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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 482 में से

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विषयप्रत्यक्षविचारः ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ६३

बताता है। घटादि विषय का प्रमातृ-अभिन्नत्व (प्रमाता से अभिन्न होना) ही विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है, मूल में जो 'तु' शब्द है, वह नैयायिकों के विषय प्रत्यक्षत्व का निरसन करने के लिये है। नैयायिक—'इन्द्रियजन्यज्ञानविषयत्वं विषयप्रत्यक्षत्वम्' इन्द्रियों से उत्पन्न हुए-ज्ञान का विषय होना ही विषय का प्रत्यक्षत्व है'- लक्षण करते हैं। परन्तु वह (विषयप्रत्यक्ष का लक्षण) मनोरूप इन्द्रिय से होनेवाले अनुमितिज्ञान में अतिव्याप्त होता है। इसलिए नैयायिक के बताये हुए 'विषयप्रत्यक्षत्व' का निरसन कर 'घटादि विषय से प्रमाता का अभेद' इस विषयप्रत्यक्षत्व के प्रयोजक को यहाँ बताया है। इस पर शंका करते हैं—

ननु कथं घटादेरन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्याभेदः ? अहमिमं पश्यामि इति भेदानुभावविरोधादिति चेत् ,

अर्थ—घटादि-विषयों का अन्तःकरणावच्छिन्न-चैतन्य से अभेद कैसे सम्भव है ? क्योंकि विषय का प्रमाता से अभेद यदि मान लिया जाय तो मैं इस घट को देखता हूँ' इस भेदानुभव से विरोध होगा।

विवरण—'प्रमेय का प्रमाता से अभिन्नत्व (ऐक्य होना) ही घटादि प्रमेय का प्रत्यक्षत्व है' ऐसा आप कह रहे हैं। परन्तु 'प्रमात्राभिन्नत्व' से क्या तात्पर्य है ? घटादि विषयों का 'अभेद' या 'घटादिविषयावच्छिन्न चैतन्य का प्रमाता से अभेद' ।

इन दोनों विकल्पों में प्रथम विकल्प उचित नहीं, क्योंकि विषय स्वयं जड होने से उसका चेतन-प्रमाता से अभेद हो नहीं सकता। दूसरा विकल्प भी उचित नहीं, क्योंकि 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसी प्रतीति के समान 'मैं घट हूँ' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए। परन्तु 'मैं घट हूँ' इसी प्रतीति किसी को भी न होकर 'मैं इस घट को देखता हूँ' इस प्रकार तद्विरुद्ध भेदप्रतीति होती है। ऐसी स्थिति में 'प्रमात्राभिन्नत्व' का सम्भव कैसे हो सकता है? 'सिद्धान्ती' 'इति चेत्' ग्रन्थ से उपयुक्त शंका का अनुवाद कर 'उच्यते' से उसके निवारण की प्रतिज्ञा करता है—


३. 'अहमिमं घटं पश्यामि' इत्यनुभवे अस्मदर्थस्य प्रमातुः कर्तृतया प्रकाशः, इदमर्थस्य विषयस्य घटादेः कर्मतया प्रकाशः। कर्तृ-कर्मणोश्च भेदः सर्वानुभवसिद्धः। तथा च अस्मिन् अनुभवे प्रमातृ-विषययोर्भेदानुभवात् तदभेदो न युक्त इत्याशयः।

तत्रेदं समाधानम्—'प्रमात्राभेदः' इत्यनेन घटावच्छिन्नस्य अन्तःकरणावच्छिन्नस्य च ऐक्यं न विवक्ष्यते, येन विरोधो भवेत्, अपितु प्रमातृ-सत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावो विवक्षितः। 'प्रमातृसत्ता' इत्यस्य प्रमातृत्वलक्षणसत्ता बोध्या, न तु तन्निष्ठसत्ता-जातिः, प्रमातृ-प्रमेयनिष्ठसत्ताजातेरेकतया तन्निष्ठसत्तातिरिक्तसत्ताया असिद्धेः।