वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानप्रत्यक्षस्यनिष्कर्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६१
बताया था परन्तु तीन हेतुओं से मात्र जाति की परिभाषा अप्रामाणिक ठहरती है, उपाधि की नहीं। इस शंका का निरसन ग्रन्थकार 'एवमेव' ग्रन्थ से करते हैं। जातित्व की परिभाषा में अप्रामाणिकता दिखाने के लिये जो तीन हेतु दिये हैं, उन्हीं से उपाधित्व का भी निरसन हो जाता है। जैसे--'नीलघटत्व' आदि में उपाधित्व बतानेवाली आपकी नीलघटत्व की परिभाषा प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि १—'यह नीलघट है' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण नीलघटत्व के अस्तित्व में प्रमाण है, न कि नीलघटत्व के उपाधि होने में। २—उपाधित्व रूप साध्य के अप्रसिद्ध होने से तत्साधक अनुमान भी नहीं हो सकता। ( उपाधित्व रूप साध्य का साधक अनुमान¹—१—नील घटत्वादि उपाधि है, २—क्योंकि उस नील घटत्वादि पर जातिभिन्नसामान्य धर्मत्व है अर्थात् नीलघटत्व', 'घटत्व' जाति से भिन्न सामान्य धर्म है, ३--आकाशत्वादि के समान। परन्तु इस अनुमान में उपाधित्व रूप साध्य ही अप्रसिद्ध है।) ३—समवाय आदि की सिद्धि न होने से उपाधित्व की भी सिद्धि नहीं होती।
शंका—यद्यपि जाति और उपाधि दोनों अप्रमाणिक हैं तथापि एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का रहना कहाँ तक उचित है? इस प्रश्न का उत्तर—
पर्वतो वह्निमानित्यादौ च पर्वतांशे वह्न्यंशे चान्तःकरणवृत्तिभेदाङ्गीकारेण तत्त²द्वृत्त्यवच्छेदकभेदेन परोक्षत्वापरोक्षत्वयोरेकत्र चैतन्ये वृत्तौ न³ विरोधः। तथा च तत्तदिन्द्रिययोग्य-वर्तमानविषयावच्छिन्नचैतन्याभिन्नत्वं तत्तदाकारवृत्त्यवच्छिन्नज्ञानस्य तत्तदंशे प्रत्यक्षत्वम् ।।
अर्थ—'पर्वत वह्निमान् है' इत्यादि अनुमितिज्ञान में हम 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में अन्तःकरणवृत्ति का भेद मानते हैं। 'पर्वत' अंश में और 'वह्नि' अंश में भिन्न-भिन्न अन्तःकरणवृत्तियाँ हैं, यह हमारा सिद्धान्त होने से उन भिन्न वृत्तियों का अवच्छेदक भी (भेदक भी) भिन्न है। इसलिए एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्वरूप परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है। अर्थात् वे दोनों धर्म, एक ही चैतन्य में रह सकते हैं। तस्मात् उन इन्द्रियों के योग्य, वर्तमान
१. 'नीलघटत्वादिकमुपाधिः जातिभिन्नसामान्यधर्मत्वात् 'आकाशत्वादिवत्' इत्यनुमानस्य अनवकाशात् समवायाद्यसिद्ध्या उपाधित्वासिद्धेश्च इत्येवं निरसनीयम्।
२. 'तत्तवच्छेदकः' इति पाठान्तरम्।
३. 'न कश्चिद् विरोधः'—इति पाठान्तरम्।