज्ञान परोक्ष होता है। यह मानने पर प्रसिद्ध जातिबाधक 'सांकर्य' की प्राप्ति बाधक होती है। इस कारण 'ज्ञान, पक्ष के अंश में अपरोक्ष और साध्य के अंश में परोक्ष होता है' यह तुम्हारा पूर्वोक्त कथन अनुचित है। इस शंका का अनुवाद कर उसका निरसन किया जाता है :--

न चैवमेकत्र ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरभ्युपगमे तयोर्जातित्वं न स्यादिति वाच्यम्। इष्टत्वात्, जातित्वोपाधित्व-परिभाषायाः


१. 'तत्तदिन्द्रियवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्याभिन्नयोग्यवर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभेद' रूपस्थलक्षणस्याभावः।

२. असन्निकृष्टपक्षकानुमितिस्थले पक्षस्य प्रत्यक्षत्वे यथा असन्निकृष्टत्वं बाधकं, तथा इदं चन्दनं सुरभि चन्दनखण्डत्वात् चन्दनखण्डान्तरवत्' इति—सन्निकृष्टपक्षकानुमितिस्थले चन्दनखण्डांशे अपरोक्षत्वं (प्रत्यक्षत्वं) सौरभांशे परोक्षत्व-(अप्रत्यक्षत्व-) मिति परोक्षत्वाऽपरोक्षत्वयोः अभ्युपगमे प्रसिद्धजातिबाधकसङ्कर्यप्रसङ्गो बाधको भवेत्। तथा चोक्तं किरणावल्याम्—'व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथानवस्थितिः। रूपहानि रसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः'॥ संकरश्च—'परस्परात्यन्ताभावसमानाधिकरणधर्मयोरेकत्रसमावेशः।' तथा च नेदं युक्तमित्याशंक्य निराकरोति ग्रन्थकारः 'न चे'ति। तत्र जातित्वाभावस्तु अभीष्ट एव जात्युपाध्युदासीनधर्ममात्रस्याभ्युपगमात्।

जातिखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५५

सकलप्रमाणागोचरतया अप्रामाणिकत्वात् । घटोऽयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानं, न तु तस्य जातित्वेऽपि ।

जातित्वरूप-साध्याप्रसिद्धौ तत्सा¹धकानुमानस्याप्यनवकाशात् । समवायासिद्ध्या ब्रह्मभिन्न²निखिलप्रपञ्चस्यानित्यतया च नित्यत्व-समवेतत्व-घटित-जातित्वस्य घटत्वादावसिद्धेश्च । एवमेवोपाधित्व³मपि निरसनीयम् ॥

अर्थ—'पूर्वोक्त प्रकार से एक ज्ञान में आंशिक परोक्षत्व और आंशिक अपरोक्षत्व इन दो धर्मों का स्वीकार करने से उन दोनों को भी जातित्व नहीं है' यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व का जातित्व न होना हमें इष्ट ही है । क्योंकि जातित्व और उपाधित्व की परिभाषा (तर्कशास्त्र का संकेत) किसी प्रमाण का विषय न होने से अप्रामाणिक है (उस परिभाषा में कोई प्रमाण नहीं है) । 'यह घट है' इत्यादि प्रत्यक्ष-प्रमाण घटत्वादिकों के अस्तित्व में ही प्रमाण है, उनके जातित्व में प्रमाण नहीं हो सकता । इस प्रकार जातित्वरूप साध्य की अप्रसिद्धि (सर्वथा असिद्धि) होने से तत्साधक अनुमान की भी प्रवृत्ति हो नहीं सकती और समवाय की प्रमाण से सिद्धि न होने से तथा ब्रह्मभिन्न समस्त प्रपञ्च की अनित्यता होने से नित्यत्व और समवेतत्व से युक्त जातित्व की घटत्वादिकों में असिद्धि होती है । इस कारण 'यह घट है' इत्याकारक प्रत्यक्ष, घटत्वादिकों के जातित्व में प्रमाण नहीं हो सकता । इसी न्याय से नैयायिकों के पारिभाषिक उपाधित्व का भी निरसन कर देना चाहिये ।

**विवरण—**उपर्युक्त शंका का आशय इस प्रकार है—'पर्वत वह्निमान् है' इस एक ही ज्ञान में 'परोक्षत्व' भी है और 'अपरोक्षत्व' भी है—ऐसा आप कहते हैं । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' यह वह्निप्रकारक-पर्वतविशेष्यक और संयोगसंसर्गक विशिष्ट ज्ञान एक ही है, किन्तु उसे पर्वतरूप विशेष्यांश में प्रत्यक्ष और अग्निरूप विशेषणांश में परोक्ष मानने पर प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व धर्मों में जातित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा । क्योंकि वह विशिष्ट ज्ञान, सांकर्य रूप जातिबाधक-कारण से युक्त है । 'परस्पर समानाधिकरण न होनेवाले दो धर्मों का एक स्थान में समावेश होना' (उनका एक अधिकरण में रहना) संकर कहलाता है । 'संकर', जाति का बाधक (बाध करनेवाला) दोष है । उपर्युक्त दो धर्मों का 'पर्वतो वह्निमान्' इस स्थल में संकर⁴ होता है । इस


१. 'साध्यका:'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'भिन्नाखिल:'--इति पाठान्तरम् ।
३. 'पाधित्वं निर०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'पृथ्वीपरमाणवो गन्धवन्तः' इत्यनुमितौ अपरोक्षत्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणं

५६ वेदान्तपरिभाषा [ जातिखण्डनम्

कारण वह संकर, परोक्षत्व और अपरोक्षत्व के जातित्व का बाध करेगा ।

तार्किकों की इस शंका पर सिद्धान्ती कहता है--

'पर्वतो वह्निमान्' इस विशिष्ट ज्ञान में जाति और उपाधि से विलक्षण, परोक्षत्व और अपरोक्षत्व धर्म मानने पर उसमें (परोक्षत्व-अपरोक्षत्व को) नैयायिकों का इष्ट, जातित्व सिद्ध नहीं हो सकेगा—यह भय आपका व्यर्थ है । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व में जातित्व का न होना हमें इष्ट ही है । क्योंकि 'प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व' जाति तथा उपाधि से भिन्न धर्म मात्र हैं, यही हमारा (वेदान्तियों का) मत है !

शंका--घटत्वादि अन्य जातियों की तरह परोक्षत्व और अपरोक्षत्व दो जातियां भी प्रमाणसिद्ध हैं । तब उनके प्रमाणसिद्ध जातित्व का स्वीकार न करने पर अतिप्रसंग होगा ।

समाधान--जातित्व और उपाधित्व (जाति और उपाधि) आपके संकेत हैं (आपकी रची परिभाषाएं हैं) उन्हें प्रामाणिकत्व नहीं है (जाति और उपाधि, प्रत्यक्षादि किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होतीं) ।

शंका--नील-घटत्वादिकों में जैसा उपाधित्व प्रमाणसिद्ध है, उसी तरह घटत्वादिकों में जातित्व भी प्रमाणसिद्ध ही है । तब घटत्व-जाति में कोई प्रमाण नहीं, यह आप कैसे कहते हैं ?

समाधान--आपकी पारिभाषिक 'जाति' के विषय में जैसे प्रमाण नहीं, वैसे ही 'उपाधि' के विषय में भी प्रमाण नहीं है, यह हमारा कथन है । इसी कारण मूल ग्रन्थ में जातित्व के साथ उपाधित्व का भी ग्रहण किया है । अर्थात् 'घटत्वादिकों में जातित्व रहता है' और 'नील-घटत्व में उपाधित्व रहता है' ये आपकी दोनों परिभाषाएं, प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण का विषय न होने से अप्रामाणिक हैं¹ ।


'परोक्षत्वं' वर्तते, 'घटोऽय'मिति प्रत्यक्षज्ञाने परोक्षत्वात्यन्ताभावसमानाधिकरणं प्रत्यक्षत्वं वर्तते, तयोः परस्परविरुद्धधर्मयोः परोक्षत्वाऽपरोक्षत्वयोः एकत्र 'पर्वतो वह्निमान् इत्यत्र समावेशः, इति तयोः जातित्वं न भवितुमर्हतीत्याशयः । अतः 'पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वे साङ्कर्यं' बाधकं, सर्वांशे ज्ञानस्य परोक्षत्वे तु न साङ्कर्यं, न वा प्रत्यक्षत्वस्य जातित्वोच्छेदः स्यादिति शंकाकर्तुराशयः ।

१. 'नित्यत्वे सति अनेक समवेतत्वम्'—जातिः ।
(क) 'भेदकधर्मवत्त्वम्,—उपाधिः ।
(ख) 'आधुनिकसंकेतः'—परिभाषा ।
एवञ्च घटत्वादीनां नैयायिकी परिभाषा 'जाति'रिति । 'अतद्व्यावृत्ति'रिति बौद्धानां परिभाषा । नीलघटत्वादीनामुपाधिरिति । तथा च--जातित्वमुपाधित्वञ्च तत्तत्सम्प्रदायानां परिभाषामात्रम् । न हि परिभाषामात्रेण कस्यचिदर्थस्य सिद्धिर्भवति ।

जातिखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५७

शंका—'जिस वस्तु का जिस इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है, उसी इन्द्रिय से तन्निष्ठ जाति और उस वस्तु के अभाव का भी ग्रहण होता है' इस न्याय से 'यह घट' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान से घटत्वजाति का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है' तब 'जाति और उपाधि के विषय में कोई प्रमाण नहीं है' यह आप कैसे कह रहे हैं ? इस शंका का समाधान 'घटोऽयम्०' इत्यादि ग्रन्थ से ग्रन्थकार ने किया है, जिसका आशय इस प्रकार है—

'यह घट' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान घटत्वादिकों के अस्तित्व में ही प्रमाण है। उसके जातित्व में प्रमाण नहीं है। क्योंकि घटत्व के अस्तित्व का ज्ञान कराकर ही वह उपक्षीण (कृतकार्य) हो जाता है। घटत्वादिकों का अस्तित्व सिद्ध करने के लिए ही उस प्रत्यक्ष के प्रवृत्त होने से उसका अस्तित्व सिद्ध करते ही वह कृतार्थ हो जाता है और उसके जातित्व की सिद्धि के लिए अप्रवृत्त होने से वह जातित्व की सिद्धि में उदासीन रहता है।

शंका—घटत्वजाति मे प्रत्यक्षप्रमाण के न होने पर भी अनुमान¹ प्रमाण है— "घटत्व जाति है, क्योंकि (उसे—घटत्व को) उपाधिभिन्न सामान्यधर्मत्व होने से अथवा नित्य और अनेकसमवेत होने से, सत्ता की तरह इस अनुमान से 'घटत्व-जाति' की सिद्धि की जा सकती है। तब ग्रन्थकार 'जातित्वरूप' इत्यादि ग्रन्थ से इस शंका का समाधान करते हैं—

इस अनुमान में नित्य और अनेकसमवेत रूप लक्षण से युक्त जातित्व रूप साध्य की अप्रसिद्धि होने से उसके अधीन रहनेवाले व्याप्तिज्ञानादि का भी अभाव होता है। अतः इस जातिसाधक-अनुमान को अवसर ही नहीं मिल पाता।

शंका—ऐसे जातित्व की अप्रसिद्धि होने पर भी उस जातित्व के घटक (अवयव-भूत) नित्यत्व, एकत्व और अनेकसमवेतत्व, इनकी क्रम से आत्मा, आकाश और घटादिकों में प्रसिद्धि है। क्योंकि—'नित्यमेकमनेकसमवेतं सामान्यम्' यह 'सामान्याख्य' जाति का लक्षण किया है। उसमें से नित्यत्व 'आत्मा' में, एकत्व 'आकाश' में, और अनेक-समवेतत्व 'घटादिकों' में प्रसिद्ध है। इस प्रकार प्रसिद्ध नित्यत्वादिकों का ग्रहण करके उनसे युक्त हुए जातित्व की घटत्वादिकों में सिद्धि होगी।

ग्रन्थकार ने 'समवायासिद्धा' इत्यादि मूल ग्रन्थ से इस शंका का निरसन किया है, जिसका आशय इस प्रकार है—'समवाय' नाम का कोई पदार्थ ही सिद्ध नहीं है।


१. अनुमान प्रयोगः—'घटत्वादिकं जातिः, उपाधिभिन्नत्वे सति सामान्यधर्मवत्त्वात्' । अथवा 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वात्, सत्तावत्' तत्कथं घटत्वादेः जातित्वे न प्रमाणम्? अनुगतप्रतीतेः अनुमानत्वेऽपि अनुमानस्य मानत्वात्, इति चेन्न । अत्रानुमाने साध्याऽप्रसिद्ध्या हेतुर्दुष्टः । तथा चास्मिन् प्रयोगे जातित्वं साध्यम् । तच्च नित्यानेकसमवेतत्वरूपम् । न च तत् क्वचित् प्रसिद्धम्, सिद्धान्ते क्वापि नित्यानेकसमवेतत्वरूपस्य जातित्वस्य अनभ्युपगमात्, नित्यत्वाभावात्, समावायाऽभावाच्च । तस्मात् साध्यस्य जातित्वस्य अप्रसिद्ध्या हेतौ साध्य-व्याप्तिग्रहाभावेन तस्य च व्याप्यत्वासिद्धत्वेन तत्साध्यकानुमितिर्न भवति ।

५८ वेदान्तपरिभाषा [ समवायखण्डनम्

( नैया० ) तथापि 'यह घट रूपवान् है' मृत्तिका में अर्थात् मृत्तिका रूप अवयवों में घट अवयवी है। यहाँ रूप और घट अथवा मृत्तिका-घट में संयोग की प्रतीति तो होती नहीं, और सम्बन्ध तो उनमें ( रूप-घट, और मृत्तिका-घट में ) है ही, अतः परिशेषन्याय से युतसिद्ध-पदार्थों में प्रतीत होनेवाले संयोग से भिन्न, अयुतसिद्ध-पदार्थों के 'समवाय' सम्बन्ध की सिद्धि होती ।

(वेदा०) आपका यह कहना उचित नहीं है। कारण, 'रूपादि' गुण और 'वस्त्रादि' गुणी ( द्रव्य ) अथवा 'परमाणु' आदि अवयव और 'द्व्यणुक आदि' अवयवी इनमें भेद स्पष्ट है, तथा उनका सम्बन्ध जो समवाय है वह भी अत्यन्त ( बिलकुल ) भिन्न है, ऐसा स्वीकार करने पर 'दण्डः पुरुषः' में जैसे समानाधिकरण का प्रत्यय संभव नहीं होता वैसे ही 'शुक्ल-घट मृद्घट' इनमें भी समानाधिकरण का प्रत्यय नहीं हो पायेगा। कारण, 'दण्डः पुरुषः' दण्ड ही पुरुष है, यह कभी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनमें अत्यन्त भेद है। उसी तरह गुण-गुणी, अवयव-अवयवी, और द्रव्य तथा समवाय संबंध के भी अत्यन्त भिन्न होने से शुक्ल-घट, मृद्घट, द्रव्यसमवेत-गुण, आदि में समानाधिकरणप्रत्यय की संभावना भी नहीं की जा सकेगी। किन्तु 'शुक्लघट, मृत्तिका में घट' ऐसा समानाधिकरणप्रत्यय तो हुआ करता है। अतः इस समानाधिकरण्य की प्रतीति से 'शुक्ल-घट' आदि में अभेद ( तादात्म्य ) ही स्वीकार करना चाहिये । उपर्युक्त 'दण्डः पुरुषः' उदाहरण व्यतिरेकी है। अन्वयी नहीं है ।

शिवाय दो समवायी पदार्थों का समवाय, अपने समवायी पदार्थों से ( जिनका समवाय हो ) संबद्ध होकर विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है या उनसे असम्बद्ध रहकर ही वह विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है ? घट 'द्रव्य' है और रूप 'गुण' है । ये दोनों पदार्थ युतसिद्ध ( पृथक् सिद्ध ) नहीं हैं, किन्तु अयुतसिद्ध हैं। इस कारण उनमें संयोग-सम्बन्ध नहीं रहता, समवाय सम्बन्ध ही सम्भव होता है। इसलिये 'जिसमें समवाय हो वह समवायी', इस व्युत्पत्ति से घट और रूप ये दोनों पदार्थ समवायी हैं। 'समवाय' उन समवायी पदार्थों से सम्बद्ध होकर 'ये दो पदार्थ समवेत हैं' तथा 'घट रूपी हैं' ( रूपवान् = रूप से युक्त है ) इस विशिष्ट प्रत्यय का नियामक ( कारण ) होता है या वह ( समवाय ) समवायी पदार्थों से सम्बद्ध न होकर ही उक्त विशिष्ट प्रत्यय का नियामक होता है ? यह प्रश्न सिद्धान्ती ने 'समवाय संबंध' को पृथक् पदार्थ माननेवाले तार्किक से किया है। ऐसे उभयकोटिक प्रश्न को विकल्प कहते हैं । 'दण्डी पुरुषः' ( दण्डवान् पुरुष ) यह विशिष्ट प्रत्यय है। क्योंकि इसमें 'दण्ड' विशेषण और 'पुरुष' विशेषित ( विशेष्य ) है । 'यह पुरुष दण्डवान् है' इस प्रत्यय ( अनुभव ) का विषय 'विशेषित ( विशेषणयुक्त ) पुरुष' है। इसलिये यह विशिष्ट प्रत्यय है । उसी तरह 'रूपी ( रूपवान् ) घटः' इसमें भी 'रूप' विशेषण से युक्त ( विशेषित = समवेत ) घट, विषय है। इस कारण भी विशिष्ट-प्रत्यय है । ऐसे विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक कौन ? सम्बद्ध-समवाय या असम्बद्ध-समवाय ?

समवायखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५९

सिद्धान्ती—'समवाय, समवायी पदार्थों से सम्बद्ध होकर विशिष्ट-प्रत्यय का नियामक होता है' इस प्रथम पक्ष को मानने पर अनवस्था दोष होगा। जैसे--नैयायिक का कहना है कि—'रूपी घटः' इस प्रत्यय में 'रूप और घट' दोनों पदार्थ बिलकुल भिन्न हैं, तथापि परस्पर संबद्ध हैं। इन दो अयुतसिद्ध पदार्थों में संयोग सम्बन्ध की सम्भावना तो बन ही नहीं सकती। अतः नित्यसम्बद्ध समवाय की सिद्धि हो जाती है।

तब वेदान्ती कहता है कि 'समवाय' भी तो सम्बन्ध ही है। इसी कारण वह रूप और घट इन दो पदार्थों के मध्य में रहता है। यह रूपात्मक या घटात्मक न होकर रूप और घट से बिलकुल भिन्न है। तब उनको सम्बद्ध कराने के लिए एक और सम्बन्ध की आवश्यकता होगी। अन्यथा असम्बद्ध और अतद्रूप समवाय उन दो पदार्थों में किसी प्रकार के अतिशय को पैदा नहीं कर सकता। इस कारण रूप और समवाय का कल्पित सम्बन्ध भी परस्पर सम्बद्ध होकर ही सम्बन्धी पदार्थों में अतिशय को पैदा कर सकेगा। अतः समवाय और समवायी का सम्बन्ध होने के लिये दूसरा समवाय, उसके सम्बन्ध के लिये तीसरा, उसके सम्बन्ध के लिए चौथा, इस प्रकार अविच्छिन्न समवायपरम्परा प्राप्त होगी। इसी को अनवस्था दोष कहते हैं। रूप और घट से समवाय की स्वरूप से ही स्थिति मानने पर 'घट और पट' के संयोग की भी स्वरूप से ही स्थिति माननी होगी। अर्थात् घट पटादि पदार्थों पर संयोग की समवाय से स्थिति की कल्पना करना व्यर्थ है। इसलिये रूप और घट का तादात्म्य मानना ही सर्वथा सयुक्तिक है।

यदि ऐसा कहें कि समवाय, समवायी पदार्थों से नित्यसम्बद्ध हुआ ही प्रतीत होता है, जिससे पूर्वोक्त अनवस्था दोष नहीं हो सकेगा। तो संयोग भी संयोगी पदार्थों से नित्य-सम्बद्ध हुआ ही प्रतीत होता है तब संयोग को सम्बन्धित होने के लिए एक दूसरे समवाय सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। इस पर यदि ऐसा कहें कि दो द्रव्यों का संयोग होने से 'संयोग' पृथक् पदार्थ है, उसे 'गुण' कहते हैं, अतः अपने स्वरूप (गुण) से भिन्न स्वरूप वाले द्रव्य से सम्बन्धित होते समय उसे 'समवाय' की अपेक्षा नहीं रहती। तो समवाय भी अर्थान्तर (पृथक् पदार्थ) है अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म पदार्थों से वह भिन्न पदार्थ है। तब वह द्रव्य, गुण और कर्म से सम्बन्धित होते समय दूसरे 'समवाय' की अपेक्षा कैसे नहीं करेगा ? अवश्य ही करेगा। इस पर यदि ऐसा कहें कि 'संयोग' यह गुण पदार्थ होने से द्रव्यों से सम्बन्धित होते समय 'समवाय' की अपेक्षा करता है। 'संयोग' की तरह 'समवाय' स्वयं गुण नहीं है, अपितु सात पदार्थों में से छठा पदार्थ है। इसलिए उसे दूसरे 'समवाय' की अपेक्षा नहीं होती कहें, तो 'संयोग' को गुणत्व आपकी परिभाषा में है, शास्त्रीय नहीं। सिवाय अपेक्षा में निमित्त 'पदार्थान्तरत्व' का होना दोनों में समान है। 'संयोग' जैसे संयोगी से पृथक् पदार्थ है, वैसे 'समवाय' भी 'समवायी' से पृथक् पदार्थ है। अतः जैसे संयोग, संयोगी के साथ सम्बद्ध होने के लिए समवाय की अपेक्षा रखता है वैसे ही समवाय को समवायी से सम्बद्ध होने के लिए दूसरे समवाय

६० • वेदान्तपरिभाषा [ समवायखण्डनम्

की अपेक्षा ( आवश्यकता ) होनी ही चाहिए। बिना उसके वह समवायी से कैसे सम्बन्धित हो सकेगा ?

अनवस्था दोष के निवारणार्थ यदि हम पूर्वोक्त विकल्पों में से दूसरे पक्ष का ( समवायी से बिना सम्बन्धित हुए ही समवाय विशिष्ट प्रत्यय का नियामक होता है ) ग्रहण करें तो ‘अतिप्रसंग’ दोष होगा। क्योंकि फिर तो कोई भी असम्बद्ध पदार्थ, विशिष्ट प्रत्यय का नियामक हो सकेगा। असम्बद्ध पट से भी ‘रूपी घटः’ प्रत्यय होने का प्रसंग प्राप्त होगा। सिवाय हम अद्वैतसिद्धांती आप तार्किकों से यह पूछते हैं कि समवाय अनेक हैं या एक ? आप उसे अनेक नहीं बता सकते, कारण यह है कि ‘समवायस्तु एक एव’, ‘विशेष’ पदार्थ के अनन्त होने पर भी ‘समवाय’ एक ही है—यह आप की परिभाषा है। इसलिए समवाय के अनेक मानने पर ‘अपसिद्धांत’ और ‘गौरव’ दोष प्राप्त होंगे। यदि ‘समवाय’ को एक बतावें तो रूप, ज्ञान आदि का समवाय वायु, घट आदि पर स्थित समवाय से पृथक् ( भिन्न ) न होने से ‘वायु रूपवान् है और घट विलक्षण गतिमान् है,’ प्रतीति होने का प्रसंग प्राप्त होगा। इस पर यदि आप ऐसा कहें कि वायु में रूप का, और घट में विलक्षण गति का अभाव होने से उपर्युक्त प्रतीति का प्रसंग कैसे प्राप्त होगा ? उत्तर—वायु में रूप की स्थिति के प्रयोजक ( कारण ) रूपसमवाय के रहने पर भी रूप का अभाव ( रूपं नास्ति ) बताने लगें तो ‘व्याघात’ दोष प्राप्त होगा।

इस प्रकार समवाय के सिद्ध न होने पर प्रत्यक्षगम्य कार्यत्व और ब्रह्मभिन्नत्व लिंगक अनुमान से तथा “हे सौम्य, यह समस्त कार्यरूप जगत्, उत्पत्ति से पूर्व सत् ही था,” इस श्रुति से सिद्ध ‘ब्रह्म से भिन्न सकल प्रपंच अनित्य है’ इस न्याय से नित्यत्व व समवेतत्व विशेषणों से युक्त जातित्व की घटत्वादि में असिद्धि है। ( समवाय की ही सिद्धि न होने से प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा घटत्वादिकों में जाति की सिद्धि नहीं होती। जाति में कार्यत्व होने से और वह ब्रह्मभिन्न होने से उसकी अनित्यता का अनुमान हो जाता है। एवं च अनुमान से भी जाति सिद्ध नहीं हो पाती। श्रुति से भी ‘समस्त प्रपंच अनित्य’ सिद्ध होने से नित्य व अनेकसमवेत जाति घटत्वादिकों में सिद्ध नहीं हो पाती ) ।

नैयायिकों से स्वीकृत जाति की इस प्रकार अप्रामाणिकता सिद्ध होने से ही ‘परोक्षत्व और अपरोक्षत्व’ को हम जातिरूप नहीं मानते। इसी प्रकार घटत्वादिकों के जातिरूप होने में भी कोई प्रमाण नहीं है। जाति की अप्रामाणिकता में तीन हेतु हैं— १—प्रत्यक्ष तो घटत्व की सत्ता में प्रमाण है, जातित्वरूपसाध्य की अप्रसिद्धि होने से अनुमान प्रमाण का अवसर ही नहीं प्राप्त होता। ३—जातिलक्षण घटित नित्यत्व, समवेतत्व, आदि की असिद्धि होने से भी जाति की सिद्धि नहीं हो पाती। इस पर तार्किक पूछता है कि आपने तो जाति की तरह उपाधि को भी अप्रामाणिक

ज्ञानप्रत्यक्षस्यनिष्कर्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६१

बताया था परन्तु तीन हेतुओं से मात्र जाति की परिभाषा अप्रामाणिक ठहरती है, उपाधि की नहीं। इस शंका का निरसन ग्रन्थकार 'एवमेव' ग्रन्थ से करते हैं। जातित्व की परिभाषा में अप्रामाणिकता दिखाने के लिये जो तीन हेतु दिये हैं, उन्हीं से उपाधित्व का भी निरसन हो जाता है। जैसे--'नीलघटत्व' आदि में उपाधित्व बतानेवाली आपकी नीलघटत्व की परिभाषा प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि १—'यह नीलघट है' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण नीलघटत्व के अस्तित्व में प्रमाण है, न कि नीलघटत्व के उपाधि होने में। २—उपाधित्व रूप साध्य के अप्रसिद्ध होने से तत्साधक अनुमान भी नहीं हो सकता। ( उपाधित्व रूप साध्य का साधक अनुमान¹—१—नील घटत्वादि उपाधि है, २—क्योंकि उस नील घटत्वादि पर जातिभिन्नसामान्य धर्मत्व है अर्थात् नीलघटत्व', 'घटत्व' जाति से भिन्न सामान्य धर्म है, ३--आकाशत्वादि के समान। परन्तु इस अनुमान में उपाधित्व रूप साध्य ही अप्रसिद्ध है।) ३—समवाय आदि की सिद्धि न होने से उपाधित्व की भी सिद्धि नहीं होती।

शंका—यद्यपि जाति और उपाधि दोनों अप्रमाणिक हैं तथापि एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का रहना कहाँ तक उचित है? इस प्रश्न का उत्तर—

पर्वतो वह्निमानित्यादौ च पर्वतांशे वह्न्यंशे चान्तःकरणवृत्तिभेदाङ्गीकारेण तत्त²द्वृत्त्यवच्छेदकभेदेन परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरेकत्र चैतन्ये वृत्तौ न³ विरोधः। तथा च तत्तदिन्द्रिययोग्य-वर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं तत्तदाकारवृत्त्यवच्छिन्नज्ञानस्य तत्तदंशे प्रत्यक्षत्वम् ।।

अर्थ—'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमितिज्ञान में हम 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में अन्तःकरणवृत्ति का भेद मानते हैं। 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में भिन्न-भिन्न अन्तःकरणवृत्तियाँ हैं, यह हमारा सिद्धान्त होने से उन भिन्न वृत्तियों का अवच्छेदक भी (भेदक भी) भिन्न है। इसलिए एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्वरूप परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है। अर्थात् वे दोनों धर्म, एक ही चैतन्य में रह सकते हैं। तस्मात् उन इन्द्रियों के योग्य, वर्तमान


१. 'नीलघटत्वादिकमुपाधिः जातिभिन्नसामान्यधर्मत्वात् 'आकाशत्वादिवत्' इत्यनुमानस्य अनवकाशात् समवायाद्यसिद्ध्या उपाधित्वासिद्धेश्च इत्येवं निरसनीयम्।
२. 'तत्तवच्छेदकः' इति पाठान्तरम्।
३. 'न कश्चिद् विरोधः'—इति पाठान्तरम्।

६२वेदान्तपरिभाषा[ विषयप्रत्यक्षलक्षणम्

विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के साथ, तत्तद्विषयाकार हुई इन्द्रियवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद होना ही उस अंश में ज्ञान का प्रत्यक्षत्व (प्रत्यक्ष) है ।

**विवरण—**पीछे कह चुके हैं कि घटावच्छिन्न आकाश, मठावच्छिन्न आकाश से भिन्न नहीं है, क्योंकि 'घट' और 'मठ' दोनों विभाजक पदार्थ एक ही देश में स्थित रहते हैं । उसी तरह अन्तःकरण-वृत्ति और घट को एकदेशस्थ होने से उन्हें उपधेय-भेदकत्व नहीं है । वैसे ही 'पर्वत वह्निमान् है' इस ज्ञान में 'पर्वत' और 'वह्नि' इन दो उपाधियों को भी एक-देशस्थत्व है इसलिये उन्हें उपधेयभेदकत्व नहीं है । तब एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व कैसे सम्भव है ? इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार करते हैं—'यह घट' इस प्रत्यक्ष ज्ञान में घटावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरण-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य एक ही है । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में, चक्षुरिन्द्रिय का बाह्य पर्वत से सन्निकर्ष होकर पर्वताकार वृत्ति होती है, उस वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य, पर्वत के देश में रहता है अर्थात् उस वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का देश, बाह्य पर्वत है । परन्तु वह्न्याकारवृत्ति, व्याप्तिज्ञान से पैदा होती हुई हृदयस्थ चैतन्य की अवच्छेदिका है । इस कारण जिस अनुमितिज्ञान में 'पक्ष' का प्रत्यक्ष रहता है, उस 'पक्ष' के अंश में अपरोक्षत्व और परोक्षवह्नि के अंश में परोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है । ऐसा होने से प्रत्येक विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का प्रत्येक इन्द्रिययोग्य, वर्तमान और अबाधित विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से अभेद होना ही ज्ञानांश में प्रत्यक्षत्व कार्य प्रयोजक है, यही पूर्वोक्त ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का—'प्रमाण चैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद' प्रयोजक शब्द से विवक्षित अर्थ है । इस प्रकार ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताकर अब विषयगतप्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताते हैं (विकल्प के प्रथम पक्ष का उत्तर देकर अब द्वितीय पक्ष का दे रहे हैं) ।

घटादेर्विषयस्य प्रत्यक्ष¹त्वं तु प्रमात्रभिन्नत्वम् ।²

अर्थ—(द्वितीय पक्ष में) प्रमाता से घटादि विषय का अभिन्नत्व ही विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है ।

विवरण—'यह घट यह ज्ञान भी प्रत्यक्ष है और उस ज्ञान का विषय जो 'घट' वह भी प्रत्यक्ष है । इसी का दो प्रकार से—'घट का ज्ञान प्रत्यक्ष है' और 'घट प्रत्यक्ष है'—निर्देश किया जाता है । उनमें से ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यहाँ तक बताया गया । अब इसके आगे सिद्धान्ती विषयगत प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को


१. 'प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्याभिन्नत्वम्' इत्यर्थः ।