वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६२ | वेदान्तपरिभाषा | [ विषयप्रत्यक्षलक्षणम् |
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विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य के साथ, तत्तद्विषयाकार हुई इन्द्रियवृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का अभेद होना ही उस अंश में ज्ञान का प्रत्यक्षत्व (प्रत्यक्ष) है ।
**विवरण—**पीछे कह चुके हैं कि घटावच्छिन्न आकाश, मठावच्छिन्न आकाश से भिन्न नहीं है, क्योंकि 'घट' और 'मठ' दोनों विभाजक पदार्थ एक ही देश में स्थित रहते हैं । उसी तरह अन्तःकरण-वृत्ति और घट को एकदेशस्थ होने से उन्हें उपधेय-भेदकत्व नहीं है । वैसे ही 'पर्वत वह्निमान् है' इस ज्ञान में 'पर्वत' और 'वह्नि' इन दो उपाधियों को भी एक-देशस्थत्व है इसलिये उन्हें उपधेयभेदकत्व नहीं है । तब एक ही चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व कैसे सम्भव है ? इस आक्षेप का समाधान ग्रन्थकार करते हैं—'यह घट' इस प्रत्यक्ष ज्ञान में घटावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरण-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य एक ही है । परन्तु 'पर्वत वह्निमान् है' इस अनुमितिज्ञान में, चक्षुरिन्द्रिय का बाह्य पर्वत से सन्निकर्ष होकर पर्वताकार वृत्ति होती है, उस वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य, पर्वत के देश में रहता है अर्थात् उस वृत्त्यवच्छिन्न-चैतन्य का देश, बाह्य पर्वत है । परन्तु वह्न्याकारवृत्ति, व्याप्तिज्ञान से पैदा होती हुई हृदयस्थ चैतन्य की अवच्छेदिका है । इस कारण जिस अनुमितिज्ञान में 'पक्ष' का प्रत्यक्ष रहता है, उस 'पक्ष' के अंश में अपरोक्षत्व और परोक्षवह्नि के अंश में परोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है । ऐसा होने से प्रत्येक विषयाकार वृत्ति से अवच्छिन्न हुए चैतन्य का प्रत्येक इन्द्रिययोग्य, वर्तमान और अबाधित विषय से अवच्छिन्न हुए चैतन्य से अभेद होना ही ज्ञानांश में प्रत्यक्षत्व कार्य प्रयोजक है, यही पूर्वोक्त ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का—'प्रमाण चैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद' प्रयोजक शब्द से विवक्षित अर्थ है । इस प्रकार ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताकर अब विषयगतप्रत्यक्षत्व का प्रयोजक बताते हैं (विकल्प के प्रथम पक्ष का उत्तर देकर अब द्वितीय पक्ष का दे रहे हैं) ।
घटादेर्विषयस्य प्रत्यक्ष¹त्वं तु प्रमात्रभिन्नत्वम् ।²
अर्थ—(द्वितीय पक्ष में) प्रमाता से घटादि विषय का अभिन्नत्व ही विषयगत प्रत्यक्षत्व में प्रयोजक है ।
विवरण—'यह घट यह ज्ञान भी प्रत्यक्ष है और उस ज्ञान का विषय जो 'घट' वह भी प्रत्यक्ष है । इसी का दो प्रकार से—'घट का ज्ञान प्रत्यक्ष है' और 'घट प्रत्यक्ष है'—निर्देश किया जाता है । उनमें से ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यहाँ तक बताया गया । अब इसके आगे सिद्धान्ती विषयगत प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को
१. 'प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्याभिन्नत्वम्' इत्यर्थः ।